“सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।” — दुष्यंत कुमार
जालौन में तैनात जॉइंट मजिस्ट्रेट (न्यायिक) रिंकू सिंह राही से आखिर शासन ने जवाब तलब कर लिया है। नियुक्ति विभाग ने उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी कर 15 दिन में स्पष्टीकरण मांगा है। जिलाधिकारी राजेश कुमार पांडेय की रिपोर्ट के आधार पर जारी इस नोटिस में प्रशासनिक अनुशासन, सेवा आचरण और कार्यप्रणाली से जुड़े कई गंभीर सवाल उठाए गए हैं। नोटिस में 27 जून को बिना अनुमति कलेक्ट्रेट से फर्नीचर आदि ले जाकर नवनिर्मित तहसील परिसर पहुंचने, वहां मीडिया बुलाकर धरना-हंगामा करने, नगर पालिका की जांच में निर्धारित प्रक्रिया से अलग जाकर कार्रवाई करने, अधीनस्थों और अधिवक्ताओं के साथ कथित अमर्यादित व्यवहार तथा सोशल मीडिया पर शासन की नीतियों और प्रशासनिक कार्यप्रणाली की आलोचना करने जैसे बिंदु शामिल हैं।
मगर इस पूरे प्रकरण में सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिस अधिकारी पर प्रशासनिक कामकाज को सार्वजनिक प्रदर्शन में बदलने के आरोप हैं, उन्होंने शासन का कारण बताओ नोटिस भी सार्वजनिक कर दिया। एक्स पर नोटिस की प्रति साझा करते हुए उसे ‘प्रेम पत्र’ बताना और उसके साथ जिलाधिकारी से यह सवाल करना कि मुख्यमंत्री से उनकी मुलाकात के अगले दिन शासन को रिपोर्ट भेजना महज संयोग था या कुछ और—यह घटनाक्रम बताता है कि राही और प्रशासन के बीच टकराव अब बंद कमरों की फाइलों तक सीमित नहीं है।
यहीं से दुष्यंत कुमार की पंक्तियां नए अर्थ ग्रहण करती हैं। सिर्फ हंगामा खड़ा करना मकसद नहीं होना चाहिए। सवाल यह है कि राही की कार्यशैली में व्यवस्था बदलने की कोशिश अधिक दिखाई देती है या हर प्रशासनिक असहमति को सुर्खी बनाने की प्रवृत्ति?
राही की ईमानदारी और भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी प्रतिबद्धता पर बहस नहीं है। लेकिन सरकारी सेवा में व्यक्तिगत ईमानदारी किसी अधिकारी को संस्थागत अनुशासन से मुक्त नहीं करती। लोकतांत्रिक प्रशासन व्यक्ति की इच्छा से नहीं, नियम और प्रक्रिया से चलता है।
उरई नगर पालिका की जांच इसका उदाहरण है। सभासदों की शिकायतों की जांच के लिए अपर जिलाधिकारी (नमामि गंगे) की अध्यक्षता में समिति बनाई गई थी। राही भी उसके सदस्य थे। बाद में उनकी जगह एसडीएम जालौन राकेश कुमार सोनी को जांच के लिए नामित किए जाने की जानकारी उन्हें दी गई थी। इसके बावजूद 29 जुलाई को वे स्वयं नगर पालिका पहुंच गए और जांच शुरू कर दी। नोटिस में आरोप है कि इस दौरान समिति अध्यक्ष और अन्य सदस्य मौजूद नहीं थे तथा बड़ी संख्या में निजी लोग और मीडिया मौजूद थे। तीन-चार घंटे तक जांच चलने और दस्तावेज स्कैन कराने का भी उल्लेख है।
यदि राही को लगता था कि उन्हें गलत तरीके से जांच से हटाया गया है तो वे इस फैसले को चुनौती दे सकते थे। यदि आदेश की जानकारी नहीं मिली थी तो उसे स्पष्ट करा सकते थे। यदि नगर पालिका सहयोग नहीं कर रही थी तो जिलाधिकारी अथवा शासन को रिपोर्ट भेज सकते थे। लेकिन जांच को मीडिया के सामने ले जाने से उसका स्वरूप ही बदल गया।
जांच का उद्देश्य तथ्य जुटाना होता है, दृश्य पैदा करना नहीं।
इसी तरह 27 जून की घटना में भी नोटिस के अनुसार कक्ष आवंटन के विवाद को लेकर राही कलेक्ट्रेट से फर्नीचर आदि लेकर नवनिर्मित तहसील परिसर पहुंचे और वहां मीडिया बुलाकर धरना-हंगामा किया। अपर जिलाधिकारी (वित्त एवं राजस्व) की ओर से उन्हें बताया गया था कि उनका न्यायालय कक्ष और चैंबर कलेक्ट्रेट में ही रहेगा।
यहां सवाल कक्ष का नहीं, तरीके का है। किसी अधिकारी को यदि अपने साथ अन्याय लगता है तो उसके पास जिलाधिकारी से लेकर शासन तक शिकायत करने के रास्ते खुले हैं। लेकिन यदि हर प्रशासनिक असहमति धरने, प्रदर्शन और कैमरों तक पहुंचने लगे तो फिर प्रशासनिक व्यवस्था और सार्वजनिक आंदोलन के बीच अंतर ही क्या रह जाएगा?
