उरई। महात्मा गांधी के पास देश भर में अनुयायियों की फौज थी जो उनकी सेवा का कैसा भी मौका मिल जाने में गौरव महसूस करती थी। लेकिन सिद्धांतों को जीने वाले बापू को किसी से चाकरी कराना पसंद नही था। स्वावलंबन की शिक्षा भी बापू अपनी हर सभा में लोगों को देते थे लेकिन उनकी नसीहत और लोगों की तरह पर उपदेश कुशल बहुतेरे वाली नही थी। 1929 में गांधी जी जब जालौन जनपद में आये तब इसकी झलक यहां के लोगों ने प्रत्यक्ष देखी।
गांधी जी ने 1929 में खादी के प्रचार के लिए उत्तर प्रदेश भ्रमण के दौरान जालौन जिले की भी यात्रा की थी। बुंदेलखंड के बापू के नाम से प्रसिद्ध रहे प्रदेश के पूर्व कैबिनेट मंत्री स्व. चतुर्भुज शर्मा ने अपनी प्रसिद्ध किताब विद्रोही की आत्मकथा में बापू के उरई प्रवास के कई रोचक संस्मरण दिये हैं। स्व. चतुर्भुज शर्मा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे और गांधी जी के जिले के कार्यक्रम के आयोजक मंडल में शामिल रहे थे।
उन्होंने लिखा है कि गांधी जी के साथ कस्तूरबा भी थीं। जब वे चलने लगे तो पता चला कि उनका गमछा गायब है। गांधी जी इससे परेशान हो गये। यह देखकर आयोजकों ने कहा कि बापू खादी भंडार से आपके लिए दूसरा गमछा मंगाये देते हैं तो गांधी जी ने उनकी तरफ आंखे तरेर दीं जिससे आयोजक सहम गये। इसी बीच धीरे से कस्तूरबा ने उन्हें बताया कि गांधी जी अपने हाथ से बुना हुआ गमछा ही पहनते हैं। तांकि स्वावलंबन के सिद्धांत को चरितार्थ कर सकें। इसलिए वे अब अतिरिक्त समय निकालकर ज्यादा कताई करेगें तांकि नया गमछा तैयार कर सकें। गांधी जी की महानता का यह पहलू स्व. चतुर्भुज शर्मा की किताब के माध्यम से जानकर वर्तमान पीढ़ी भी उनके प्रति श्रद्धा से विहव्ल हो जाती हैं।

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