
योगी पार्ट-1 में मंत्रियों के नाकारपन और भ्रष्टाचार के मामले सीएम योगी की सख्त निगरानी के बावजूद सामने आते रहे। ऐसे मंत्रियों में कुछ प्रभावशाली राजनीतिक घराने से आये मंत्री थे। कुछ मंत्री समझते थे कि उन्हें केन्द्रीय नेतृत्व का वरदहस्त प्राप्त है इसलिए उनको योगी के अर्दब में रहना गंवारा नहीं था। योगी ने पहला साल तो समझने में गुजारा क्योंकि इसके पहले न तो उन्होंने कोई सरकार चलाई थी और न ही वे किसी सरकार में शामिल रहे थे इसलिए उनके पास अनुभव की कमी थी लेकिन साल भर बाद जब योगी ने सरकार पर काफी हद तक पकड़ बना ली तो वे ऐसे मंत्रियों की नकेल कसने में लग गये। कई मंत्रियों को उन्होंने छटनी में मंत्रिमंडल से निकाल कर बाहर कर दिया, कुछ मंत्रियों को जिन्हें हटाने से केन्द्रीय नेतृत्व के हस्तक्षेप के कारण उन्हें रूक जाना पड़ा उनके हाथ से महत्वपूर्ण विभाग छीन लिये और उन्हें काम चलाऊ विभागों में धकेल दिया।
राजनीतिक लूट का संक्रामक कल्चर-
योगी के आपरेशन क्लीन की ही धमक रही कि बाद में मंत्री गड़बड़ी करने में डरने लगे लेकिन इस समय सत्ता की लूट का जो राजनीतिक कल्चर पिछले कुछ दशकों की राजनीति में बन चुका है उसके चलते पूर्ण सुधार तो संभव होने से रहा। भाजपा के अन्य राज्यों में मंत्री जमकर माल काटते रहे हैं तो फिर उत्तर प्रदेश के मंत्रियों से एकदम पूरे नियम संयम का पालन करने की उम्मीद भी कैसे की जा सकती है। भारतीय जनता पार्टी ने भी अब पार्टी विथ ए डिफरेंश का नारा भुला दिया है। वैभव और तड़क भड़क की संस्कृति उसमें भी विस्तारित रूप में पसर चुकी है। संघ हिन्दू सर्व सत्ताबाद को कायम करने में इतना मशगूल है कि उसमें नैतिक अनुशासन का चाबुक चलाने की इच्छा शक्ति नहीं बची है। सादगी और संयम के मूल्यों की पुर्नप्रतिष्ठा करने के प्रयासों में अब उसकी कोई रूचि नहीं बची है। भले ही योगी इस मामले में व्यक्तिगत प्रकाश स्तंम्भ बने हुए हों। तथापि फिलहाल योगी पार्ट-2 में इस विकृत पालिटिकल कल्चर के संक्रमण से अपने मंत्रियों को कम से कम प्रभावित होने देने की चुनौती सीएम योगी स्वीकार कर चुके हैं।
पाबंद किये जाने से पार्ट-2 में कितने सुधरेंगे मंत्री-
मंत्रियों को कई तरह से पाबंद करके उन्होंने इसकी झलक देने का प्रयास किया है। उनके निजी स्टाफ के चयन को लेकर उन्होंने कई शर्ते तय कर दी हैं जिससे मंत्री अपनी पसंद के कमाई कराने वाले घाघ लोगों को अपना प्रतिनिधि चेहरा बनाने में सफल न हो पायें। मंत्रियों के लिए कामकाज का रोस्टर भी बना दिया है। सोमवार को वे जिलों से समस्या लेकर आने वाले लोगों की सुनवाई करने का समय निर्धारित करेंगें। सोमवार से गुरूवार तक चार दिन राजधानी में बैठकों समेत सरकारी काम निपटाने में मुब्तिला रहेंगे। शुक्रवार, शनिवार और रविवार को उन्हें जिलों में रहना पड़ेगा और वहीं रात्रि विश्राम करना पड़ेगा।
योगी पार्ट-1 में एक महिला मंत्री जिलों में जाती थी तो महंगे होटल में ठहरती थी जिसका पेमेंट मंडल और जिले के उनके विभाग के अधिकारी करते थे। विदा के समय उनके पति भरी अटैची की भेंट अफसरों से लेते थे। इस बार योगी ने हिदायत दी है कि कोई मंत्री जिलों में होटलों में रूकने की गुस्ताखी नहीं करेगा। हर जगह सरकारी गेस्ट हाउस हैं और मंत्री गेस्ट हाउस में ही रूकने की आदत डालें।
