समकालीन भारतीय राजनीति के फलक पर दृष्टिपात करें तो एक अत्यंत विदारक, विचित्र और गहरा अंतर्विरोध साफ उभरकर सामने आता है। सत्ता और संगठन के शीर्ष पर बैठे कर्णधारों में ‘हिंदू हृदय सम्राट’ के रूप में स्वयं को स्थापित करने और स्वीकार कराने की आकांक्षा इतनी तीव्र, आक्रामक और लपलपाती हुई दिखाई देती है कि जनसभाओं के मंचों से लेकर सोशल मीडिया के गलियारों तक समूचे समाज को एकमुश्त लामबंद करने के लिए भारी-भरकम नारों की बौछार की जा रही है। ‘बँटोगे तो कटोगे’ और ‘एक रहोगे तो सेफ रहोगे’ जैसे नारों की गूंज से निरंतर यह संदेश प्रसारित करने का प्रयास किया जाता है कि सनातन समाज को अपनी सदियों पुरानी आंतरिक भिन्नताओं, क्षेत्रीयताओं और जातियों की संकीर्ण दीवारों को ढहाकर एक अभेद्य, संगठित और विराट हिंदू पहचान में समाहित हो जाना चाहिए। दूर से देखने पर यह आख्यान एक समरस, सांस्कृतिक रूप से जागृत और एकजुट समाज की रचना का आह्वान जान पड़ता है, परंतु जैसे ही कोई इस भाषणबाज़ी की चमकदार परत को हटाकर चौराहों, कस्बों और मतदान केंद्रों की जमीनी सियासत की नब्ज टटोलता है, यह पूरा भव्य विमर्श अपनी ही विरोधाभासी दीवारों से टकराकर तार-तार हो जाता है।

जातियों की मंडी और खंडित गौरव के प्रतीक

धरातल पर सनातन धर्म को एक सूत्र में पिरोने वाले किसी विराट सांस्कृतिक विचार का सम्मान नहीं हो रहा, बल्कि वहां होड़ मची है उन ऐतिहासिक राजाओं, सरदारों और मध्यकालीन योद्धाओं की प्रतिमाएं लगाने की, जिन्हें किसी एक जाति या उपजाति के संकीर्ण गौरव के रूप में भुनाया जा सके। चुनाव दर चुनाव इतिहास को जातियों की खदान मानकर उसमें से अपने-अपने वोट बैंक के अनुकूल प्रतीक तराशे जा रहे हैं।

प्रतिहार सम्राट मिहिर भोज, जिन्होंने कभी अरब आक्रांताओं को भारत की सीमाओं से बाहर खदेड़कर सनातन संस्कृति की रक्षा की थी, आज उत्तर भारत के कस्बों में गुर्जर और राजपूत समाज के बीच लाठी-डंडों, मुकदमों और जातिगत विद्वेष की भेंट चढ़ा दिए गए हैं। राजा सुहेलदेव, जिन्होंने सालार मसूद गाजी को परास्त कर सनातन धर्म का ध्वज ऊंचा रखा था, उन्हें समूचे राष्ट्र का रक्षक मानने के बजाय जातियों की चौखट पर राजनीतिक सौदेबाजी का मोहरा बना दिया गया है। पृथ्वीराज चौहान से लेकर अनंगपाल तोमर तक को एक साझा राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बनाने के बजाय जातिगत श्रेष्ठता के क्षुद्र दावों में उलझाकर रख दिया गया है।

यह विडंबना इसलिए आत्मघाती है क्योंकि जब सत्ता स्वयं जातिगत अस्मिताओं को सहलाकर उनका चुनावी तुष्टीकरण करती है, तब वह एकता का आह्वान करने के अपने ही नैतिक आधार को भस्म कर देती है। जिस समाज को सुबह-शाम जातिगत नायक की अफीम पिलाई जा रही हो, वह मतदान के दिन या राष्ट्रीय संकट के समय ‘अखंड हिंदू’ बनकर कैसे सोच सकता है। यह राजनीति मंच से हिंदू एकता की दुहाई देती है और पर्दे के पीछे जाकर जातियों के अहंकार को पोषित करती है।

