उरई(जालौन)। जनपद में गुटका का प्रचलन जोरो से बढ़ रहा हैं। इस मामले में औरते मर्दाे से आगे निकलने की होड़ में हैं। जबकि ग्रामीण इलाको में गुटका तथा पा अपनी शान बढ़ाने के लिए कर रही हैं। जबकि गुटका खाने से क्या-क्या नुसान हैं इसकी ओर उनका ध्यान नहीं जा रहा हैं। जर्दा उक्त गुटका पान मशाले तथा तम्बाकू की अधिक मात्रा वाले गुटके नये प्रचार के साथ तथा स्टीकरों के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में व्यापार अधिक प्रगति कर रहा हैं। आकर्षक रेपरो की बजह से शोकिया शिकार हो रहे हैं। शोकिया अक्सर देखे गये हैं कि आर्थिक व शारीरिक रूप से नुकशान उठाने के बाद बहुत पछताते हैं और गुटका से होने वाले नुकशान की गिरफ्त में बहुत ज्यादा नेटवर्क बढ़ता जा रहा हैं। चाहे शहर व ग्रामीण इलाका हर जगह गुटका पान की गुमटिया देखी जा रही हैं। जहाँ पर कही तरह के रंगीन गुटके टगें हुये देखे जा सकते हैं। इसमें कोई संदेश नहीं हैं कि इसको खाने से शारीरिक तौर पर नुकसान होता हैं लेकिन इसकी लोग जरा भी परवाह नहीं करते है। गुमटियों में युवकों का जमाबड़ा लगा रहता हैं और दिनभर इसका सेवन करते कोई-कोई तो गुटका का इतना आदी हो जाता है कि 1 बार में दो-दो पुडिय़ों का सेवन करने लगता हैं। महिलाये गुटका की इतनी आदी हो गयी हैं कि बार-बार घर से ना निकलना पड़े इसलिये गुटका का पूरा पाकिट मांग कर रख लेती इसलिये गुटका सेवन की मात्रा बढ़ती जाती हैं। पहले लोग सुपारी का सेवन करते थे और अपने थैली साथ में रखते थे। अब थैली की प्रथा समाप्त हो गयी हैं। अब उसकी जगह गुटकों ने ले ली हैं। अगर देखा जाये तो पहले शादी तथा बरातों में पान खिलाने का रिवाज था। शादी के समय बरात जब दरवाजे पहुचंती थी उस समय बरातियों के स्वागत के लिये प्लेट में पान चाँदी के वर्क के साथ रखे मिलते थे लेकिन अब पान की जगह अलग-अलग रंग के गुटके रखे मिलते और इस बढ़ते चलन के लिये तरह-तरह के विज्ञापन जनता को गुमराह कर रहे हैं। यही कारण हैं कि कम्पनियाँ बाजार में मौत बेच रही हैं। प्रशासन इसके रोक के लिए सुस्त नजर आ रहे हैं।

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