
मजदूर दिवस का अर्थ हाल के वर्षों में काफी बदल गया है। 01 मई को मनाये जाने वाले इस दिवस का जैसे सिर्फ अनुष्ठानिक महत्व रह गया है। कामगार वर्ग इस दौर में जिन कठिन हालातों का सामना कर रहा है उसमें मजदूर दिवस की सही परिभाषा इसे मजदूर शोषण दिवस का संबोधन देकर सामने लायी जा सकती है। मजदूर कल्याण के नाम पर मेहरबानियां तो अभी हो रही हैं लेकिन उनके जो अधिकार हैं उन्हें अघोषित तौर पर एकदम नकार दिया गया है। बिडंवना यह है कि कामगारों में खुद भी अपने अधिकारों को लेकर चेतना नदारत हो चुकी है और शोषण को उन्होंने अपनी नियति के रूप में स्वीकार कर लिया है। शायद यह हिन्दू राष्ट्र के चरित्र का परिणाम हो। पौराणिक संदर्भ बताते हैं कि अपने साथ होने वाले अन्याय और उत्पीड़न के प्रतिकार के बारे में सोचने की कोई गुंजाइश कमेरों को हिन्दू राष्ट्र युग में कभी नजर नहीं आती थी। भाग्यवाद और पिछले जन्म के पापों के भुगतान व वर्ण व्यवस्था के धर्म इन सब अवधारणाओं में उनकी गहरी आस्था थी भले ही ये उनके लिए कितने भी अमानवीय क्यों न हों। क्या इस इतिहास को फिर से दोहराने की शुरूआत हो गई है।
साम्यवाद पूंजीवाद को मजदूरों के शोषण का कारण निरूपित करता रहा है। लेकिन हमारी उपरोक्त पंक्तियों से यह सोचने की कतई जरूरत नहीं है कि हम साम्यवादी निष्कर्षों का अनुसरण करना चाहते हैं। अनुभव तो यह बताते हैं कि पूंजीवाद ने सामंतवाद के दौर से अलग मजदूरों की बेहतरी में हर जगह बड़ा योगदान दिया है। मजदूरों के काम के घंटे तय किये जाने व उनकी पगार और सेवा शर्तों में सुधार के बहुत कदम पूंजीवादी व्यवस्था वाले देशों ने समय-समय पर उठाये। भारत में भी जब साम्राज्यवादी निजाम के साये में पूंजीवाद का अंकुरण शुरू हुआ था तो मजदूरों की बेहतरी की व्यवस्थायें सुनिश्चित करने के प्रयास सामने आये थे। इसमें सबसे बड़ा योगदान बाबा साहब डा0 अम्बेडकर का रहा जिन्होंने वायसराय की कौंसिल में श्रम विभाग का जिम्मा संभालते हुए मजदूरों को कई अधिकार दिलाये जो आजाद भारत के श्रम कानूनों का आधार बने। आज भारत विश्व की आर्थिक महाशक्ति की प्रतिष्ठा पाने का स्वप्न देख रहा है। प्रधानमंत्री मोदी देश में पांच ट्रिलियन की अर्थ व्यवस्था के निर्माण का दम भर रहे हैं। भारत मंे पूंजीवाद और बाजारवाद के विकास का यह स्वर्णिम युग है लेकिन विपर्यास यह है कि इसकी परिणतियां मजदूरों के लिए बेहतर होने की बजाय सामंती काला युग से भी ज्यादा बदतर होने की दिशा में अग्रसर हैं।
सरकारी विभागों से लेकर निजी क्षेत्रों तक में ठेका कामदारी का बोलबाला हो चुका है। इसमें कामगारों के साथ बेगारी से ज्यादा जुल्म की संभावनायें प्रकाश में आ रही हैं। दस हजार से भी कम वेतन पर पूरे दिन कामगार को ड्यूटी के नाम पर नचाये रखने का अधिकार नियोक्ता ठेकेदार को उपलब्ध करा दिया गया है। न्यूनतम मजदूरी अधिनियम डैड किया जा चुका है। अन्य सुविधाओं की बात करना तो फजूल ही है। अगर काम करते वक्त मजदूर दुर्घटनाग्रस्त हो जाये अथवा बीमार हो जाये तो इलाज का खर्चा खुद उसे उठाना पड़ता है। पूरे दिन काम कराया जाता है लेकिन सस्ती दर पर भोजन के लिए कैंटीन चलाने की कोई जरूरत नहीं समझी जाती। परंपरागत रूप से कामगारों को वेतन में कम से कम खर्च ही को धंधे के मुनाफे के बतौर देखा जाता था। यह माइंडसेट फिर से हावी हो गया है। किसी मल्टीनेशनल कंपनी में चले जाइये वहां सरकार का टैक्स भी पूरा चुकाया जायेगा, मजदूरों को भत्ते और बोनस भी मिलेगा, उसका फंड भी कटेगा, उसे कंपनी की तरफ से रियायती कैंटीन और ड्रेस आदि का बंदोबस्त रखा जायेगा, फिर भी मल्टीनेशनल कंपनी मुनाफे में होगी पर देशी कंपनी से कामगारों के लिए यह सब करने को कहा जाये तो वह अपना दिवाला निकल जाने की बात कहने लगेगी और सरकार भी उसे बचाने के लिए कामगारों के अधिकारों की सुरक्षा के नाम पर चुप्पी ओढ़ लेगी।
