
डायनासोर की तरह मुर्दनी हालत में जकड़ चुकी कांग्रेस के अस्तित्व पर जब अब पूरी तरह बन आयी है तो उसकी बची खुची जिजीविषा ने शायद फिर एक बार अंगड़ाई भरी। अचानक उसने फैसले लेने का दम दिखाना शुरू कर दिया है तो लोग चैंक रहे हैं। मध्य प्रदेश में सब कुछ गंवाने के बाद आखिर पार्टी हाईकमान ने अब कमलनाथ से कहा है कि दोहरी जिम्मेदारी छोड़ो। इसके बाद जैसे ही कमलनाथ ने नेता प्रतिपक्ष के पद से इस्तीफे का मजबून भेजा हाई कमान ने उसे आनन फानन स्वीकार कर डा0 गोविंद सिंह को उनकी मुंह मांगी मुराद पूरी करते हुए कमलनाथ के स्थान पर नियुक्त करने का ऐलान कर डाला। मध्य प्रदेश में ठाकुर लीडरशिप के मामले में कांगे्रस अभी तक जिस परंपरा में बंधी रही थी यह फैसला उससे इतर है यानी कांग्रेस भी भाजपा की देखा देखी अपना वर्ग चरित्र बदलने की बाध्यता महसूस करने लगी है।
मध्य प्रदेश में ठाकुर लीडर बनाने की बात आये तो कांग्रेस की दौड़ किसी राजा महाराजा की ओर होड़ की थी। उस पर तुर्रा यह है कि मध्य भारत तो साधारण रियासत नहीं है एक साम्राज्य का नाम है जिसमें महाराज साहब यानी सिधिंया के सामने हर ठाकुर का नाम पार्टी में बहुत बौना पड़ जाता था। सिधिंया का दबदबा कांग्रेस लीडरशिप पर शुरू से ही इतना हावी रहा कि एक बार जवाहर लाल नेहरू को भी इसके कारण कड़वा घूंट पीने को मजबूर हो जाना पड़ा था। ग्वालियर की एक सभा में जीवाजी राव पहले बोलने को खड़े हुए तो उनके जयकारे में लोगों ने आसमान हिला कर रख दिया लेकिन बाद में नेहरू जब आये तो किसी ने उनकी जिंदाबाद का नारा लगाने की जहमत नहीं उठाई। नेहरू ने इस रवैये से अपने को बहुत ही अपमानित महसूस किया था। हालांकि बाद में उनकी नाराजगी दूर करने के लिए ग्वालियर क्षेत्र में जब भी उनकी सभा होती थी जीवाजी राव अपने लोग उनकी जिंदाबाद के नारे लगाने के लिए बैठा देते थे। राजीव गांधी को भी एक समय मध्य भारत क्षेत्र के लोगों की सिधिंया राजवंश के प्र्रति गुलामी की हद तक अनुरक्ति के चलते नीचा देखना पड़ गया था। 85 के लोकसभा चुनाव में वे माधव राव के समर्थन में स्वयं सभा को संबोधित करने आये थे जिसमें उन्होंने माधव राव के लिए आत्मीयता दिखाने के लिहाज से महाराज की जगह माधव क्या बोल दिया बबाल हो गया। लोगों को विफरते देख राजीव को उन्हें मनाने की मशक्कत करनी पड़ी और माधव राव को भी लोगों को समझाने के लिए आगे आना पड़ा।
जीवाजी राव सिधिंया के हिन्दू महासभा के प्रति रूझान को जानते हुए भी कांग्रेस ने उन्हें अपने साथ जोड़े रखने की मजबूरी समझी और इसके चलते उन्हें मध्य भारत में राज प्रमुख का दर्जा घोषित किया। उस समय जयविलास पैलेस से आने वाली लिस्ट को ही मध्य भारत के कोटे में मंत्री पद की शपथ मुख्यमंत्रियों को दिलवानी पड़ती थी। जीवाजी राव जब दिवंगत हो गये तो राजमाता विजया राजे सिधिंया ने इसी दस्तूर के नाते तत्कालीन मुख्यमंत्री डीपी मिश्रा को अपनी लिस्ट भेज दी। पर डीपी मिश्रा जबरदस्त अकड़ू थे उन्होंने राजमाता के दूत के सामने ही लिस्ट फाड़ डाली और कहा कि डीपी के आगे किसी महाराजा महारानी की चलने वाली नहीं है। राजमाता