राज्यसभा चुनाव का बिगुल बजते ही गुजरात में भाजपा ने कांग्रेस के क्रमशः 2 और 1 विधायकों को फिर तोड़ लिया है। यह कोई हृदय परिवर्तन तो है नही और न ही ऐसा है कि पाला बदल करने वाले विधायक पहले से अपनी पार्टी में छटपटा रहे हों। पर पंडित जी ने उन्हें ऐसा करने के लिए राज्यसभा चुनाव के समय का मुहुर्त बता रखा हो। जिससे उनको प्रतीक्षा करनी पड़ रही हो। यह स्पष्ट रूप से सत्तारूढ़ पार्टी द्वारा प्रतिद्वंदी दल में गलत ढंग से तोड़फोड़ का मामला है। देश में लोकतंत्र के बहुत खराब समय में यह एक और बड़े अपशकुन के रूप में देखा जाना चाहिए।
उच्च परंपराओं पर टिके संसदीय लोकतंत्र के आदर्श
ब्रिटेन के संसदीय लोकतंत्र को हमारे देश में कुछ दशक पहले तक आदर्श माना जाता रहा है। वहां के लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि संविधान में बहुत कुछ लिखने की कोशिश नही की गई है क्योंकि वृहद संविधान कई बार लोकतंत्र के मुक्त प्रवाह को बांधने का कारण भी बन सकता है। पर उच्च परंपराएं निर्मित करने में वहां की पार्टियों ने बहुत निष्ठा से जोराजोरी की है।
संपूर्ण क्रांति का रूमान
देश में जब पहला सत्ता परिवर्तन हुआ तो विपक्ष से सत्ता में आये नेताओं ने इस तत्व को सर्वोच्चता पर ध्यान में रखा। नेता प्रतिपक्ष को कैबिनेट मंत्री का दर्जा देने से लेकर कई मामलों में ऐसी परंपराएं स्थापित की गई जो भारतीय राजनीति के बड़प्पन को दुनियां के सामने उजागर करें। लोक नायक जय प्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति की परिकल्पना उच्च परंपराओं से समृद्ध लोकतंत्र का दस्तावेज थी। 1989 में जब दूसरा सत्ता परिवर्तन हुआ उस समय भी ऐसी ही दिशा में उत्कट ललक तत्कालीन नेतृत्व द्वारा प्रदर्शित की गई। यहां तक कि चुनाव के लिए उद्योगपतियों पर पार्टियों की निर्भरता समाप्त करने पर भी विचार हुआ।
भाजपा भी रही सपनों में सांझीदार
राजनीति में उच्च परंपराओं के प्रादुर्भाव के सिलसिले को उक्त दोनों ही बार भाजपा ने भी उत्साह पूर्वक समर्थन दिया। जबकि इस बिसात पर कांग्रेस खलनायक के रूप में उभरती रही थी। 1977 में तो जनसंघ ने जनता पार्टी में अपने को विलय ही कर दिया था और 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार को बनाने के लिए बाहर से समर्थन दिया था। बाद में अब भाजपा सीधे सत्ता में आई तो पुरानी पीढ़ी के पार्टी के नेतृत्व ने इस नीति को और उदात्त रूप मे आगे बढ़ाया। 1997 में जब उत्तर प्रदेश में मायावती से समर्थन वापस लेकर भाजपा ने खुद सरकार बनाने का फैसला किया तो कांग्रेस से दल बदल कर आये सभी विधायकों को उसे मंत्री बनाना पड़ा। जिसे लेकर इन्ही संस्कारों के कारण कल्याण सिंह सहज नही थे पर राजनाथ सिंह ने प्रदेशाध्यक्ष की हैसियत से अपने को चाणक्य साबित करने के लिए उन्हें मजबूर कर दिया था।
संक्रमण काल में क्षेत्रीय दलों की नकारात्मक भूमिका