मंत्रियों के बेहतर टीम वर्क से ही उभरेगी सरकार की शानदार तस्वीर-
मायावती जब मुख्यमंत्री थी तो सार्वजनिक रूप से यह कहती थी कि उन्होंने जिनको मंत्री बनाया है उन्हें केवल घोड़ा गाड़ी और बंगले में रहने की सुविधा दी है लेकिन उनके विभाग में फैसले सीधे वही करती हैं जिसके लिए उन्होंने हर मंत्री के विभाग में अपने विश्वास पात्र अधिकारी प्रमुख सचिव, सचिव बना रखे हैं। खैर मायावती की यह मनमानी का पराकाष्ठा थी मंत्रिमंडल शोभा मात्र के लिए नहीं होता। मंत्रियों की उपयोगिता होनी चाहिए जिसके लिए जरूरी है कि ऐसे लोग मंत्री बनाये जायें जिनके पास विजन हो और जो काम करने की क्षमता रखते हों। इसी अपेक्षा के अनुरूप योगी ने कहा है कि कैबिनेट की मीटिंगों में हर मंत्री अपने विभाग के बारे में खुद ब्रीफिंग करेगा न कि अधिकारी। जाहिर है कि इससे मंत्रियों को अपने विभाग की हर कार गुजारी की व्यक्तिगत जानकारी रहेगी और अपनी परफार्मेंस ठीक करने के लिए समय-समय पर अधिकारियों को निर्देशित करने की बौद्धिक धार वे पैनी करते रहेंगे। योगी पार्ट-1 में भी उन्होंने मंत्रियों की कुशलता निखारने के लिए नये-नये प्रयोग किये थे जिसमें मंत्रियों की भारतीय प्रबंधन संस्थान में ट्रेनिंग कराना भी शामिल था। लेकिन चाहे तो योगी ने खुद न चाहा हो कि मंत्री स्वतंत्र रूप से अपने विभाग का का करने में सक्षम बने और चाहे यह बात रही हो कि बूढ़े तोते बहुत ज्यादा नहीं पढ़ाये जा सकते सो उक्त ट्रेनिंग का कोई दृश्यगत प्रभाव नजर न आ सका हो लेकिन योगी अब जान चुके हैं कि मंत्रिमंडल की टीम वर्क से ही सरकार बेहतर नतीज दे सकती है इसलिए वे इस बार मंत्रियों का दक्ष बनाने के बारे में वास्तव में गंभीर हैं।
अनुशासन के सारे तटबंध बह गये थे कोरोना की सुनामी में-
योगी पार्ट-1 की लाइन लैंथ को कोरोना की आपातकालीन स्थितियों ने बहुत कुछ गड़बड़ा दिया था। इसलिए पार्ट-1 में अपनी विफलताओं के बारे में वे ग्रेस माक्र्स के हकदार हैं। खासतौर से पहले एक वर्ष में अधिकारियों पर उनका जो खौफ छाया दिखता था उससे अधिकारी कोरोना काल के दौरान एकदम निर्भय हो गये थे और आपात परिस्थितियों को उन्होंने दोनों हाथों से कैश कराया था। योगी पार्ट-1 में यह धारणा व्याप्त हो गई थी कि सरकार तो नौकरशाही ही चला रही है। इस खतरनाक धारणा से योगी को सत्ता में फिर से वापस आने के लिए बहुत मशक्कत और तीन तिकड़में करनी पड़ी। इसलिए इस बार उन्हें मंत्रियों के साथ-साथ अफसरशाही को भी जबावदेही में बांधने का कौशल बड़े पैमाने पर दिखाना पड़ेगा। यह जताने के लिए कि उनके दिमाग में यह बात है। उन्होंने अधिकारियों को भी कई दिशा निर्देश जारी किये हैं। हर दफ्तर में समय पर उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए कसाबट प्रदर्शित की जा रही है। सिटीजन चार्टर को प्रभावी तौर पर लागू कराया जा रहा है ताकि इसके दायरे में आने वाली सेवाओं का लाभ समयबद्ध आवेदकों को दिलाया जा सके। दफ्तरों में लंच टाइम को सीमित कर दिया गया है। लेकिन अभी तक नौकरशाही के बारे में जो आदेश जारी किये गये हैं वे बहुत कर्मकांडी किस्म के हैं। नौकरशाही का मर्ज ज्यादा बिगड़ा हुआ है और अधिकारी से लेकर कर्मचारी तक शहंशाही भावना व भ्रष्टाचार में पूरा सरकारी तंत्र डूबा नजर आता है।
