उरई। किसानों की आमदनी दुगनी करने के लिए सरकार सिर के बल खड़ी हुई जा रही है लेकिन अधिकारी काम के मामले में बैठकों से आगे नही बढ़ पा रहे। जिससे इस दावे की परिणति लफ्फाजी के रूप में होने के आसार दिखने लगे हैं।
जिले में रेशम की खेती के लिए संभावनाशील माहौल है। लेकिन इस मामले में अभी तक केवल कागजों में काम हुआ है। नतीजतन किसान भी इससे विमुख हो गये। अब एक बार फिर ज्यादा से ज्यादा किसानों को रेशम उत्पादन के लिए प्रेरित करने के प्रयास किये जा रहे हैं। लेकिन बैठकों में इस पर सरकारी निर्देशों के कारण जितना जोर दिया जाता है जमीनी स्तर पर उसके मुताबिक गंभीरता नदारत है।
खेत तालाब योजना 2008 में सूखे के कारण मायावती सरकार ने मनरेगा के तहत शुरू कराई थी। पहले तो किसानों ने इसमें दिलचस्पी दिखाई लेकिन बाद में उन्हें खेत बिगाड़ने के अलावा इसका कोई सार समझ में नही आया इसलिए उन्होंने अपने कदम वापस खीच लिए। आज भी यह स्थिति नही बदली है। सरकार का जोर होने की वजह से सचिवों ने इसमें दिमाग लगाया तो उन्हें खानापूर्ति के लिए केवल ग्राम समाज की जमीन पर तालाब खुदवाने में कामयाबी मिल पाई। इन तालाबों में भी पानी नही है। फिर भी अधिकारियों का जोर है कि इनमें मत्स्य पालन कराया जाये। जाहिर है कि प्रवंचना के अलावा इसका कोई नतीजा निकलने वाला नही है।
इस बीच किसानों को दूसरे प्रदेश में जहां अच्छी खेती होती है वहां के टूर पर भेजने का भी प्लान है। इसके लिए स्थान तय करने की माथापच्ची अधिकारी अपने स्तर पर कर रहे हैं। अगर ईमानदारी से यह प्रयास किया जाये तो जिले की खेती को देखा-देखी में लाभ हो सकता है। लेकिन अधिकारी अपनी फितरत बदलेगें इसके आसार कम ही हैं।

Leave a comment