इसी बीच क्षेत्रीय दलों का युग भारतीय राजनीति में प्रभावी हुआ। जिसमें उच्च परंपराएं और नैतिक मूल्यों को जमकर रौंदा गया। बैशाखियों की मोहताज हो चुकी कांग्रेस दो बार केंद्र में सत्ता संभालने के दौरान उन्हें नियंत्रित नही कर सकी बल्कि अस्तित्व रक्षा के लिए उसे लोकतंत्र का गला घोटने वाले उनके इस दलदल में खुद को रखना पड़ा। इसकी अनिवार्य परिणति व्यापक परिवर्तन के रूप में होनी थी सो वह समय भी आ गया जब भाजपा अकेले दम पर सत्ता पर काबिज होने में सफल हो गई।
आपाद धर्म तक कुछ जायज थी तोड़फोड़
देश में तब तक नीतियों के स्तर पर सर्वसम्मत जैसा ढांचा काम कर रहा था। जिसमें भाजपा की सहमति भी शामिल थी। पर अकेली दम पर भाजपा को बहुमत मिलने का मौका जब आया तब मंजर इसलिए बदल चुका था क्योंकि पार्टी का नेतृत्व अब पुराने संस्कार वाले नेताओं के हाथ से निकल कर सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट में विश्वास रखने वाली बाजार संस्कृति द्वारा गढ़े गये नेताओं के हाथ में पहुंच चुका था। दूसरी ओर अब भाजपा पर अपने मूल एजेंडे को लागू करने का भी दबाव था जिसके चलते उसे सर्वस्वीकृति से चले आ रहे नीतियों के ढांचे की लक्ष्मण रेखा को लांघना ही था। बहरहाल इस तकाजे के मददेनजर मोदी के पहले कार्यकाल में जब ऑपरेशन तोड़फोड़ को अंजाम दिया जाने लगा तो इसे आपाद धर्म की मजबूरी समझा गया। भाजपा के सत्ता में आने के बाद उसके वैचारिक उफान को अपनी तार्किक परिणति पर पहुंचने का मौका देना इतिहास का तकाजा था।
डरे हुए तानाशाह जैसा आचरण
लेकिन अब जबकि भाजपा का चक्रवर्ती साम्राज्य पूरे देश में कायम हो चुका है, अपने मंसूबे पूरे करने के लिए उसके सामने कोई रुकावट नही रह गई है और विपक्ष की उपस्थिति प्रतीकात्मक भर की रह गई है तो उसमें आत्मविश्वास की कोई कमी नही होनी चाहिए और पार्टी व संघ के नेताओं की जो शालीन सुस्ंकृत छवि रही है उसके अनुरूप उसका कार्य व्यवहार सामने आना चाहिए। पर प्रतिकूल फैसले देने वाले जजों का नाटकीय स्थानांतरण हो या बचेखुचे विपक्ष में लगातार सेंधमारी इन हरकतों से लगता नही है कि नव निर्माण के लिए भाजपा घात लगाने की युद्ध कालीन मानसिकता से उबरने की कोशिश कर रही हो। जबकि यह उसकी ऐतिहासिक भूल साबित हो सकता है।
क्यों हटा रहे हो सारे सैफ्टीवॉल्व
भारत जटिल विविधताओं से भरा देश है। जिसके चलते तनाव के तूफानों का मचलते रहना देश की नियति है। इन्हें समेटने और सहेजने वाला समायोजन प्रस्तुत करना यहां के कर्ता-धर्ताओं की सूझबूझ की सबसे बड़ी परीक्षा है। लोकतंत्रीय शास्त्र के टर्म में कहा जाये तो विश्वसनीय विपक्ष को फलने-फूलने देना यहां सत्ता की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है क्योंकि व्यवस्था का उससे बड़ा सेफ्टीवॉल्व कोई नही होता। इसके अलावा विभिन्न स्तरों पर उद्वेलन के आवेगों को निकलने का रास्ता देने के लिए उदार और सहिष्णु माहौल की जरूरत है जबकि इन आवेगों को टाइट ढक्कन लगाकर दबा देने की कल्पना खतरनाक है क्योंकि इससे मामला क्वथनांक तक पहुंच सकता है।
मुटठी भर नियंता वर्ग तय करता है देश की तकदीर
