जब बड़े अफसर जिलों में उतरते थे
आज किसी जिले में शासन की समीक्षा के लिए जिलाधिकारी, मंडलायुक्त, पुलिस महानिरीक्षक या शासन के किसी वरिष्ठ अधिकारी का दौरा खबर बन जाता है। लेकिन एक समय ऐसा था जब बड़े प्रशासनिक अधिकारियों का जिले और गांवों में जाना शासन की नियमित कार्यप्रणाली का हिस्सा था। ब्रिटिश भारत में इसे ‘Touring’ कहा जाता था।
उस दौर के दस्तावेजों से पता चलता है कि यह व्यवस्था केवल अंग्रेज अफसरों की सुविधा के लिए नहीं थी। राजस्व, पुलिस, स्वास्थ्य, शिक्षा और स्थानीय निकायों जैसे विभागों के अधिकारी अपने अधिकार क्षेत्र में निकलते और मौके पर जाकर व्यवस्था की जांच करते थे।
आज के IAS का तत्कालीन पूर्ववर्ती ICS (Indian Civil Service) था। जिला प्रशासन में Collector-Magistrate सबसे महत्वपूर्ण अधिकारी था, जबकि उसके ऊपर Commissioner और प्रांतीय सरकार की निगरानी व्यवस्था थी। पुलिस में Inspector-General और Deputy Inspector-General जैसे वरिष्ठ पद थे तथा जिले में Superintendent of Police प्रमुख अधिकारी होता था।
जालौन का दस्तावेजी रिकॉर्ड
जालौन इस अध्ययन के लिए विशेष रूप से उपयोगी जिला है। 1909 में D. L. Drake-Brockman द्वारा तैयार Jalaun: A Gazetteer संयुक्त प्रांत के District Gazetteers की श्रृंखला के 25वें खंड के रूप में सरकारी प्रेस से प्रकाशित हुआ था।
महत्वपूर्ण यह है कि जालौन के प्रशासनिक रिकॉर्ड वहीं समाप्त नहीं होते। अभिलेखीय सूची में 1909, 1915 और 1921 के टेक्स्ट संस्करण तथा बाद के सांख्यिकीय पूरक भी दर्ज हैं। यानी इस जिले की प्रशासनिक व्यवस्था को केवल किसी एक अंग्रेज अधिकारी की टिप्पणी से नहीं, बल्कि वर्षों के सरकारी रिकॉर्ड से समझा जा सकता है।
अफसर का काम कलेक्ट्रेट में बैठना भर नहीं था
ब्रिटिश जिला प्रशासन की एक बड़ी विशेषता यह थी कि अधिकारी को अपने इलाके की भौगोलिक और सामाजिक वास्तविकता से परिचित रहना पड़ता था।
राजस्व प्रशासन में Settlement Officer का काम ही व्यापक क्षेत्र में जाकर जमीन, खेती, लगान और स्थानीय परिस्थितियों का परीक्षण करना था। जालौन के पुराने Settlement Reports भी इस प्रशासनिक परंपरा की पुष्टि करते हैं। 1870 में जिले के एक हिस्से का Settlement Report, 1874 में कोंच का General Settlement Report, 1875 में कालपी का Final Settlement Report और 1906 में H.C.R. Hailey द्वारा जालौन का Final Revision Settlement Report तैयार किया गया था।
इन रिपोर्टों की तैयारी का अर्थ था कि प्रशासन को खेत, गांव, जमीन की पैमाइश, उपज, लगान और स्थानीय परिस्थितियों तक जाना पड़ता था।
दौरे का मतलब था प्रत्यक्ष निरीक्षण
आज किसी विभाग की समीक्षा अक्सर रिपोर्ट, वीडियो कॉन्फ्रेंस और ऑनलाइन आंकड़ों के आधार पर हो सकती है। उस समय संचार के साधन सीमित थे। इसलिए अधिकारी के पास वास्तविक स्थिति जानने का एक महत्वपूर्ण तरीका था—स्वयं मौके पर जाना।
किसी इलाके में सड़क कैसी है, पुलिस की मौजूदगी कैसी है, राजस्व वसूली की स्थिति क्या है, स्थानीय निकाय किस तरह काम कर रहा है, स्वास्थ्य या शिक्षा की व्यवस्था कैसी है—इन सबकी जानकारी केवल मुख्यालय की फाइल से नहीं मिल सकती थी।
यही कारण है कि ‘Touring’ प्रशासनिक संस्कृति का हिस्सा बन गया।
पुलिस में भी निरीक्षण की व्यवस्था
जालौन के तत्कालीन प्रशासनिक ढांचे का अंदाजा Imperial Gazetteer से भी मिलता है। बीसवीं सदी के प्रारंभ में जिले में District Superintendent of Police के अधीन तीन Inspector, 83 subordinate officers और 360 constables का पुलिस बल था। इसके अलावा 17 पुलिस स्टेशन, नगरपालिका/टाउन पुलिस तथा ग्रामीण और सड़क पुलिस की अलग व्यवस्था थी।
इतने बड़े और भौगोलिक रूप से फैले पुलिस ढांचे को केवल जिला मुख्यालय से नियंत्रित करना संभव नहीं था। वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के निरीक्षण का उद्देश्य थानों और अधीनस्थ पुलिस व्यवस्था को प्रत्यक्ष देखना भी था।
इस व्यवस्था की एक खास विशेषता थी—ऊपर का अधिकारी नीचे के अधिकारी की रिपोर्ट पर पूरी तरह निर्भर न रहे।
जालौन का प्रशासनिक भूगोल भी अलग था
उस समय जालौन का प्रशासन केवल जिला मुख्यालय तक सीमित नहीं था। विभिन्न तहसीलों और महत्वपूर्ण कस्बों का अपना प्रशासनिक महत्व था। Imperial Gazetteer के अनुसार जालौन तहसील में 381 गांव और दो कस्बे थे तथा जिले में बड़ी संख्या में पुलिस संस्थान और स्थानीय निकाय काम कर रहे थे।
आज जिस उरई, जालौन, कोंच और कालपी को हम अलग-अलग प्रशासनिक केंद्रों के रूप में देखते हैं, उस समय भी ये क्षेत्र प्रशासनिक गतिविधियों के महत्वपूर्ण पड़ाव थे।
डाक बंगले क्यों बनाए गए थे?