गुप्त सम्राटों का विस्मरण: एकीकृत हिंदुत्व का उपेक्षित अध्याय

इस क्षुद्र और संकीर्ण सियासत की सबसे त्रासद परिणति यह हुई है कि भारतीय इतिहास के वे वास्तविक महानायक पूरी तरह विस्मृति के अंधकार में धकेल दिए गए हैं, जिन्होंने उस दौर में सनातन संस्कृति का पुनरुद्धार किया था जब वह लगभग नेपथ्य में जा चुकी थी। हम बात कर रहे हैं गुप्त वंश के उन महान सम्राटों की—जिन्होंने बिखरे हुए आर्यावर्त को एक राजनीतिक और सांस्कृतिक सूत्र में पिरोया, बौद्ध और कुषाण प्रभाव के बाद वैदिक धर्म को उसका गौरव लौटाया, भागवत धर्म को लोकव्यापी बनाया, पाषाण मंदिरों की नींव रखी और पुराणों का संकलन कर उस पौराणिक हिंदू धर्म की ठोस संरचना की, जिसकी पूजा आज करोड़ों भारतीय करते हैं।

जो गुप्त सम्राट एकीकृत, बौद्धिक और सांस्कृतिक हिंदुत्व के सबसे स्वाभाविक, तार्किक और निर्विवाद सर्वोच्च प्रतीक हो सकते थे, आज सत्ता या समाज में उनका कोई नामलेवा नजर नहीं आता। न उनकी प्रतिमाएं लगाने की कोई होड़ है, न उनके नाम पर कोई राजनीतिक रैली होती है। इसका कारण केवल इतना है कि आज के भारत में गुप्त सम्राटों के नाम पर लामबंद होने वाला कोई आक्रामक और संगठित ‘जातिगत वोट बैंक’ मौजूद नहीं है। गुप्त सम्राट किसी एक उपजाति की बपौती नहीं बन सकते, इसलिए वे आज की जातिवादी राजनीति के लिए अनुपयोगी हो गए हैं। यह अंतर्विरोध आज के दौर की हिंदुत्ववादी राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना और बौद्धिक खोखलेपन को उजागर करता है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: कुषाण काल और सनातन धर्म का रक्षात्मक दौर

गुप्त वंश के ऐतिहासिक अवदान को समझने के लिए उस कालखंड की स्थिति पर विचार करना आवश्यक है, जिससे पूर्व सनातन धर्म गुजर रहा था। मौर्य साम्राज्य, विशेषकर सम्राट अशोक के काल में बौद्ध धर्म को अभूतपूर्व राजकीय संरक्षण मिला था, जिससे वैदिक यज्ञों, अनुष्ठानों और कर्मकांडों को भारी आघात पहुंचा था। उसके बाद भारत पर यवन, शक, पहलव और कुषाणों जैसे विदेशी आक्रांताओं के निरंतर हमले हुए।

कुषाण शासक कनिष्क के दौर में बौद्ध धर्म अपनी महायान शाखा के साथ मध्य एशिया से लेकर गंगा के मैदानों तक छा गया था। उस समय सनातन धर्म बेहद रक्षात्मक और असंगठित अवस्था में था। वैदिक अनुष्ठान केवल कुछ गिने-चुने राजपरिवारों और आश्रमों तक सिमट गए थे, और आम जनता के लिए सनातन धर्म में कोई ऐसा सुलभ, भक्ति-प्रधान और संगठित ढांचा नहीं था जो बौद्ध विहारों की भव्यता और संघ की संगठित शक्ति का मुकाबला कर सके। सनातन समाज के पास न तो कोई स्थायी पाषाण मंदिर थे, न ही कोई ऐसा सर्वमान्य शास्त्र संकलन जो जनसाधारण को जोड़ सके। चौथी शताब्दी के आरंभ में पाटलिपुत्र की पावन धरा पर जब गुप्त राजवंश का अभ्युदय हुआ, तब भारत को न केवल राजनीतिक विघटन से मुक्ति मिली, बल्कि सनातन धर्म को उसका सबसे सशक्त, संगठित और स्वर्णिम संरक्षक प्राप्त हुआ।