पर सवाल इस बात का है कि इस देश का मुटठी भर नियंता वर्ग क्या चाहता है। मंडल क्रांति के पहले की कसौटियां अलग थीं। 1977 में जब पहला सत्ता परिवर्तन हुआ था प्रधानमंत्री पद के लिए जो नाम पहले सामने आया वह बाबू जगजीवन राम का था। पर उन्हें रोकने के लिए ऐसी हड़बड़ी मची कि मोरारजी देसाई जैसे रूक्ष और जिददी नेता के नाम पर सहमति बन गई। जाहिर है कि जनता पार्टी सामाजिक उपनिवेशवाद के सदियों पुराने किले में सेंध लगाने में कोई भूमिका अदा नही कर सकी थी इसलिए लोकतंत्र के खिलौने को लेकर देश के नियंता वर्ग में कोई संशय पैदा होने का सवाल नही था बल्कि इसके बाद यह खिलौन और आकर्षक बनाया जाये यह शगल चल पड़ा। सत्ता के यवनिका पतन के फेज नं. 2 में अचानक एक बड़ा तूफान आया जब मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू करने और बाबा साहब अंबेडकर को मरणोपरांत भारत रत्न देने के प्रतीकात्मक फैसले के साथ एक ऐसा वैचारिक शंखनांद कर दिया गया जिससे सामाजिक उपनिवेशवाद की चूलें हिल गईं। पहली बार वर्ण व्यवस्था के दमन के खिलाफ दलितों और पिछड़ो में एक साथ संवेदना फूटी। स्वाभाविक है कि इससे सामाजिक उपनिवेश के किले में अंदरखाने जोरदार कोहराम मच जाना था। इस टर्निंग प्वाइंट पर नियंता वर्ग में लोकतंत्र के जोखिम को लेकर सतर्कता शुरू हुई और इसकी परिणति उसे खोखला करने के रूप में सामने आने लगी। नरसिंहाराव ने अपनी अल्पमत सरकार चलाने के लिए सांसदों की खरीद फरोख्त के द्वारा एक नई नीव डाली जो लोकतंत्र की प्रमाणिकता पर बड़ा प्रहार था। लेकिन जानबूझ कर इसे गंभीर मुददा नही बनने दिया गया। मीडिया का भी अपना वर्ग चरित्र है इसलिए उसने भी दूरगामी तौर पर इस बेहद घातक परंपरा को लेकर कोई तल्खी नही दिखाई।
प्रायोजित था 1993 का गठबंधन
रामो-वामो की सुनामी को अपने ही गढ़ में दफन करने के लिए उत्तर प्रदेश में 1993 में कराया गया गठबंधन भी प्रायोजित था। जिसकी परिणति अंततोगत्वा पिछड़ों में वर्ण व्यवस्था के दमन को लेकर संवेदना के तिरोहित होने के रूप में हुई। बावजूद इसके नरसिंहाराव दौर के बाद एक बार फिर वे तत्व सत्ता के केंद्र में जा पहुंचे जो सामाजिक उपनिवेश को लगातार झकझोर रहे थे। इनका सबक नियंता वर्ग में लोकतंत्र के लिए पूरी तरह मोह भंग के बतौर दर्ज होना लाजिमी था।
सोचो कि धरती क्यों गोल है
इस बीच इतिहास का एक चक्र पूरा हो गया है और पृथ्वी गोल है इसको साबित करते हुए इतिहास फिर अपने पुराने बिंदु पर लौट आया है। ऐसे दौर में लोकतंत्र को उज्जवल और सुदृढ़ करने की अपेक्षा वर्तमान कर्ता-धर्ताओं से की जाना शायद नादानी के अलावा और कुछ नही है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से सेवा निवृत्त होकर राजनेता बने रंजन गोगोई के कुछ दिनों पूर्व किये गये ट्वीट के निहितार्थ को तलाशा जाये तो वर्तमान कर्ता-धर्ताओं की लोकतंत्र को लेकर मंशा कुछ स्पष्ट हो सकती है।

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