विजया राजे सिधिंया को जब डीपी मिश्रा की इस हेकड़ी की खबर मिली तो उन्होंने कहा कि चाहे महल की हर ईंट बिक जाये पर वे इस पंडित को राजनीति में कहीं का नहीं छोड़ेंगे। उन्होंने रातों-रात विधायक खरीदने के लिए महल का खजाना खोलकर डीपी मिश्रा की सरकार को गिरवा दिया। उनसे प्रस्ताव किया गया कि वे खुद मुख्यमंत्री का पद संभाल लें पर उनकी ठसक देखिये। उन्होंने कहा कि वे जन्मजात महारानी हैं। मुख्यमंत्री का तुच्छ पद क्यों लेंगी। जनता पार्टी की सरकार के समय भी जन संघ घटक ने उनका नाम मोरार जी भाई के मंत्रिमंडल में शामिल कराने के लिए भेजना चाहा था पर उन्होंने साफ कह दिया कि यह उनकी तौहीन होगी और अटल बिहारी पाजपेयी को अपना नाम वापस करने के लिए मजबूर कर डाला।
विजया राजे जब कांग्रेस से अलग हुई तो मध्य भारत में उसका तंबू उखड़ गया। 1971 के लोक सभा के पहले मध्यावधि चुनाव में मध्य भारत की 12 लोकसभा सीटों में से 11 राजमाता ने जनसंघ की झोली में डाल दी जबकि उस समय इन्दिरा गांधी की लोकप्रियता सारे देश में चरम सीमा पर थी और मध्य भारत में उन्होंने हर सीट पर अपनी फतह के लिए जबरदस्त जोर लगाया था। इसीलिए 1980 में संजय गांधी ने राजमाता के बेटे माधवराव को अपने पाले में खींच लिया जिससे मध्य भारत में फिर से कांग्रेस को ताकतबर बनाया जा सके। इसी बीच इन्दिरा गांधी ने चुरहट रियासत के राजकुमार अर्जुन सिंह को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी दिला दी तो माधव राव असहज हो गये थे वे अर्जुन सिंह के प्रति जबरदस्त हीन भावना रखते थे। अर्जुन सिंह ने इसकी काट के लिए गांव-गांव में माधवराव के दरबारियों के समानान्तर जमीनी कार्यकर्ताओं को तैयार किया और उन्हें यथा शक्ति मजबूती दी। माधव राव जब कांग्रेस में आये थे तो वर्षों से महल से लड़ते आ रहे खांटी कांग्रेसियों को रास्ते से हटाने और अपने दरबारियों को कांग्रेस में थोपने का अभियान सा उन्होंने छेड़ दिया था जिससे जगह-जगह पुराने कांग्रेसियों और सिधिंया के लोगों में टकराव की नौबत पैदा होने लगी थी। मुझे याद है आलोक निशा अखबार में जिसका मैं संपादक था पुराने कांग्रेसियों द्वारा दिल्ली जाकर इंदिरा गांधी को ज्ञापन देने की खबर मैने घर भेदी सिधिंया से सावधान शीर्षक से छाप दी थी जिसे पढ़ने के बाद माधव राव बौखला गये थे।
आगे चलकर दिग्विजय सिंह मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने जो अर्जुन सिंह के समधी होते हुए भी राजनीति में अंदर ही अंदर उनकी जड़ काटने में लगे रहते थे। वे मध्य भारत की ही राघौगढ़ रियासत के जागीरदार थे इसलिए माधवराव को उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में हजम करना तो और ज्यादा दुश्वार हो गया था। सो दिग्विजय सिंह ने भी अर्जुन सिंह की ही लाइन को फालो किया और मध्य भारत के गांव-गांव में अपने लोग तैयार कर डाले। दिग्विजय सिंह की उस समय चंबल के सबसे उभरते क्रांतिकारी युवा तुर्क डा0 गोविंद सिंह को जनता दल से तोड़कर कांग्रेस में लाये थे। डा0 गोविंद सिंह 2007 में जब विनोद चतुर्वेदी के चुनाव अभियान में उरई आये तो कई लोगों