चंद्रगुप्त प्रथम और समुद्रगुप्त: संप्रभुता और वैदिक यज्ञों का पुनरोद्धार

गुप्त वंश के संस्थापक श्रीगुप्त और उनके पुत्र घटोत्कच के बाद चंद्रगुप्त प्रथम ने जब 319 ईस्वी में सत्ता संभाली, तो उन्होंने ‘महाराजाधिराज’ की उपाधि धारण कर पाटलिपुत्र को पुनः आर्यावर्त की धड़कन बना दिया। लिच्छवि राजकुमारी कुमारदेवी के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित कर उन्होंने प्राचीन वैदिक मर्यादाओं और गणतांत्रिक शक्तियों का समन्वय किया तथा 319-320 ईस्वी में ‘गुप्त संवत’ की शुरुआत कर भारतीय काल-गणना को एक नया सांस्कृतिक प्रभात दिया।

उनके पश्चात उनके पुत्र समुद्रगुप्त सिंहासन पर बैठे, जिन्हें इतिहासकार विंसेंट स्मिथ ने ‘भारत का नेपोलियन’ कहा, यद्यपि समुद्रगुप्त का अवदान नेपोलियन से कहीं अधिक विराट और रचनात्मक था। समुद्रगुप्त के दरबारी कवि हरिषेण द्वारा रचित प्रयाग प्रशस्ति उनके अदम्य पराक्रम की साक्षी है। समुद्रगुप्त ने उत्तर भारत के नौ राजाओं का समूल उन्मूलन कर पूरे क्षेत्र को एक सुदृढ़ केंद्रीय प्रशासन में बांधा और दक्षिण भारत के बारह राजाओं को धर्म-विजय की नीति के तहत परास्त कर उनका राज्य लौटाया। उन्होंने पूरे भारतवर्ष को एकछत्र शासन के तहत लाकर चक्रवर्ती सम्राट की प्राचीन वैदिक अवधारणा को धरातल पर उतारा।

सदियों से उपेक्षित पड़े सर्वोच्च वैदिक अनुष्ठान ‘अश्वमेध यज्ञ’ का उन्होंने भव्य आयोजन किया और ‘अश्वमेधपराक्रमः’ की उपाधि धारण कर सोने के सिक्के जारी किए। समुद्रगुप्त केवल एक अजेय धनुर्धर नहीं थे, वे स्वयं उच्च कोटि के संगीतज्ञ और ‘कविराज’ थे। उनके सिक्कों पर उन्हें वीणा बजाते हुए दिखाया गया, जिसने सनातन धर्म की ललित कलाओं, संगीत और सामवेद की परंपरा को पुनः राजप्रासादों में प्रतिष्ठित किया।

चंद्रगुप्त विक्रमादित्य और कुमारगुप्त: सांस्कृतिक उत्कर्ष व ज्ञान-परंपरा

समुद्रगुप्त के बाद उनके पुत्र चंद्रगुप्त द्वितीय, जिन्हें इतिहास ‘विक्रमादित्य’ के नाम से जानता है, सनातन धर्म के सांस्कृतिक पुनर्जागरण के सर्वोच्च शिखर बने। विक्रमादित्य ने पश्चिमी भारत के गुजरात और काठियावाड़ से अंतिम शक क्षत्रप रुद्रसिंह तृतीय का वध कर भारत भूमि से विदेशी शक सत्ता का समूल नाश किया और ‘शकारि’ कहलाए। चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने विधिवत रूप से स्वयं को ‘परमभागवत’ घोषित किया और भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ को गुप्त साम्राज्य का राजकीय प्रतीक बनाया। दिल्ली के कुतुब परिसर में खड़ा प्रसिद्ध महरौली का लौह स्तंभ, जो सोलह सौ वर्षों से खुले आसमान के नीचे बिना जंग लगे खड़ा है, वास्तव में चंद्रगुप्त विक्रमादित्य द्वारा विष्णुपद पहाड़ी पर स्थापित किया गया ‘विष्णुध्वज’ ही है, जो उस काल के अद्वितीय धातुकर्म और वैष्णव चेतना का अमर प्रमाण है। विक्रमादित्य के दरबार में महाकवि कालिदास, धन्वंतरि, वराहमिहिर और अमरसिंह जैसे नवरत्न सुशोभित थे। कालिदास ने ‘रघुवंशम्’ में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के आदर्शों को अमर किया, ‘कुमारसंभवम्’ में शिव-पार्वती और कार्तिकेय के आख्यान को दिव्य काव्य दिया और ‘अभिज्ञानशाकुंतलम्’ में सनातन आश्रम संस्कृति की गरिमा को पूरे विश्व में स्थापित किया।

