उत्तर प्रदेश विधानसभा के वर्तमान चुनाव में मतदाताओं का निरूत्साह गौर करने योग्य रहा है जबकि मतदान के लिए लोगों को जागरूक करने की पर्याप्त कवायदें सतत जारी हैं। पश्चिम बंगाल में जिस तरह की वोटिंग हुई थी उसकी तुलना  में उत्तर प्रदेश के लोगों के बारे में यही कहा जायेगा कि उन्होंने बेहद ठंडापन दिखाया। इसकी बजह तलाशी जानी चाहिए क्योंकि जब तक मतदान को कम से कम 80 प्रतिशत तक नहीं पहुंचाया जाता और जीतने वाले उम्मीदवार को 50 प्रतिशत से अधिक मत की प्राप्ति सुनिश्चित नहीं होती तब तक सफल लोकतंत्र की तस्वीर अधूरी ही रहेगी।

नदारत दिखा भाजपा का सघन तानाबाना-
भारतीय जनता पार्टी ने संगठन के स्तर पर भारी मतदान के लिए सघन ताना बाना बुना था। वूथ समितियों के गठन के बाद उनके विधिवत सत्यापन से लेकर पन्ना प्रमुखों की नियुक्ति तक लम्बा चैड़ा संजाल बिछाया गया था लेकिन धरातल पर मतदान के दिन जिम्मेदार कार्यकर्ताओं की मेहनत पार्टी के दावे के अनुरूप नहीं दिखायी दी। दूसरी तरफ अन्य दलों की स्थिति भी बहुत बेहतर नहीं कही जा सकती। प्रमुख प्रतिद्वंदी दल के रूप   में   उभरे समाजवादी पार्टी की बात की जाये तो अस्तित्व रक्षा के प्रश्न के कारण मुसलमानों ने और अपना मुख्यमंत्री बनवाने का जज्बा व आकर्षण होने के कारण यादवों ने जिस शिद्दत से मतदान किया अन्य जातियों में उसकी झलक नदारत रही। अगर मंहगाई, बेरोजगारी और प्रशासनिक निरंकुशता व भ्रष्टाचार से हुई परेशानी आदि के समवेत कारणों से सत्तारूढ़ पार्टी के प्रति विकट नाराजगी की बात सही होती और अखिलेश यादव द्वारा किये जा रहे लुभावने वादों का जादू चलता तो समाजवादी पार्टी के लिए वोट करने वालों की लाइन के रूप में मतदाताओं की आतुरता दिखाई होती पर ऐसा लगता है कि चुनावी भाषणों में समाजवादी पार्टी के अतीत को जमकर कुरेदे जाने से उसके प्रति मतदाताओं के संशय का निवारण नहीं हो सका और वोट के दिन उहापोह में उन्होंने मतदान केन्द्र पर जाने की बजाय घर पर ही बैठे रहने का फैसला कर लिया।
बसपा के वोटर में भी छायी उदासीनता-
बहुजन समाज पार्टी की जहां तक बात है मायावती का अपना सजातीय वोटर भले ही इस बार भी कुल मिलाकर उन्हें छोड़कर दूसरी जगहों पर न भटका हो लेकिन पहले दिन से ही उनकी पार्टी सत्ता की दौड़ से बाहर नजर आने लगी थी जिसकी वजह से अपने वोट का कोई फलित निकलने की आशा न देख मतदान के लिए उनके कोई उमंग नहीं थी। दलितों में मजदूरी के लिए गांव जिले से बाहर चले जाने वालों की संख्या अभी भी सबसे ज्यादा है और जब बसपा के संघर्ष के दिन थे और इसके बाद जल्बे जलाल के दिन आये तब वे जिस तरह से मतदान के लिए काम धंधा छोड़कर घर दौड़े चले आते थे वैसा समर्पण और त्याग का जज्बा उन्होंने इस बार नहीं दिखाया नतीजतन बसपा के कोर वोटर का भी मतदान घटा रहा।
योगी आदित्यनाथ को जब पार्टी के उनके पक्ष में फैसले से मुख्यमंत्री बनने का अवसर मिला तो उन्होंने जो आदर्शवादी रवैया अपनाया कार्यकर्ता उसकी भेंट चढ़ गये उन पर शुरू में ईमानदारी का भूत सवार था लेकिन धरातल पर पार्टी में ही जो स्थितियां थी उससे वे अपने किसी निश्चय पर टिके नहीं रह सके। वर्चस्ववादी स्वभाव के कारण सिद्धांतों के लिए दिलेरी दिखाकर सत्ता दाव पर लगा देना उनके बूते में नहीं था नतीजतन पार्टी में हावी निहित स्वार्थो का मुकाबला करने से वे कतरा गये।
भाजपा कार्यकर्ताओं में योगी की अनास्था पड़ी महंगी-
उनकी अवास्तविक सोच का खामियाजा कार्यकर्ताओं को भुगतना पड़ा। योगी इस गलत धारणा के शिकार थे कि राजनीतिक कार्यकर्ताओं की नीयत ठीक नहीं होती और अगर उन्हें अड़ंगेबाजी का मौका मिला तब प्रशासन साफ सुथरे ढ़ंग से काम नहीं कर पायेगा। वे कार्यकर्ता जो एक विचार धारा के प्रति समर्पण के कारण पिछली सरकारों में उत्पीड़ित होते रहे और उन्होंने इसके बावजूद पार्टी नहीं छोड़ी उनके बारे में योगी ने यह सोचा कि उनका कोई ईमान नहीं है जबकि अधिकारियों पर भरोसा किया जो सदा बहार रहने के लिए जिस पार्टी की सरकार आती है उसी के हो जाने में माहिर हैं क्योंकि वे किसी ईमान पर कायम रहने की मूर्खता नहीं करते।
