उरई। जिले की तीनों विधानसभा सीटों का चुनावी परिदृश्य पिछले चुनाव से एकदम अलग है। 2017 के चुनाव में यहां भी राष्ट्रवाद के तड़के के साथ साम्प्रदायिक धुव्रीकरण की रणनीति ने सारी संकीर्णताओं को फना कर दिया था लेकिन इस बार यह खुमारी उतर चुकी है तो जातिवाद का फन सिर उठाये खड़ा नजर आ रहा है। तीनों क्षेत्रों में चुनाव का भविष्य इसी पैमाने पर तौला जाने लगा है।
माधौगढ़ विधानसभा क्षेत्र की सामाजिक संरचना के कारण यह क्षेत्र गत वर्ष के अपवाद को छोड़कर बसपा का गढ़ रहा है। इस बार बसपा ने जिले में अपने परंपरागत समीकरण को बहाल करके नया ताना बाना बुना है जिसके कुछ फायदे हैं तो कुछ नुकसान भी। लेकिन बसपा के कामयाब गणित में मुसलमानों में उसके प्रति कुरेदे गये संदेह के कारण बिखराव देखा जा रहा है तो समाजवादी पार्टी यहां इस बार मुख्य मुकाबले के केन्द्र बिन्दु में आ गई है इससे सबसे ज्यादा प्रभावित भाजपा हो रही है जिसके उम्मीदवार निवर्तमान विधायक मूलचन्द्र निरंजन को अपनी सीट बचाये रखने के लिए लोहे के चने चबाने पड़ रहे हैं। हालांकि ब्राह्मण मतदाता अभी भी यहां बड़ी तादात में भाजपा से ही जुड़े हैं। जनाधिकार पार्टी के उम्मीदवार मूलशरण कुशवाहा पर भी राजनीतिक प्रेक्षकों की निगाह टिकी हुई है। जनाधिकार पार्टी के संस्थापक बाबू सिंह कुशवाहा के साथ कुशवाहा बिरादरी की बड़े पैमाने पर सहानुभूति जुड़ी है इसके अलावा मूलशरण कुशवाहा की भी सजातीय वर्ग में खासी पैठ है। देखना है कि इसकी बदौलत वे सजातियों का कितना वोट समेट पाते हैं। मूलशरण कुशवाहा की जितनी बढ़त होगी उतना ही बसपा उम्मीदवार को नुकसान होगा। इसलिए चुनावी आंकलन में उनके महत्व से इनकार नहीं किया जा सकता।
उरई में महेन्द्र कठेरिया की उम्मीदवारी निरस्त करके समाजवादी पार्टी ने दयाशंकर वर्मा के रूप में पुराने चावल पर दाव लगाया है जिसके बाद यहां भी समाजवादी पार्टी फिर मुख्य मुकाबले में आ गई है तो बसपा उम्मीदवार सत्येन्द्र सिंह श्रीपाल के नाम का शोर भले ही बहुत न सुनाई दे रहा हो लेकिन पार्टी के जातिगत गुणा भाग की वजह से वे किसी से कम नहीं हैं। उधर भाजपा से निवर्तमान विधायक गौरी शंकर वर्मा फिर एक बार मैदान में हैं लेकिन इस बार उन्हें भी कोई लहर न होने के कारण मुश्किल स्थितियों का सामना करना पड़ रहा है।
कालपी में मुकाबला बहुकोणीय है। हालांकि पहली नजर में भाजपा समर्थित निषाद पार्टी के उम्मीदवार छोटे सिंह चैहान कमल चुनाव निशान न होने से लड़खड़ाते दिख रहे हैं लेकिन वे व्यक्तिगत पहचान के मोहताज नहीं हैं इसलिए क्या गुल खिला पाते हैं यह देखना दिलचस्प हो गया है। समाजवादी पार्टी ने कद्दावर नेता पूर्व विधायक विनोद चतुर्वेदी को उम्मीदवार बनाकर अपने पक्ष में हलचल पैदा कर दी है तो बसपा उम्मीदवार श्याम पाल उर्फ छुन्ना बहुजन गोल बंदी के चलते सशक्त बने हुए हैं। तथापि उनके सामने बसपा की इस बार बन चुकी छवि के कारण मुसलमानों का समर्थन जुटाने की बड़ी चुनौती है।
पिछले कई चुनावों से 2007 में उरई से जब यहां की सीट आरक्षित नहीं हुई थी कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में हुई विनोद चतुर्वेदी की जीत और 2012 में कालपी से हुई उमाकांती सिंह की जीत के अपवाद को छोड़कर कांग्रेस के लिए जिले में राजनीतिक रेगिस्तान की स्थिति बनी हुई है जिसमें फिर से पहले जैसी अपनी फसल उगाने के लिए पार्टी ने बड़ी मशक्कत की है। उरई सीट से हाईप्रोफाइल सेवानिवृत्त वरिष्ठ पीसीएस अधिकारी उर्मिला सोनकर को उम्मीदवार बनाया है। माधौगढ़ से युवा चेहरे के बतौर पार्टी ने सिद्धार्थ दिवौलिया को उम्मीदवार बनाया है। इस सीट पर वे अकेले किसी दल के ब्राह्मण उम्मीदवार हैं। जिसका फायदा उन्हें मिल रहा है। पर कांग्रेस की सबसे मजबूत स्थिति कालपी में है जहां पूर्व विधायक उमाकांती सिंह उम्मीदवार हैं। उनके पति पूर्व ब्लाक प्रमुख सुरेन्द्र सिंह सरसेला की सभी वर्गों में जबरदस्त पैठ है। जिसके कारण 2012 में जिले में कांग्रेस का प्रभाव शून्य होने के बावजूद उमाकांती सिंह विधायक निर्वाचित हो गई थी। देखना यह है कि इस बार वे फिर अपनी पत्नी के पक्ष में इस इतिहास को दोहरा पायेंगे या नहीं।







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