के सामने उन्होंने कहा था कि मुझे नेता बनाने में कुछ-कुछ योगदान केपी सिंह का भी था। ये भिंड से संपादक बनकर कर्मयुग प्रकाश में उरई आ गये थे और इन्होंने मुझे लहार का संवाददाता बना दिया था जिससे पत्रकारिता के प्लेटफार्म के सहारे उन्होंने थानों में संघर्ष करके लोगों के काम कराये और उनके चहेते बने। नतीजतन नगर पालिका अध्यक्ष बनकर उन्होंने अपने राजनैतिक कैरियर की शुरूआत कर डाली। डा0 गोविंद सिंह मेरे अग्रज हैं। उनके चरित्र में यही बडप्पन है कि उन्हें अपने लोगों का सम्मान बढ़ाने में प्रसन्नता होती है। दिलेरी और लड़ाकूपन के पर्याय गोविंद सिंह ने विधायक बनने के बहुत पहले लहार क्षेत्र के थानों में पुलिस जुल्म के खिलाफ इस कदर हल्ला बोलना शुरू कर दिया था कि जब वे प्रदर्शन लेकर थानों में पहुंचते तो पूरा थाना भाग निकलता था। उनके साथ हजारों लोगों की भीड़ इकटठा हो जाती थी। उन दिनों जार्ज फर्नान्डीज और शरद यादव चुकी जैसी हालत में हो गये थे जिसमें डा0 गोविंद सिंह का सहारा उन्हें राजनैतिक तौर पर जिंदा रख पा रहा था। गोविंद सिंह के नाते भिंड में उन्हें दसियों हजार की भीड़ मिल जाती थी। अगर 1989 के बाद इन दिग्गजों को बिहार में शरण न मिलती तो लोकसभा पहुंचने के लिए इन्हें केवल गोविंद सिंह के समर्थन का सहारा सूझता।
खिजर मुहम्मद कुरैशी गोविंद सिंह की सेना में उनके सबसे बड़े सेनापति हैं। उनके नेता प्रतिपक्ष बनने पर गोविंद सिंह के राजनैतिक सफरनामे पर उन्होंने अपनी फेसबुक वाल पर शानदार आलेख लिखा है लेकिन इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं है। खिजर भी मेरे बड़े भाई हैं और शुरूआती पत्रकारिता के बहुत गहरे साथी। उन्होंने गोविंद सिंह क बारे में जो लिखा वह अक्षरशः सत्य है। गोविंद सिंह को तो कांग्रेस को बहुत पहले नेता प्रतिपक्ष बना देना चाहिए था पर वह ठाकुरों के मामले में राजा से आगे कुछ सोच ही नहीं पाती थी। भाजपा ने नरेन्द्र सिंह को चंबल इलाके से ही निकालकर बहुत बड़े ठाकुर चेहरे के रूप में सारे देश में खड़ा कर दिया जबकि कांग्रेस अपनी रूढ़ियों में जकड़ी होने के चलते ऐसी पहल के लिए तत्पर हो ही नहीं पा रही थी। उसे एक बार ख्याल आया तो गोविंद सिंह को उसने नरेन्द्र सिंह को हराने के लिए मुरैना भेज दिया था पर तब तक मोदी मैजिक छा चुका था जिसमें गोविंद सिंह तो क्या अमेठी में राहुल गांधी तक हवा में उड़ गये। बहरहाल देर आयद-दुरस्त आयद। 70 वर्ष के होकर भी वे अभी ऊर्जा से लबरेज हैं और नये दायित्व व नई चुनौती से उनकी ऊर्जा बहुगुणित होगी क्योंकि यह उनके स्वभाव की विशेषता है। वे जातिवाद से बंधे नहीं है। उन्होंने लहार में रानी के मुकाबले दलित को नगर पालिका अध्यक्ष के चुनाव में जितवाया था तभी से उनमें सर्वग्राही नेतृत्व की झलक लोगों को मिल गई थी। इसलिए कांग्रेस अब मध्य प्रदेश में कुछ चमत्कार करने की उम्मीद पाल सकती है। और कुछ हो या न हो लेकिन ऐसे साहसिक फैसले ही हैं जिसके जरिये कांग्रेस अपने लिए नये सबेरे की तलाश में फिर से गतिशील हो सकेगी।







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