विक्रमादित्य के पश्चात कुमारगुप्त प्रथम ‘महेंद्रादित्य’ ने चार दशकों से अधिक समय तक साम्राज्य की सीमाओं को अक्षुण्ण रखा, अश्वमेध यज्ञ किया और अपने सिक्कों पर मयूर पर आरूढ़ भगवान कार्तिकेय की छवियां अंकित करवाईं। कुमारगुप्त की सबसे बड़ी ऐतिहासिक देन विश्वविख्यात नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना थी, जिसने सिद्ध किया कि सनातन सम्राट अन्य दर्शनों के अध्ययन के प्रति कितने उदार और समावेशी थे।

स्कंदगुप्त: हूण-मर्दन और सनातन सभ्यता की रक्षा

कुमारगुप्त के अंतिम दिनों में जब मध्य एशिया से बर्बर, क्रूर और हिंसक ‘हूणों’ का सैलाब भारत की सीमाओं पर उमड़ा, तब कुमारगुप्त के वीर पुत्र स्कंदगुप्त ने मोर्चा संभाला। हूण वे दुर्दांत आक्रांता थे जिन्होंने तत्कालीन रोमन साम्राज्य को घुटनों पर ला दिया था और फारस के सासानी साम्राज्य को तहस-नहस कर दिया था। यदि स्कंदगुप्त ने हूणों को न रोका होता, तो भारतीय सनातन संस्कृति और प्राचीन ज्ञान-परंपरा का वही हश्र होता जो यूरोप और मध्य एशिया की सभ्यताओं का हुआ था।

स्कंदगुप्त ने अकेले अपने बाहुबल से हूणों की बर्बर सेना को ऐसी भीषण पराजय दी कि अगले आधी सदी तक वे भारत की ओर देखने का साहस न कर सके। जूनागढ़ अभिलेख गर्व से उद्घोष करता है कि स्कंदगुप्त ने म्लेच्छों के दर्प को चूर-चूर कर दिया। संकट के उस दौर में भी स्कंदगुप्त ने सुदर्शन झील के विशाल बांध का पुनर्निर्माण कराया और भगवान विष्णु के चक्रभृत मंदिर की स्थापना की। भितरी का स्तंभ लेख उनके अप्रतिम पराक्रम और वैष्णव अनुराग की गाथा गाता है।

सनातन धर्म का संस्थागत ढांचा: मंदिर स्थापत्य, पुराण और अग्रहार

गुप्त सम्राटों का सबसे युगांतरकारी योगदान यह था कि उन्होंने सनातन धर्म को केवल राजाओं और यज्ञशालाओं की सीमाओं से बाहर निकालकर उसे आम जनमानस के दैनिक जीवन, कला और समाज का अभिन्न अंग बना दिया। आज हम जिस हिंदू धर्म का आचरण करते हैं, उसकी आधारशिला गुप्त काल में ही रखी गई थी। गुप्त काल से पूर्व सनातन धर्म में स्थायी पाषाण मंदिरों की कोई परंपरा नहीं थी; उपासना यज्ञवेदी या काष्ठ मंडपों तक सीमित थी। गुप्त सम्राटों और उनके सामंतों ने भारतीय इतिहास में पहली बार पत्थरों और पकी हुई ईंटों के मंदिरों का निर्माण प्रारंभ किया।