कार्यकर्ताओं की बलि चढ़ाने से कोई उद्देश्य न हो सका पूरा-
योगी अगर यह सोचते थे कि वे पार्टी के लोगों को ईमानदारी के लिए ढ़ाल लेंगे तो वे इसमें विफल रहे। विधायकों से लेकर पार्टी पदाधिकारियों और यहां तक कि संघ के प्रचारकों तक की हैसियत पांच साल में जो हो गई वह किसी से छुपी नहीं है जबकि उनकी सरकार आने के कुछ ही महीनों बाद वृंदावन में हुई संघ और भाजपा की समन्वय बैठक में नये नवेले पार्टी विधायकों के बारे में उनके सामने यह तथ्य लाया जा चुका था कि वे अभी से रूपये बटोरने में लग गये हैं फिर भी योगी उनका इलाज न कर सके। दूसरी ओर आम कार्यकर्ताओं के योगदान का सरकार में कोई लाभ नहीं लिया जा सका। हालांकि अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं की तरह राजनीतिक कार्यकर्ताओं का भी एक विजन होता है कि अगर अधिकारियों से इस तरह से काम कराया जाये तो सरकार की लोकप्रियता बढ़ेगी। इस नाते अगर उनकी प्रशासन में कुछ चल पाती तो सरकार का ही भला होता पर उनका मनोबल गिराया गया जिससे चुनाव में पार्टी के लिए वे पूरी ऊर्जा से काम नहीं कर पाये।
संघर्ष से कतराते रहने की सपा की फितरत भी कारण बनी लो वोटिंग का-
विरोधी दलों में बसपा और कांग्रेस की तो बात ही क्या की जाये। कांग्रेस में प्रियंका गांधी ने पुरानी पीढ़ी की सफाई के चक्कर में बचे खुचे सांगठनिक ढ़ांचे को बर्बाद कर लिया लेकिन नया ढ़ांचा वे खड़ा नहीं कर पायी। इसलिए हर मुद्दे पर सरकार से सीधा मोर्चा लेने के बावजूद चुनाव में उनकी पार्टी लोगों की सहानुभूति का कोई लाभ उठाने में विफल दिखी। बसपा की तो शैली ही अलग है। जिलों और विधानसभा क्षेत्र के इकाईयों तक में मायावती किसी को जमने का मौका नहीं देना चाहती जबकि सांगठनिक मशीनरी की गतिशीलता के लिए पदाधिकारियों को लंबे समय तक मौका मिलना जरूरी रहता है। अधिकांश स्थानों पर मायावती ने चुनाव के ऐन मौके पर बदलाव करके नादान सेनापतियों की फौज तैयार की जिसके लिए धरातल पर किसी व्यूह रचना को अंजाम देना संभव नहीं था। समाजवादी पार्टी के बारे में तो सबको दिखा कि अखिलेश यादव बंगले से बाहर निकलने और सड़क पर उतरने से बचते रहे। उन्होंने मुद्दों और वादों का आविष्कार भी चुनाव अभियान के दौरान ही किया। इसलिए उन्होंने सामान्य मतदाताओं में अपने प्रति जुनून पैदा नहीं कर पाया।
मतदान बढ़ाने की चुनौती करनी होगी कुबूल-
बहरहाल अब जो होना था वह तो हो चुका है लेकिन लोकतंत्र के बारे में चिंता करने वालों को सोचना पड़ेगा कि सरकार बनवाने के लिए लोगों में कटिबद्ध होकर मतदान करने का जज्बा कैसे आ सके। यह काम प्रशासन और एनजीओ के सजावटी अभियानों से सार्थक नहीं हो सकता जो नये मतदाताओं को टारगेट करके पहली बार मतदान के लिए उनमें रोमांच पैदा करने जैसे टोटकों से वोटिंग का प्रतिशत बढ़ाने की कवायद करते हैं। मतदान के पीछे एक उद्देश्य होना चाहिए जिसमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका युवाओं की है।
एक समय था जब युवा वर्ग में सुनहरे भारत के निर्माण का सपना तैयार करने का चाव होता था जिसकी अभिव्यक्ति काम दो या काम के बदले भत्ता दो, अंग्रेजी हटाओ आदि के नारों में होती थी, वैकल्पिक नीतियों को लेकर उनके बीच बहस का बाजार गर्म रहता था अब वह माहौल नदारत हो चुका है। युवा वर्ग अपनी जाति के प्रभुत्व और श्रेष्ठता को स्थापित करने के लिए फेसबुक व सोशल मीडिया के अन्य मंचों पर अपनी ऊर्जा खपाता दिखायी दे रहा है। उसे नहीं मालूम कि इससे नये भारत के निर्माण की बजाय खंडित भारत का निर्माण होगा। इस भटकाव से उबारकर युवाओं को बदलाव का सपना देखने और वर्गीय दृष्टिकोण बनाने के लिए प्रेरित किया जायेगा तभी पूरे मतदान को संभव किया जा सकेगा क्योंकि मतदान को अधिकतम स्तर पर पहुंचाने का काम युवाओं के हरावल दस्ता बनने से ही पूरा हो सकता है।

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