भ्रष्टाचार के नाम पर पूंछ क्यों दबा लेती है सरकार-
पिछली बार भ्रष्टाचार की पेंडिंग शिकायतों पर कार्रवाई करने के मामले में मीडिया में जितनी डींगें हांकी गई उतना कोई ठोस काम नहीं हुआ। उदाहरण के तौर पर गोमती रिवर फ्रंट के घोटाले की जांच में तो राजनैतिक रंजिश का भी पुट था इसके बावजूद यह जांच पूरे पांच साल अपनी परिणति पर नहीं पहुंच सकी। नेता तो दूर कोई अधिकारी तक जेल नहीं भेजा गया। कई महत्वपूर्ण जांचों का भी हश्र इसी तरह हुआ है। भ्रष्टाचार रोकने के लिए तंत्र के नाम पर सरकार के पास बड़ा तामझाम है। पुलिस में विजिलेंस है, सीबीसीआईडी है, एंटीकरप्शन है, ईओडब्ल्यू है। इसके बाद अलग-अलग क्षेत्रों के लिए पुलिस का फूड सेल, सहकारिता सेल आदि इकाईयां हैं। इन सभी को संगठित करके नया कारगर तंत्र विकसित करने की जरूरत है। भ्रष्टाचार के खिलाफ भी योगी के बुलडोजर बाबा के अवतार का इंतजार लोग बेसब्री से कर रहे हैं। भ्रष्टाचार पर युद्धस्तरीय हमला बोलना आवश्यक है क्योंकि लोग बहुत बेचैन हैं और अपनी आत्मा की शांति के लिए वे तड़ाक भड़ाक भ्रष्टाचारियों को घसीटते हुए सींखचों के भीतर किये जाने का मंजर देखना चाहते हैं। लोगों को विश्वास है कि अधिकारियों के पास में अरबों-खरबों की नगदी और जायदाद है जिसकी जब्ती माफियाओं के धन की तरह की जाये तो प्रदेश को कई वर्षो तक बिना टेक्स लगाये विकास के लिए भरपूर बजट उपलब्ध हो जायेगा।
पुलिस के बड़े अफसर क्या बंगलों में बैठकर हैं सरकार की मुफ्त की रोटियां तोड़ने के लिए-
कोरोना की अफरा तफरी में सबसे ज्यादा बिगाड़ पुलिस विभाग में हुआ। सीएम योगी में फ्रेश आईएएस और आईपीएस अफसरों को ही जिलों की कमान सौंपने का उन्माद सन्निपात के स्तर पर चढ़ा रहता है जिससे चार पांच साल मात्र के सेवाकाल वाले अफसरों के हाथ में समाज के संचालन के सूत्र आ जाते है जिनमें आयुगत कारणों से जरूरत से ज्यादा हेकड़ी रहती है और अनुभव की कमी भी उनमें देखी जाती है। इस मामले में सैन्य बल और सिविल सेवा के अंतर को समझा जाना चाहिए। सैन्य बल में जोश की जरूरत होती है, मोर्चे से न हटने का गुण सीमा की सुरक्षा के लिए आवश्यक होता है पर सिविल प्रशासन में समाज को विश्वास में लेकर व्यवस्था को लागू करना होता है। नये अफसर भी इसमें सफल हो सकते हैं बशर्ते सीनियर अफसरों के सतत गाइडेंस का प्रबंध हो। जिलों में रेंज डीआइजी, आईजी
और जोन एडीजी के लगातार दौरे होते रहने चाहिए। गंभीर वारदातों का खुलासा उनके गाइडेंस से जल्द संभव होगा साथ ही वे पीड़ितों और सम्भ्रांत नागरिकों से फील्ड के दौरे में मिलें तो जिला पुलिस की खामिया सामने आती रहेगी और उनमें सुधार होता रहेगा। पर अभी तो सरकार ने इन अफसरों को पूरा साहब बना रखा है वे अपने मुख्यालय पर ही जमे रहकर कागजों से जिले के अफसरों की मानिटरिंग करते हैं यहां तक कि अधिकांश डीआइजी, आईजी
और एडीजी से पीड़ित जनता सीधे मिल तक नहीं सकती। संगठित अपराध न हों पर रोजमर्रा में लोग लुटते पिटते रहें झूठी रिपोर्ट हो जाने पर भी बचने के लिए पुलिस को पैसा देते रहें तो भी अच्छी कानून व्यवस्था के गीतों में जनमानस को मजा आने वाला नहीं है।







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