
नोट बंदी का औचित्य सिद्ध करने की कसरत करते हुए ईडी द्वारा प्रभावशाली लोगों को बैंकों में संदिग्ध मात्रा में रकम जमा कराने को आधार बनाकर जो नोटिस जारी किये गये थे और जिनकी खबरें तत्काल ही पर्याप्त रूप से प्रकाशित और प्रसारित हो गईं थीं। उन्हीं बासी खबरों को अब नये सिरे से ताजा करने की कोशिश की गई है। जाहिर है कि नोट बंदी से लोगों को जीना मुहाल होने की जिस स्थिति का सामना करना पड़ा है और विपक्ष इस जख्म को कुरेदने में कोई कसर नही छोड़ रहा है। उससे सरकार बेहद घबराई हुई है। खासतौर से प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री। पर डैमेज कंट्रोल के लिए होना यह चाहिए था कि पहले कुछ नही किया तो अब कुछ कर डालते, जब जागों तभी सवेरा। लेकिन आत्ममुग्ध सरकार के भेजे में यह बात आये तो आये कैसे।

इंदिरा गांधी जब प्रधानमंत्री थी तो उन्होंने महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री अब्दुल रहमान अंतुले को सीमेंट घोटाला कांड के आधार पर मीडिया द्वारा चलाई गई मुहिम के खिलाफ संरक्षण दिया था। लेकिन उन्हें भी उतना गुरुर नही था जितना मौजूदा प्रधानमंत्री को है। 18 जनवरी 1982 को जब विपक्ष और ट्रेड यूनियन के संयुक्त भारत बंद की ऐतिहासिक सफलता की खबर राॅ ने उनको दी तो इंदिरा गांधी ने जड़ता दिखाने की बजाय उसी दिन अंतुले का इस्तीफा मंगा लिया तांकि भारत बंद की अखबारों में संभावित सुर्खी को पीछे धकेला जा सके। लेकिन ऐसी किसी ठोस सकारात्मक कार्रवाई की उम्मीद न तो मोदी सरकार से किसी को थी और न उसने की।