देवगढ़ का दशावतार मंदिर, जहां शेषशायी विष्णु और गजेंद्र मोक्ष की अद्वितीय मूर्तियां हैं, भारतीय स्थापत्य में ‘शिखर’ और पंचायतन शैली का पहला प्रमाण बना। कानपुर के भीतरगांव का मंदिर पकी हुई ईंटों और टेराकोटा से बना दुनिया का प्राचीनतम जीवित हिंदू मंदिर है। विदिशा के निकट उदयगिरि की गुफाओं में वराह अवतार की विराट पाषाण प्रतिमा ने पृथ्वी के उद्धार के आख्यान को अमर कर दिया। भूमरा का शिव मंदिर, नचना कुठार का पार्वती मंदिर और तिगवा का विष्णु मंदिर—ये सब वे संरचनाएं थीं जिन्होंने सनातन धर्म को ‘गर्भगृह’, ‘मंडप’, ‘शिखर’ और ‘प्रदक्षिणा पथ’ जैसी स्थायी अवधारणाएं दीं और आगे चलकर नागर शैली के रूप में पूरे उत्तर भारत में मंदिरों के जाल का विस्तार किया।

इसी काल में भगवान विष्णु के दशावतार सिद्धांत को सामाजिक चेतना में गहराई से स्थापित किया गया। वराह द्वारा सागर से पृथ्वी को उबारने की कथा विदेशी आक्रांताओं से भारत भूमि की रक्षा का सांस्कृतिक रूपक बन गई। अठारह महापुराणों—जैसे विष्णु पुराण, वायु पुराण, मत्स्य पुराण और भागवत पुराण—का अधिकांश संपादन गुप्त काल में ही संपन्न हुआ। पुराणों ने वेदों के गूढ़ दर्शन को सरल, बोधगम्य कथाओं में ढालकर समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाया। रामायण और महाभारत को उनका अंतिम और मानकीकृत स्वरूप इसी काल में प्राप्त हुआ, तथा महाभारत में समाहित श्रीमद्भगवद्गीता सनातन का सर्वोच्च दार्शनिक ग्रंथ बनकर उभरी। नारद, याज्ञवल्क्य, बृहस्पति और कात्यायन स्मृतियों ने न्याय और समाज व्यवस्था को संहिताबद्ध किया।

इसके अतिरिक्त, गुप्त सम्राटों ने ‘अग्रहार’ प्रथा के माध्यम से ब्राह्मणों, आचार्यों और गुरुकुलों को कर-मुक्त गांव दान में दिए, जहां राजसत्ता का कोई हस्तक्षेप नहीं होता था। इन अग्रहारों ने स्वायत्त रूप से सनातन ज्ञान-विज्ञान, व्याकरण, दर्शन और आयुर्वेद को सुरक्षित रखने वाले स्थायी दीपस्तंभों का कार्य किया। इसी स्वर्णिम वातावरण में आर्यभट्ट ने शून्य, दशमलव प्रणाली और पृथ्वी के घूर्णन का सिद्धांत देकर विज्ञान को सनातन चिंतन से जोड़ा, और वराहमिहिर ने खगोलशास्त्र को नए क्षितिज दिए।

जातिवादी राजनीति का पाखंड और गुप्तों की उपेक्षा का कारण

अब उस कड़वे सच का सामना कीजिए जो आज के राजनीतिक परिदृश्य पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है। यदि गुप्त सम्राट सनातन धर्म के इतने विराट उद्धारक, रक्षक और निर्माता थे, तो आज की तथाकथित हिंदुत्ववादी राजनीति में वे पूरी तरह अदृश्य क्यों हैं? इसका सीधा उत्तर आज की राजनीति का वह पाखंड है जो भाषणों में ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ का मुखौटा पहनता है लेकिन ज़मीन पर केवल ‘जातिगत अंकगणित’ के इशारे पर नाचता है। आज चौराहों पर मूर्तियां इतिहास के योगदान को देखकर नहीं, बल्कि आगामी चुनाव में संबंधित जाति के वोटों की संख्या देखकर लगाई जाती हैं। यदि किसी मध्यकालीन राजा के नाम पर किसी इलाके के दो लाख वोट साधे जा सकते हैं, तो रातों-रात उसे राष्ट्रनायक बनाकर पेश कर दिया जाएगा, भले ही उसके नाम पर दो पड़ोसी जातियों के बीच तलवारें खिंच जाएं।

