इस तरह से हाल भारी हो रहे
अपने सर के बाल भारी हो रहे

अब कमाने और खाने के लिए
रोज़ के जंजाल भारी हो रहे

हाशिये पर दूसरे खर्चे सभी
आज रोटी,दाल भारी हो रहे

दोस्त भी कहने लगे अहमक मुझे
उनके इस्तकबाल भारी हो रहे

ज़िंदगी तो हो चुकी कब की फना
अधमरे कंकाल भारी हो रहे

भीख के मानिंद मुश्किल से मिले
हमको वो इक़बाल भारी हो रहे

चुभ रहे आतंक के चेहरे बहुत
और भी हर साल भारी हो रहे

सुगम

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