0 हिन्दी रंगमंच दिवस पर अनुकृति रंगमंडल का परिसंवाद
कानपुर। हिन्दी रंगमंच दिवस के अवसर पर आज मंगलवार को अनुकृति रंगमंडल कानपुर ने मजदूर सभा भवन ग्वालटोली में परिसंवाद आयोजित किया।
परिसंवाद की शुरुआत करते हुए वरिष्ठ रंगकर्मी डा.ओमेन्द्र कुमार ने कहाकि संसाधनों के अभाव में भी हिन्दी रंगमंच निरंतर आगे बढ़ रहा है। आजादी के बाद से अब तक कानपुर में बुनियादी सुविधाओं से सुसज्जित एक भी सरकारी प्रेक्षागृह न बन सका। आज अधिकांश युवा रंगकर्मियों में वह लगन, एकाग्रता और निष्ठा नहीं दिखती जो 70 या 80 तक नजर आती थी।
वरिष्ठ रंगकर्मी कृष्णा सक्सेना ने बताया कि आज के ही दिन आधुनिक हिन्दी रंगमंच का पहला हिन्दी नाटक, शीतला प्रसाद त्रिपाठी कृत जानकीमंगल का मंचन, काशी नरेश के सहयोग से 03 अप्रैल 1868 (चैत्र शुक्ल एकादशी, विक्रम संवत 1925) में वाराणसी स्थित नाच-घर में किया गया था। इस नाटक में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने लक्ष्मण की भूमिका निभाई।
थिएटर आर्टिस्ट विजयभान सिंह ने कहाकि लखनऊ की संस्था नक्षत्र के कुमुद नागर और संगीत नाट्य भारती के सहयोग से 3 अप्रैल 1968 में इस दिवस की शतवार्षिकीय मनाई गई। 1975 में उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी के माध्यम से डा. शरद नागर ने 3 अप्रैल को विश्व हिन्दी रंगमंच दिवस के रूप में लोकप्रिय बनाने की पहल की।
रंगकर्मी सुरेश श्रीवास्तव ने कहाकि आज युवा फिल्मों में जाने के लिए थिएटर को सीढ़ी बनाते हैं, उनमें धैर्य का अभाव है।
रंगकर्मी जौली घोष, राघुवेन्द्र प्रजापति, दीपिका सिंह, उमेश शुक्ला, संजय शर्मा, शुभी मेहरोत्रा, सम्राट यादव, धीरेन्द्र कुमार, हिमांशु कटारिया, कमल गौतम, आकाश सिंह, अंकिता, आरती शुक्ला, सुषमा अरोड़ा ने भी विचार व्यक्त किये।

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