बाबा साहब अम्बेडकर की जयंती इस वर्ष जितनी भव्यता और उत्साह के साथ मनायी गई उतनी पहले कभी नहीं मनी थी। निश्चित रूप से इसका श्रेय सरकार को दिया जाना चाहिए जिसने बाबा साहब के प्रति वैसी श्रृद्धा और सम्मान प्रदर्शित करने के लिए प्रेरित किया जो उनके लिए बाजिब है। संघ और भाजपा ने वर्ण व्यवस्था के नियमों और परंपराओं को काफी हद तक उदार बना दिया है जिससे देश के प्रत्येक नागरिक को मानवीय गरिमा के साथ जीने का अवसर देने का संविधान का संकल्प फलीभूत होता दृष्टिगत हो रहा है। लेकिन दुर्भाग्यवश कई अर्थो में आज भी भाजपा की सोच वर्ण व्यवस्था के दायरे से बाहर नहीं निकल पा रही है।
असीम अरूण को असंगत जिम्मेदारी-
इसका एक उदाहरण है असीम अरूण को योगी सरकार में सौंपी गई जिम्मेदारी। असीम अरूण की गिनती बेहद कामयाब पुलिस अफसर के रूप में रही है। खासतौर से मौजूदा सरकार के आतंकवाद के कठोर दमन के इरादे को सफल बनाने में जो योगदान उन्होंने किया सीएम योगी भी उसके मुरीद हैं। उनके पिता श्रीराम अरूण ने भी अपनी योग्यता और क्षमता के बल पर आईपीएस संवर्ग के कैरियर की सबसे शिखर मंजिल डीजीपी की कुर्सी तक पहुंचने का सफर तय किया था। इस मामले में चाहे श्रीराम अरूण हों या असीम अरूण उनकी विशिष्ठता के लिए दलित के रूप में उनके उल्लेख का कोई अर्थ नहीं है। उनकी प्रशासनिक और नेतृत्व क्षमता के रूप में बहुत मजबूत व्यक्तिगत और स्वतंत्र पहचान है।
असीम अरूण का दलित बैक ग्राउंड बन गया विडंम्बना  
पर विडम्बना यह है कि भाजपा से उन्हें अवसर देते समय उनका दलित बैक ग्राउंड ओझल नहीं हो सका अन्यथा उन्हें समाज कल्याण जैसे महत्वहीन दायित्व सौंपने के लायक समझकर न निपटाया गया होता। उनके दलित बैक ग्राउंड के चलते तेज तर्रारी की उनकी उपयोगिता कहीं अंधेरे कोने में गुम कर दी गई। उत्तर प्रदेश में रंगनाथ मिश्र के समय से किसी गृहमंत्री की नियुक्ति नहीं हुई है। हालांकि रंगनाथ भी इस विभाग के जूनियर मंत्री ही थे। पर अभी तो मुख्यमंत्री गृह विभाग का संबद्ध राज्यमंत्री नियुक्त करने में भी डरते हैं क्योंकि इस विभाग में रूतबा ज्यादा है, एक्सपोजर की गुंजाइश ज्यादा है। गृह विभाग का मंत्री एक पृथक शक्ति केन्द्र बन सकता है। जो भी हो अपने दूसरे कार्यकाल में योगी को इतना मजबूत हो जाना चाहिए था कि वे गृह विभाग के अपने से संबद्ध जूनियर मंत्री की नियुक्ति में किसी असुरक्षा बोध के शिकार न रहे हों और असीम अरूण इसके लिए पूरी तरह से उपयुक्त थे। पर शायद अगर वे दलित न होते तो उन्हें गृह राज्यमंत्री बनाने की ही सोची जाती। उन्होंने जब कैरियर के चरमोत्कर्ष पर नौकरी से इस्तीफा देकर राजनीति में आने की सोची होगी तो उनके मन में यह तो नहीं होगा कि सिर्फ उनको वजीफा बांटने वाले विभाग का जूनियर मंत्री बनने का मौका मिल जाये तो ही वे धन्य हो जायेंगे। ऐसे महत्वहीन विभाग का दायित्व मिलने से हो सकता है कि वे कुंठित हों लेकिन इससे भाजपा के बारे में जो मैसेजिंग हुई है वह अच्छी नहीं है और दलितों का दिल जीतने की बजाय भाजपा उनके क्षोभ को जगाने का निमित्त बन गई है। आखिर असीम अरूण को जिम्मेदारी बांटते समय उनकी खूबियों को नजरअंदाज करते हुए यह सोच क्यों हावी हुई कि दलित नेता केवल वजीफा बांटने का दायित्व ही बेहतर ढ़ंग से निभा सकता है।
बात बेबी रानी मौर्या की
बात अकेले असीम अरूण की नहीं है, बेबी रानी मौर्या की भी है। उन्हें मिला महिला कल्याण एवं बाल विकास विभाग क्या उनके प्रोफाइल से न्याय करता है। वे उत्तराख्ंाड की राज्यपाल रह चुकी हैं। एक तो इसके बाद वैसे भी उन्हें फिर से सक्रिय राजनीति में घसीटकर एक और दूषित दृष्टांत स्थापित करने की कोशिश हुई है। लेकिन जब इसके लिए लोकलाज को तिलांजलि दी गई होगी तो भाजपा के रणनीतिकारों के मन में कोई दूरंदेशी दाव की बात होगी। प्रचारित यह किया गया था कि अगर चुनाव बाद योगी की स्वीकार्यता पर प्रश्न चिन्ह लगाया जाने लगा तो दलित मुख्यमंत्री के नाम पर उन्हें आगे लाकर योगी को सुविधा पूर्वक पीछे हटा दिया जायेगा। इसके बाद यह कहा गया कि उन्हें योगी के मंत्रिमंडल में तीसरा उप मुख्यमंत्री बनाया जायेगा जिससे दलितों और महिलाओं दोनों को साधा जा सके। लेकिन पूर्व राज्यपाल के नाम पर भी बेबी रानी मौर्या को अलग से कोई अहमियत देना भाजपा के कर्णधारों को गंवारा नहीं हुआ। उन्हें पहले तो सामान्य मंत्रियों की कतार में खड़ा कर दिया गया इसके बाद जब विभागों की पंजीरी बंटी तो बेबी रानी मौर्या लो प्रोफाइल में धकेल दी गई। जाने अनजाने में ऐसी कार्रवाइयां दलितों का जायका बिगाड़ने वाली हैं जबकि बसपा के मैदान से हट जाने और कांग्रेस के अप्रासंगिक हो जाने से दलितों के खाली हुए स्पेस पर कब्जा जताने को भाजपा बड़े जतन से प्रयास करने में लगी है। 

Leave a comment