उरई। जनपद की हालत प्रशासनिक कबाड़खाने की बना दी गई है। कई अधिकारी अपने मनोरोग का आभास देने वाले रवैये से जनमानस में सरकार की छवि को गिराने में लगे हैं।
जनपद को शायद शासन की निगाह में लावारिस मान लिया गया है। जिसके चलते यहां विचित्र मानसिकता के ऐसे अधिकारी तैनात किये जा रहे हैं जो कि फील्ड की नियुक्ति के लिए सिरे से अनफिट कहे जा सकते हैं।
उदाहरण के तौर पर नगरीय विकास अभिकरण के सहायक परियोजना अधिकारी सुनील कुमार हैं। बताया जाता है कि एक दिन उनके दफ्तर में सदर विधायक डूडा की योजनाओं की जानकारी लेने पहुंचे। सदर विधायक ने जैसे ही अपना परिचय दिया सुनील कुमार बोले आप विधायक है तो मैं क्या करूं। उनकी इस हिमाकत से एक क्षण के लिए तो सदर विधायक स्तब्ध रह गये। लेकिन इसके बाद उनका मिजाज कड़ा हो गया। कुछ अनहोनी होती इसके पहले दफ्तर के समझदार बाबू दौड़ पड़े और उन्होंने विधायक को बताया कि वे उनकी बातों का बुरा न मानें क्योंकि सुनील कुमार दिमागी तौर पर डिस्टर्ब हैं। इसके बाद बाबू ने ही विभाग की योजनाओं आदि के बारे में विधायक को ब्रीफ किया। बहरहाल अगर मानसिक रूप से सुनील कुमार की स्थिति वास्तव में ठीक नही है तो उन्हें डूडा के एपीओ की अहम कुर्सी क्यों दी गई। ऐसे में तो उन्हें इलाज की जरूरत थी। जिसके लिए सरकार को समय रहते बंदोबस्त करना चाहिए वरना अभी तो विधायक से उनका अप्रिय प्रसंग टल गया। लेकिन किसी दिन वे कोई बड़ी समस्या खड़ी कर सकते हैं।
मुख्य पशु चिकित्साधिकारी आरपी सिंह गौर का मामला अलग है। उनके साथ पशुधन को बढ़ावा देने का दायित्व जुड़ा है। जिसकी अपनी खास अहमियत है। पर उनके विभाग में ढाई करोड़ रुपये का बजट आ गया है जबकि उनका कार्यकाल संक्षिप्त रह गया है। बजट के खर्चे में गड़बड़ी हो जाने से फंड और पेंशन रुक जाने की चिंता ने उन्हें इतना अधिक ग्रसित कर लिया है कि वे पशु पालकों का मार्गदर्शन करना तो दूर उनसे बात तक करने की मनाही करा देते हैं। इसलिए विभाग की गतिविधियां पंगु होकर रह गई हैं।
युवा कल्याण अधिकारी मनोज कुमार यादव को अपने को सबसे सुपीरियर अधिकारी समझने की बीमारी है। जिसके कारण उनका बोलचाल इतना खराब है कि कोई उनके दफ्तर में फटकता नही है। युवाओं को संगठित करके उन्हें रचनात्मक अभियान से जोड़ने की जिम्मेदारी निभाने के कोई लक्षण मनोज यादव में नजर नही आते।
जिले के सांसद और विधायक चुन-चुन कर अटपटे अधिकारियों की जिले में की गई पोस्टिंग से बेहद परेशान हैं। लेकिन वे शिकायत करें तो किससे। व्यक्तिगत बातचीत में माननीय बताते हैं कि महाराज जी को अधिकारी के दोष बताने में बहुत जोखिम है। क्योंकि इससे वे चिढ़ जाते हैं। इसलिए कोई नही चाहता कि ऐसा करके उनका कोप भाजन बने।







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