आयकर और ईडी के अधिकारियों को हराम की तनख्वाह नही दी जा रही। उन्हें कुछ काम करके भी दिखाना पड़ता है। इसके तहत छापे डालना और नोटिस जारी करने का प्रपंच या कर्मकांड इन विभागों में चलता ही रहता है। आयकर विभाग जिसके यहां छापा डालता है उसके यहां कुछ न कुछ अघोषित संपत्ति निकल ही आती है। इसकों लेकर संबंधितों को नोटिस जारी होते हैं। यहां तक कि चुनाव होते तब भी हजारों लोगों के पास बैरियर लगाकर की जाने वाली चैकिंग में इतना कैश पकड़ा जाता है कि खबर पढ़कर ही लोगों की आंखे फटी रह जाती हैं। लेकिन इन कार्रवाइयों से भ्रष्टाचार करने वाले और काला धन जमा करने वाले बिल्कुल नही डरे इसीलिए इसका दलदल इन कार्रवाइयों के समानान्तर बढ़ता जा रहा है। वे जानते हैं यह राजकाज है नोटिस आयेगा, केस चलेगा, खर्चा हो जायेगा और कुछ वर्षों में मामला निपट जायेगा।
हाल की प्रायोजित खबरों में मीसा भारती के साथ-साथ मायावती को उनकी अघोषित संपत्ति को लेकर ईडी द्वारा जारी नोटिस की जानकारी इस अंदाज में दी गई है जैसे मायावती पर कोई बहुत बड़ा पहाड़ गिरा दिया गया हो। अब या तो सरकार सारे देश को उल्लू समझ रही है या सरकार खुद उल्लू है। जिसे यह पता नही कि ताज काॅरीडोर स्केम के मामले में जब सीबीआई ने जांच की थी उस समय मायावती के पास बेशुमार संपत्ति होने के प्रमाण सामने आ गये थे। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को ताज काॅरीडोर के मामले से उनकी आय से संबंधित कार्रवाई जोड़ने से रोक दिया था। सीबीआई से कहा गया था कि इस मामले में वह चाहे तो अलग से एफआईआर दर्ज कर मुकदमा बनाये। हो सकता है कि यूपीए सरकार ने अपने कार्यकाल में मायावती को राजनैतिक कारणों से संरक्षण दिया हो। लेकिन इसके बाद जब आप सत्ता में आ गये तो आप साढ़े तीन सालों से क्या कर रहे थे। जबकि इस बीच चुनाव में मायावती द्वारा उम्मीदवारों से भारी धन वसूली कर दौलत का अंबार लगाने की खबरे भी छपती रहीं। लेकिन लगता है कि प्रधानमंत्री और सरकार के अन्य लोग बेचारे व्यस्तता में खबरें पढ़ और देख नही पाते। इसलिए उन्हें मायावती की आय से अधिक संपत्ति का पता तभी चला जब उन्होंने किसी ओझा को बुलाकर नोटबंदी की कजरी लगाई।
मतलब साफ है कि कुछ लोगों के पास जरूरत से ज्यादा रुपये भ्रष्टाचार के चलते जमा हो रहा है, कौन अपनी अघोषित दौलत को विदेशो में जमा करने की व्यवस्था किये हुए है। यह बात देश के बच्चे-बच्चे तक को तो मालूम हो जाती है लेकिन जो विभाग इसकी पहरेदारी के लिए बनाये गये हैं वे इतने भोले है कि उन्हें तभी ज्ञान हो पाता है जब विदेशी मीडिया में किसी की खबर आ जाती है। कायदे से सीबीआई, ईडी, आयकर, सतर्कता इत्यादि विभाग के निकम्मे साड़ों को सरकार को जूते मारकर ठीक करना चाहिए जो भ्रष्टाचार करते ही किसी को पकड़ लेने की क्षमता आज तक नही दिखा पाये हैं। सरकार को भले ही पता न हो लेकिन बांकी सभी को पता है कि विदेशों में नेताओं और फिल्म अभिनेताओं के काले धन को जमा कराने की व्यवस्था कराने वाला आदि कवि बाल्मीकि कौन है। लेकिन ईडी की महारथी कार्रवाई में मायावती और मीसा भारती का तो नाम है पर श्रीमान अमर सिंह जी का नाम कही नही है। साधु-संत का चोला ओढ़े उन मुस्तंडों का भी नाम नही है जो बिना कोई व्यवसायिक उपक्रम चलाये अरबों-खरबों की जायजाद के मालिक रातों-रात बन गये हैं।
एक ड्रामेबाजी पूरी दुनियां में हो रही है। दुनियां भर के हरामखोर तब से डरे हुए हैं जबसे बेइमानी के किले के रूप में तब्दील हो चुकी अर्थ व्यवस्था के खोखलेपन के परिणामों से विश्व व्यापी जनाक्रोश का ज्वार उन्होंने ताजा मंदी के दौर में उठते देखा है। उन्हें इस बात का डर सता रहा है कि कहीं यह ज्वार हजारों फिट गहरी कब्र में उनके द्वारा दफन किये जा चुके साम्यवाद के जिन्न को बाहर न निकाल दे। इसलिए उन्होंने अपनी व्यवस्था में सैफ्टीवाॅल्व लगाने शुरू कर दिये हैं। खुद ही काले धन का रहस्योदघाटन इसके बाद कानूनी प्रक्रियाओं का ड्रामा और अंत में मामला टांय-टांय फिस्स यह दिखावटी उपक्रम न तो शोषण रोक सकता है और नही भ्रष्टाचार।
रोजमर्रा में प्रशासन को चुस्त और सक्रिय दिखना चाहिए। सरकार में भ्रष्टाचार से लड़ने की इच्छा शक्ति होगी तो प्रशासन को तो हुक्म बजाना है। यही नौकरशाही जब सरकार बेहतर होती है तो बेहतर काम शुरू कर देती है। कार्रवाइयां भले ही कम हो लेकिन रिश्वत लेने वालों में खौफ का ऐसा माहौल बन जाये जैसा इमरजेंसी के समय था। जब फरियादियों से पैसा मांगने में अधिकारियों और कर्मचारियों की जुबान इसलिए कांपती थी कि कहीं सामने वाला आदमी भेष बदलकर आया सीबीआई या विजिलेंस वाला न हो। इस समय तो हर गली और हर मोहल्ले में प्रत्येक साल ऐसा नया करोड़ पति पैदा हो रहा है जिसके बारे में लोग आश्चर्य में रहते है कि यह करता क्या है जो इतनी जल्दी इसे कुबेर का वरदान मिल गया। आर्थिक अपराध की जांच करने वाली एजेंसियों को इस कदर रतौंधी हो चुकी है कि उन्हें पूरे सूबे में ऐसा आदमी नजर नही आ पाता। अगर संदिग्ध तरीके से किसी का एश्वर्य बढ़ रहा है और सरकारी एजेंसियां उसे टोकने पहुंच जाये ंतो क्या लोग खुला खेल फरुखाबादी खेल पायेगें क्या मामूल सिपाही और क्लर्क कुछ सालों की नौकरी में गाड़ी, घोड़ा, कोठी की व्यवस्था करने का साहस कर पायेगा। काले धन का पता लगाने के लिए अगर सरकारी एजेंसियों में संख्या बल पर्याप्त नही है तो वीपी सिंह की तरह वित्तीय मामलों की फेयर फैक्स जैसी अंतर्राष्ट्रीय अभिसूचना एजेंसी की सेवाएं सुरागरशी के लिए लेने को सरकार को आगे आने की सोचनी चाहिए। तब अकेली मायावती और मीसा भारती नही पकड़ी जायेगीं। देश के 95 प्रतिशत नेता चंगुल में फंस जायेगे जिनमें चप्पले चटकाने वाले वे भाजपा नेता भी फंसेगे जो आजकल हवाई जहाज के नीचे पैर नही रखते। लेकिन नोट बंदी में तो फंसने वाले नेताओं की संख्या ऊंट के मुंह में जीरा से भी कम है। फिर सरकार काले धन के खिलाफ सुरागरशी कराये तो कराये कैसे। क्योंकि जिसको उसने गले का हार बना रखा है वे ही लोग सबसे पहले कृष्ण गृह के फाटक पर सबसे पहले जा पहुंचेगे।
बहरहाल साढ़े तीन साल में आपने कुछ नही किया तो कोई बात नही लेकिन प्रभु अब तो कुछ करो। आम जनता कांग्रेस और भाजपा के बीच चेयर रेस जैसा खेल नही खेल रही। अगर सरकार अभी भी सफेद पोशो के खिलाफ एक्शन में आ जाये तो आम जनता की निगाह में रियल हीरों बनने का मौका वह भुना सकती है।







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