नोटिस में सोशल मीडिया को लेकर भी शासन ने आपत्ति जताई है। आरोप है कि राही ने शासन की योजनाओं, नीतियों और प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सार्वजनिक आलोचनात्मक टिप्पणियां कीं तथा उच्चाधिकारियों को लिखे पत्रों को भी सार्वजनिक किया।
यहां फिर एक बुनियादी सवाल है—क्या सरकारी अधिकारी को सरकार की हर नीति से सहमत होना चाहिए? निश्चित रूप से नहीं। अधिकारी की असहमति लोकतंत्र में अस्वाभाविक नहीं है। लेकिन सेवा में रहते हुए असहमति दर्ज कराने और अपने ही प्रशासनिक तंत्र को सार्वजनिक मंच पर लगातार कठघरे में खड़ा करने में अंतर है।
राही का तरीका इस सीमा को बार-बार चुनौती देता दिखाई देता है।
नोटिस में अधीनस्थ कर्मचारियों, अधिवक्ताओं और स्थानीय लोगों की शिकायतों का भी उल्लेख है। अधिवक्ताओं ने उनकी कार्यशैली के विरोध में न्यायालय के बहिष्कार तक का निर्णय लिया था। इन शिकायतों की सत्यता का अंतिम फैसला अभी नहीं हुआ है, लेकिन उनका नोटिस में शामिल होना यह जरूर बताता है कि विवाद अब किसी एक घटना तक सीमित नहीं रहा।
इस पूरे प्रकरण में एक विडंबना दिखाई देती है। राही जिस प्रशासनिक व्यवस्था की कमियों को उजागर करना चाहते हैं, उसी व्यवस्था का हिस्सा भी हैं। अगर व्यवस्था भ्रष्ट है तो उसे सुधारना उनका अधिकार ही नहीं, दायित्व भी है। लेकिन व्यवस्था सुधारने और व्यवस्था को सार्वजनिक रूप से अपमानित करने के बीच एक महीन रेखा होती है। उस रेखा के पार जाने पर अधिकारी की व्यक्तिगत लोकप्रियता भले बढ़ जाए, संस्था की गरिमा घट सकती है।
और यही सबसे बड़ी चिंता है।
प्रशासन कोई अखाड़ा नहीं है, जहां हर विवाद में विजेता और पराजित तय हों। यहां लक्ष्य व्यवस्था को चलाना और नागरिकों को न्याय देना है। जिलाधिकारी और एसडीएम का आपसी मतभेद यदि रोज की खबर बन जाए, जांच कैमरों के सामने होने लगे और शासन को भेजे गए पत्र सोशल मीडिया पर पहुंचने लगें तो प्रशासनिक तंत्र में भरोसा कैसे कायम रहेगा?
राही के समर्थक कह सकते हैं कि यदि व्यवस्था में गड़बड़ी है तो उसे उजागर करना जरूरी है। बात सही है। लेकिन सवाल यह है कि उजागर करने का सबसे प्रभावी रास्ता कौन सा है—हर बात को वायरल करना या ऐसी कार्रवाई कराना जो रिकॉर्ड में स्थायी परिणाम छोड़ जाए?
एक अधिकारी की सफलता का पैमाना यह नहीं हो सकता कि वह कितनी बार सुर्खियों में आया। असली पैमाना यह है कि उसके कारण कितने भ्रष्ट लोग दंडित हुए, कितनी शिकायतों का समाधान हुआ और कितनी संस्थागत प्रक्रियाएं बेहतर हुईं।
इसलिए शासन का नोटिस रिंकू राही के खिलाफ अंतिम फैसला नहीं है। उनका जवाब आना बाकी है और आरोप सही हैं या नहीं, यह प्रक्रिया से तय होगा। लेकिन यह नोटिस उनकी कार्यशैली पर गंभीर सवाल जरूर खड़ा करता है।
राही के पास अब एक महत्वपूर्ण अवसर है। वे अपने जवाब में तथ्यों के साथ अपना पक्ष रखें। यदि उनके खिलाफ कार्रवाई गलत है तो उसे साबित करें। यदि कहीं प्रक्रिया की चूक हुई है तो उसे स्वीकार करें। और यदि सचमुच व्यवस्था बदलना चाहते हैं तो अपनी ऊर्जा को सुर्खियों से निकालकर संस्थागत परिणामों में लगाएं।
क्योंकि जनता को ऐसा अधिकारी नहीं चाहिए जिसकी हर सुबह नई खबर हो।
जनता को ऐसा अधिकारी चाहिए जिसके काम से व्यवस्था में कुछ नया दिखाई दे।
दुष्यंत कुमार की पंक्तियों में असली चुनौती यही है—हंगामा नहीं, सूरत बदलनी चाहिए।
और सूरत बदलने के लिए कैमरे के सामने खड़ा होना आसान है; व्यवस्था के भीतर रहकर उसे बदलना कहीं ज्यादा कठिन।
राही को अब यही साबित करना है कि उनकी लड़ाई सुर्खियों के लिए नहीं, व्यवस्था बदलने के लिए है।







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