
सोवियत संघ की तरह चीन क्रांति निर्यात नही करता, लेकिन दुनियां के हर कोने पर अपने आधिपत्य के लिए जोर-जबर्दस्ती की हद तक गोटियां बिछाता रहता है। चीनी राष्ट्रवाद के चरमपंथ का प्रतीक है जिसकी तपन में भारत भी झुलस रहा है। डोकलाम में वह फिर हेकड़ी पर उतर आया है और पाकिस्तान की पीठ पर उसने ऐसा हाथ रखा है कि वह पिददी न पिददी का शोरबा होते हुए अमेरिका को भी आंखे दिखाने से बाज नही आ रहा। भारत मोदी युग में विदेश नीति के नये समीकरणों की पींगें बढ़ा रहा है। जिसकी प्रतिक्रिया में चीन भारत की कड़ी घेराबंदी की रणनीति पर अमल में जुटा है। दूरगामी तौर पर इससे भारत के लिए हालात मुश्किल होते जा रहे हैं।
एक टीवी चैनल पर कुछ दिनों पहले जेएनयू के पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार और भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता संवित पात्रा के बीच गरमागरम बहस चल रही थी। संवित पात्रा जब कन्हैया कुमार के सामने दलीलों में कमजोर पड़ने लगे तो उन्होंने कन्हैया कुमार को नीचा दिखाने के लिए कहा कि मैं आप लोगों की तरह चीन से देश के खिलाफ काम करने के लिए पैसा नही लेता। भारतीय जनता पार्टी के नेताओं को अभी भी विश्वास है कि देश के कम्युनिस्ट नेताओं के वर्ग को चीन से फंडिंग होती है। जबकि हकीकत यह है कि भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों पर पैसा खर्च करने में चीन को कोई दिलचस्पी नही है। क्योंकि आज की हालत में भारत की कम्युनिस्ट पार्टियां किसी हस्तक्षेप के लायक नही बची हैं। यहां तक कि चारु मजूमदार के समय ही साम्यवादी चरमपंथी संगठनों को मदद से भी चीन ने दूरी बनाना शुरू कर दी थी। चीन को यह अच्छी तरह इलहाम है कि भारत में विध्वंसक गतिविधियों में राजनैतिक विचारधारा पर आधारित संगठनों के जरिए नही, धार्मिक चरमपंथियों के जरिये ही कामयाबी हासिल की जा सकती है और उन्हें अपने तरीके से पोषित और प्रोत्साहित करने में पाकिस्तान आदि के कंधे पर बंदूक रखकर चीन द्वारा भूमिका भी निभाई जा रही है।

दरअसल चीन कम्युनिस्ट सिद्धांतों से संचालित देश नही है। यहां तक कि आज तो उसे कम्युनिस्ट मुखोटे की भी बहुत परवाह नही है। चीन में राष्ट्रवादी चरमपंथी सक्रिय हैं जिसके हिसाब से सारी दुनियां को अपने जूते की नोक के नीचे रखने और व्यापारिक साम्राज्यवाद स्थापित करने के लिए उसके द्वारा शहजोरी की पराकाष्ठा की जाती है। चीन की यह भावना भारत को फिर से विश्व गुरू के दर्जे पर ले जाने के देश के अनुदारवादियों की महत्वाकांक्षा से मेल खाती है। इसलिए उन्हें अपने सबसे घनघोर शत्रु होने के नाते भी और अपनी महत्वाकांक्षा को साकार रूप देने के भी नाते चीन के पैतरों पर बारीक निगाह रखनी चाहिए। राष्ट्रवादी कशिश के लिए कैसे काम किया जाना चाहिए यह खेल से लेकर सांस्कृतिक मामलों तक चीन की नीति में झलकता है। दूसरी ओर भारत का राष्ट्रवाद केवल मुसलमानों के परिपीड़न में ही संतृप्त हो जाता है। लेकिन व्यवहार में अपनी पहचान को लेकर भारतीयों की कटिबद्धता बेहद खोखली है।
जैसे खेलों में क्रिकेट का भारतीयता की पहचान से क्या संबंध है या देश में इस खेल की आम लोगों के शारीरिक उत्थान के लिए क्या उपयोगिता है। फिर भी फैशन के अंधानुकरण की मानसिकता के कारण क्रिकेट को सिर पर चढ़ाकर रखा जाता है। क्या भारत बाजार द्वारा अपने स्वार्थ के लिए आयातित त्योहारों को बढ़ावा देने का उस तरह प्रतिकार कर सकता है जैसे चीन ने अपने देश में स्कूलों में क्रिसमस न मनाने का निर्देश जारी कर प्रदर्शित किया था। इस नाम पर कि पराये त्योहार मनाने से हमारे परंपरागत त्योहारों का महत्व समाप्त हो रहा है। भाषा, खानपान, पहरावे, तौर-तरीकों आदि में आयातित व्यवस्थाओं के लिए जितनी ललक भारत में है क्या उसके रहते इस देश के लोग अपनी अस्मिता के सवाल पर जुझारू हो सकते हैं।