यह रवैया बदलने का कोई दबाव मजदूर दिवस के दिन भी नजर नहीं आता जो हैरत की बात है। क्या कामगार वर्ग इतना पस्त हो गया है। वह इस कदर निरीह हो चुका है कि उसे आवाज निकालते तक नहीं बन पड़ रहा। कुल मिलाकर स्थितियां बेहद दुखद हैं। होना तो यह चाहिए कि जो कंपनी मजदूरों को न्यूनतम वेतन और सुविधायें न दे सके सरकार उसे रोजगार संरक्षण के नाम पर बचाने की कोशिश करने की बजाय बंद कराने में ही गनीमत समझे। ऐसी कंपनियों के रोजगार से कामगारों को तिल-तिलकर मारने की बजाय बेहतर है कि एक ही दिन में मजदूरों की बलि चढ़ाने का मौका कंपनी मालिकों को मुहैया करायें। सही बात यह है कि कोई कंपनी अगर सरकार मजदूरों के लिए दबाव बनाती है तो बंद होने वाली नहीं है पर सरकार खुद भी नहीं चाहती कि मजदूर सिर उठाकर जी सकें भले ही कामगारों के बहुसंख्यक होने की बात हकीकत हो लेकिन सरकार को लोकतंत्र होते हुए भी उनके नाराज होने न होने की परवाह नहीं है। बहुसंख्यकों के इतने तुच्छ बन जाने का कारण क्या है इस पर शोध होनी चाहिए।
सबसे ज्यादा दुर्गति तो मीडियाकर्मियों की है। मनमोहन सिंह क जमाने में जब दैनिक जागरण व अन्य अखबार अपने पत्रकारों को वेतन आयोग का लाभ देने में आनाकानी कर रहे थे तो सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें पानी पिला दिया था। पर आज मीडियाकर्मियों का भी कोई खैर ख्वाह नहीं है जबकि समाज में वे रंगबाजी ऐसी छांटते हैं जैसे बहुत बड़े सूरमा हों। अखबार जिला प्रमुख तक आउटसोर्सिंग से ठेके पर नियुक्त कर रहे हैं जिन्हें नाममात्र का वेतन दिया जा रहा है। जिला संवाददाता का काम जिस नेचर का है उसमें ठेका कर्मचारी की नियुक्ति श्रम कानूनों के मुताबिक गैर कानूनी होना चाहिए लेकिन न सरकार इस पर कुछ बोल रही है और न ही कोर्ट। वैसे अखबार कोई बड़ी जनसेवा नहीं कर रहे जो बंद हो जायेंगे तो आसमान टूट पड़ेगा। सरकार को चाहिए कि वह ठेका पत्रकारों की नियुक्ति बंद कराकर अखबार मालिकानों से साफ कहे कि या तो वे अपने पत्रकारों को पूरा वेतन और अनुमन्य सभी सुविधायें दे या अपने अखबार का बोरिया विस्तर बांधकर दफा हो जायें। पर मई दिवस के दिन सरकार पत्रकारों के शोषण के खिलाफ कोई क्रांतिकारिता दिखाने वाली नहीं है।
सरकार की खराब मानसिकता के कारण ही मैक इंडिया जैसे अभियान दम तोड़ गये हैं। अच्छे और नये प्रोडक्ट बनाने की प्रतिस्पर्धा का माहौल इसके लिए चाहिए। यह तब होगा जब कामगारों का खून चूसकर मुनाफा करने की मानसिकता से बाज आकर कंपनी मालिक इसके लिए प्रयास करेंगे। पूरे वेतन और सुविधाओं पर कामगारों को रखा जायेगा तो नये व बेहतर से बेहतर प्रोडक्ट बनाने और सेवा इंडस्ट्री चलाने में क्रांतिकारी गति अपने आप पैदा हो जायेगी। इस तरह कामगारों के शोषण का पाप बंद करके भारत में पूंजीवाद और बाजारवाद को भी उत्कृष्ट किया जा सकता है और कमेरों का खुशहाली सूचकांक भी उच्चतम स्तर पर पहुंचाया जा सकता है।







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