इस दौर के प्रशासनिक दौरे की चर्चा Dak Bungalow के बिना अधूरी है।
अधिकारी लंबी दूरी तय करते थे। हर स्थान पर आधुनिक होटल या सरकारी अतिथि गृह की व्यवस्था नहीं थी। इसलिए डाक बंगले प्रशासनिक यात्राओं के लिए महत्वपूर्ण पड़ाव बने।
अधिकारी वहां रुकता, स्थानीय अधिकारियों से मिलता, अगले इलाके के निरीक्षण की तैयारी करता और फिर आगे बढ़ता।
इस दृष्टि से डाक बंगला केवल रहने की जगह नहीं था। वह उस समय के मोबाइल प्रशासन का आधारभूत ढांचा था।
विभागीय अधिकारी भी मैदान में जाते थे
यह व्यवस्था केवल Collector तक सीमित नहीं थी।
स्वास्थ्य, शिक्षा, सिंचाई, लोक निर्माण और स्थानीय निकायों से जुड़े अधिकारियों के दौरे भी होते थे। जालौन से संबंधित पुराने रिकॉर्डों में स्थानीय निकायों, पुलिस, स्वास्थ्य और अन्य प्रशासनिक संस्थाओं की स्थिति का विस्तृत विवरण मिलता है।
यह बताता है कि ब्रिटिश प्रशासन में ‘Inspection’ एक अलग प्रशासनिक गतिविधि थी—अधिकारी किसी संस्था का निरीक्षण करता, उसकी कमियां दर्ज करता और फिर उस पर रिपोर्ट बनती थी।
लेकिन इसे लोकतांत्रिक जनसंपर्क समझना भूल होगी
यहां इतिहास का दूसरा पक्ष भी उतना ही जरूरी है।
ब्रिटिश अधिकारी जनता के बीच इसलिए नहीं जाते थे कि औपनिवेशिक शासन लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व के सिद्धांत पर आधारित था। उसका मूल उद्देश्य राजस्व, कानून-व्यवस्था और शासन पर नियंत्रण बनाए रखना था।
इसलिए अंग्रेजी दौर की ‘Touring’ व्यवस्था को आदर्श जनवादी प्रशासन कहना इतिहास के साथ अन्याय होगा।
लेकिन इससे एक प्रशासनिक सबक जरूर निकलता है।
अधिकारी जब मौके पर जाता है तो उसे वह दिखाई दे सकता है जो फाइल नहीं दिखाती।
आज की प्रशासनिक व्यवस्था के लिए सबक
आज अधिकारी के पास वह सब कुछ है जो ब्रिटिश दौर के अधिकारी के पास नहीं था—मोबाइल फोन, इंटरनेट, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, GIS, CCTV, ऑनलाइन डैशबोर्ड और डिजिटल शिकायत प्रणालियां।
लेकिन इसके बावजूद एक चीज का विकल्प तकनीक पूरी तरह नहीं बन सकती—प्रत्यक्ष निरीक्षण।
किसी गांव की सड़क का फोटो और सड़क पर चलने का अनुभव एक जैसा नहीं है।
अस्पताल की ऑनलाइन रिपोर्ट और मरीजों की लाइन में खड़े लोगों से बातचीत एक जैसी नहीं है।
थाने के अपराध आंकड़े और वहां आने वाले फरियादियों की वास्तविक स्थिति एक जैसी नहीं है।
इसीलिए आज भी प्रशासनिक दौरे का महत्व बना हुआ है।
फर्क सिर्फ इतना है कि तब दौरा मजबूरी था, आज विकल्प
ब्रिटिश अधिकारी के पास तत्काल सूचना के साधन नहीं थे, इसलिए उसे मैदान में जाना पड़ता था। आज अधिकारी के पास सूचना के इतने साधन हैं कि वह बिना निकले भी बहुत कुछ जान सकता है।
लेकिन बहुत कुछ जान लेना और वास्तविकता को स्वयं देख लेना दो अलग बातें हैं।
इसलिए आधुनिक प्रशासन के लिए ब्रिटिश काल से सीख यह नहीं होनी चाहिए कि पुरानी व्यवस्था वापस लाई जाए। सीख यह होनी चाहिए कि—
डिजिटल निगरानी + प्रत्यक्ष निरीक्षण + जनता से सीधा संवाद = प्रभावी जिला प्रशासन।
जालौन के पुराने गजेटियर और Settlement Reports इस बात के ऐतिहासिक प्रमाण हैं कि एक समय प्रशासनिक अधिकारी अपने अधिकार क्षेत्र को केवल नक्शे और फाइलों में नहीं, बल्कि यात्रा करके समझते थे।
और शायद यही आज के प्रशासन के लिए सबसे उपयोगी सवाल है—
अधिकारी जिले का कितना हिस्सा फाइलों से जानता है और कितना हिस्सा अपने पैरों से चलकर?






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