चीन द्वारा हर देश को धमकाकर रखने के पीछे कटटर राष्ट्रवाद का प्रतिफलन है। भारत ने मोदी सरकार के कार्यकाल में अपनी विदेश नीति में महत्वपूर्ण बदलाव किये। उसने अपनी निर्गुट पहचान को समाप्त कर अमेरिका से घनिष्टता का रास्ता पकड़ा। शुरू में इसका फायदा महसूस हुआ। विश्व मंचों पर भारत को अतिरिक्त आदर मिलने लगा। पाकिस्तान के शैतानी इरादे अमेरिका का इकतरफा सपोर्ट का रवैया बदल जाने से पस्त हुए। भारत ने रक्षा मामलों में मजबूती के लिए इजराइल से सामीप्य बढ़ाने की नीति पर अमल किया। इसका भी स्वागत तात्कालिक रूप से हुआ। लेकिन इससे चीन सतर्क हो गया। उसने पाकिस्तान को अपनी मुटठी में करके उसे इतनी ताकत दे दी कि वह अमेरिका की भी परवाह करना छोड़ रहा है। मुबंई पर आतंकवादी हमले के मास्टर माइंड हाफिज मोहम्मद सईद को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहिद खाकान अब्बासी ने साहिब कहकर महिमा मंडित करते हुए कहा कि जब उनके खिलाफ पाकिस्तान में कोई केस ही नही है तो उन पर कार्रवाई कैसे की जा सकती है। यह भारत की बहुत बड़ी हेठी करने की करतूत थी। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा था कि अमेरिका द्वारा 33 अरब डालर की सहायता आतंकवाद को रोकने के नाम पर पाकिस्तान को देना बहुत बड़ी मूर्खता थी। क्योंकि पाकिस्तान ने हक्कानी नेटवर्क के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई न कर अमेरिका को गुमराह किया। साथ ही पाकिस्तान को दी जाने वाली एक अरब डालर की सहायता भी उन्होंने बतौर प्रताड़ना रोक दी। भारत उम्मीद कर रहा था कि इससे पाकिस्तान में खलबली मच जायेगी और वह दिखावे के लिए ही सही लेकिन हाफिज मोहम्मद सईद व मसूद अजहर जैसे भारत में आतंकवादी हमले कराने के जिम्मेदार मोलानाओं पर कार्रवाई करेगा। लेकिन यह तभी स्पष्ट हो गया था कि पाकिस्तान पर अमेरिकी दबाव का कोई नतीजा नही निकलेगा जब पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष कमर जावेद बाजवा ने उल्टा अमेरिका को पाठ पढ़ाने की कोशिश की। पाकिस्तान ने कहा कि अमेरिका 33 अरब डालर की सहायता की बात करता है जबकि इसमें 14 अरब डालर तो अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों को रणनीतिक सहयोग देने में ही खर्च हो गये थे। उसने जताया कि अमेरिका की सहायता में रोक की पाकिस्तान को कोई परवाह नही है क्योंकि चीन से उसे भरपूर मदद मिल रही है उल्टे अमेरिका को संबंध बिगाड़ने में मुश्किल हो सकती है क्योंकि अफगानिस्तान में नाटो सैनिकों के लिए आपूर्ति का एक मात्र रास्ता पाकिस्तान से होकर जाता है। अमेरिका भी इस हकीकत को समझकर नरम पड़ गया है।
इन्ही सब कारणों से पाकिस्तान के हौसले बुलंद हैं और वह अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर भारत के साथ युद्ध विराम का लगातार उलंघन कर रहा है। हाफिस सईद और मसूद अजहर के खिलाफ कार्रवाई के लिए तैयार नही है। उधर इजराइल से संबंधों के बाद ईरान भी भारत से सशंकित हुआ है जिसका फायदा उठाने के लिए पाकिस्तान और चीन की जोड़ी सक्रिय है। डोकलाम में चीन का पीछे हटना रणनीतिक था अब उसने डोकलाम के पास निर्माण शुरू करके भारत के लिए खतरा बढ़ाने का खुले आम संकेत देना शुरू कर दिया है। चीन, नेपाल व अन्य पड़ोसी देशों को भी भारत के खिलाफ उकसाने में लग गया है। कुल मिलाकर भारत के लिए परिस्थितियां चुनौतीपूर्ण होती जा रही हैं। मोदी सरकार को चीनी व्यूह रचना की काट के लिए कारगर नीति बनानी होगी।






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