गुप्त सम्राटों के साथ सबसे बड़ी राजनीतिक ‘कमी’ यह है कि वे किसी एक जाति की जागीर नहीं बन सकते। इतिहासकार आज तक यह तय नहीं कर पाए हैं कि गुप्त सम्राट वैश्य थे, क्षत्रिय थे या ब्राह्मण; और स्वयं गुप्त शासकों ने कभी खुद को किसी जातिगत दायरे में बांधा ही नहीं। वे केवल ‘परमभागवत’ थे, ‘आर्यावर्त के संप्रभु’ थे। आज चूंकि कोई ऐसी संगठित ‘गुप्त जाति’ नहीं है जो चुनाव में वोट बैंक बनकर हुंकार भरे, इसलिए आज की अवसरवादी राजनीति को समुद्रगुप्त और चंद्रगुप्त विक्रमादित्य की याद नहीं आती।

‘बँटोगे तो कटोगे’ का नारा उछालने वाले नेता जब खुद जातियों के आधार पर अलग-अलग महापुरुषों को बांटते हैं, तो वे उस हिंदू एकता की जड़ में ही मट्ठा डाल रहे होते हैं। एक तरफ हिंदू समाज को एक होने का उपदेश देना और दूसरी तरफ जातियों के संकीर्ण अहकारों को तुष्ट करने के लिए जातियों के अलग-अलग नायक खड़े करना—यह हिंदुत्व की राजनीति का सबसे आत्मघाती विरोधाभास है। इस बौद्धिक आलस्य और उथले राष्ट्रवाद के कारण आज का समाज अपने वास्तविक स्वर्ण युग के निर्माताओं को भूलकर क्षुद्र जातिगत लड़ाइयों में उलझ गया है। गुप्त काल का स्मरण करने के लिए एक गहरी बौद्धिक, ऐतिहासिक और दार्शनिक दृष्टि चाहिए, जो मंदिर वास्तुकला की भव्यता, कालिदास के काव्य, आर्यभट्ट के विज्ञान और स्कंदगुप्त के अदम्य शौर्य को एक समग्र सभ्यतागत चेतना के रूप में देख सके। आज की उथली राजनीति को इस गहन विमर्श से कोई मतलब नहीं है; उसे केवल तात्कालिक चुनावी ध्रुवीकरण की सस्ती खुराक चाहिए।

सनातन के वास्तविक जागरण का मार्ग

इतिहास का पहिया साक्षी है कि तात्कालिक राजनीतिक लाभ के लिए गढ़े गए संकीर्ण प्रतीक कभी किसी समाज को दीर्घकालिक स्थायित्व और एकता नहीं दे सकते। यदि वर्तमान भारतीय नेतृत्व सचमुच सनातन धर्म को सशक्त, अखंड और कालजयी बनाना चाहता है, तो उसे जातियों के खंडित गौरव की इस अंधी दौड़ से तुरंत बाहर निकलना होगा। देश के प्रमुख नगरों में समुद्रगुप्त, चंद्रगुप्त विक्रमादित्य और स्कंदगुप्त के भव्य राष्ट्रीय स्मारक बनने चाहिए जो किसी जाति के नहीं, बल्कि भारत की अखंड संप्रभुता, ज्ञान-परंपरा और शौर्य के प्रतीक हों।

स्कंदगुप्त द्वारा हूणों को परास्त कर सनातन सभ्यता को बचाने के इतिहास को हर नागरिक तक पहुंचाया जाना चाहिए, और सभी महापुरुषों को जातियों की संकीर्ण बेड़ियों से मुक्त कर समूचे राष्ट्र की साझी विरासत घोषित किया जाना चाहिए। जब तक भारतीय राजनीति जातियों की मंडी से बाहर निकलकर गुप्त वंश के उन महान सम्राटों को अपने वैचारिक केंद्र में स्थापित नहीं करती, तब तक ‘हिंदू हृदय सम्राट’ बनने का हर दावा एक अधूरा छलावा रहेगा और ‘बँटोगे तो कटोगे’ का नारा अपने ही अंतर्विरोधों के बोझ तले दम तोड़ता रहेगा। सनातन का वास्तविक जागरण खंडित जातीय अहकारों में नहीं, बल्कि गुप्तकालीन भारत की उस विराट, सर्वसमावेशी और स्वर्णिम एकात्मता में ही संभव है।

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