बदले के धधकते अलाव को तापने से बाज आये सरकार


सुप्रीम कोर्ट में चलती अदालत के दौरान एक सिरफिरे वकील द्वारा जूता फेंकने का मामला अब खतरनाक रूप लेता जा रहा है। लोगों में जिस आक्रोश के विस्फोट का स्वांग रचाया जा रहा है निश्चित रूप से उसमें सच्चाई नही है। दरअसल पूरी प्रतिक्रिया भारत की समूची धार्मिक परंपरा के चरित्र से इतर है। जो हो रहा है उसमें प्रतिशोध की गंध है। यह अत्यन्त अनिष्टकारक है। जो लोग इस देश को अपनी बपौती समझते हैं कम से कम उनसे तो यह उम्मीद नही की जानी चाहिए कि वे देश की एकता को बिखेरने का कोई काम होने देगें। लेकिन जब बाड़ ही फसल को खाने लगे तो फसल की हिफाजत कौन करेगा।
गवई को रेडिकल समझने की नादानी
हम फिर इस बात पर जोर देना चाहते हैं कि जस्टिस गवई कहीं से रेडिकल वर्ग चरित्र के नहीं हैं। उन्हें समाज के कथित श्रेष्ठि वर्ग में अपनी मान्यता बढ़ाने की जो जबर्दस्त ललक है उसका समय-समय पर वे प्रदर्शन भी करते रहे हैं। सुविधाभोगी मानसिकता के कारण जोखिम मोल लेना कभी उनकी फितरत में नही रहा। रूढ़िवादी वर्तमान सत्तारूढ़ पार्टी के लिए तो वे एक लाभकारी परिसंपत्ति की तरह थे। इसी उपयोगिता के चलते अटल सरकार ने उन्हें हाईकोर्ट में प्रविष्ट कराया था। सुप्रीमकोर्ट के सवर्ण जजों वाले कॉलेजियम से जब उनके नाम की सिफारिश आला अदालत के लिए आयी तो मोदी सरकार ने भी इसी के चलते तत्काल हरी झंडी दे दी वरना कॉलेजियम के भेजे कई और जजों के नाम यह सरकार ठंडे बस्ते में दफन कर चुकी है। सुप्रीमकोर्ट में जब उनके प्रधान न्यायाधीश बनने की बारी वरिष्ठता के आधार पर आयी तो उनको निरापद मानकर ही सरकार ने कोई अड़ंगेबाजी नही की। कहने का मतलब यह है कि ऐसे मिजाज में ढले हुए गवई साहब सनातनियों के आराध्य को अपमानित करने की सोच सकते हैं यह सोचना भी मुश्किल है।
धार्मिक समालोचना के प्रति सहजता
भारत की धार्मिक प्रकृति की तुलना दूसरे धर्मों से नही की जा सकती। यहां तो अगर कुर्सी पर सवर्ण अधिकारी भी बैठा हो और कोई फरियादी अपनी जिद लगाना बार-बार भगवान की दुहाई देते हुए बंद न कर रहा हो तो खींझकर वह भी कह देता है कि दादा तुम अपने भगवान के पास ही चले जाओ, तुम्हारी समस्या दूर करना मेरे बूते में नही है। यहां तक कि आस्थावान परिवारों तक के घरेलू झगड़ों में भी लोग भगवान के नाम का ताना मारते हुए सुने जाते हैं। कोई इसे बहुत गंभीरता से नही लेता, महापाप नही समझता, दूसरे धर्मों की तरह जिन्हें हर समय सामने कोई न कोई काफिर ही नजर आता है। जाहिर है कि ऐसे अभ्यास के कारण जस्टिस गवई से असावधानी में कुछ ऐसे शब्द निकल गये होगें जिन्हें भगवान विष्णु के अनादर के रूप में बवाल का कारण बनाने की कृपा सोशल मीडिया ने कर डाली। तय है कि इससे लोगों की भावनाएं आहत हुई पर जैसे ही इस गलती का एहसास जस्टिस गवई को हुआ उन्होंने सफाई भी पेश कर दी थी। कल तक बौद्ध होने का अलंकरण गवई साहब के लिए प्रफुल्लता का कारण बना था आज वही उनकी मुसीबत की जड़ बन गया है लेकिन लोग इस तथ्य से भी अवगत है कि बौद्ध, जैन, सिख तकनीकी तौर पर हिंदुओं से भले अलग बना दिये गये हों पर व्यवहार में एक तरह से हिंदू ही माना जाता है। गवई साहब के बौद्ध होने को भी उन पर शक करने का एक कारण बनाया जा रहा है। आखिर देश के गृह मंत्री अमित शाह भी तो जैन हैं लेकिन क्या हिन्दुत्व में उनकी निष्ठा पर कोई सवाल कर सकता है। दूसरी ओर मुझे नही मालूम कि राकेश किशोर वास्तव में झगड़ालू व्यक्ति है या नही लेकिन अब कुछ सोशल मीडिया ग्रुप उनकी कालोनी के लोगों से बात करके यही बता रहे हैं कि उनका दिमाग पूरी तरह से खुराफाती है और वे पूरी कालोनी को परेशान किये हुए हैं। हो सकता है कि यही झक्की स्वभाव उनको इस कदर उत्तेजित करने का कारण बन गया कि उन्होंने प्रधान न्यायाधीश पर जूता फेकने की हिमाकत कर डाली। लेकिन इसके बाद उन्होंने जिस ढंग से नारेबाजी की और अगले दिन मीडिया को इंटरव्यू दिये उससे तो वे किसी प्रशिक्षित दस्ते के सदस्य नजर आ रहे थे। उनके बारे में बहुत विस्तार से जाने की जरूरत नही समझता लेकिन इस घटना को जिस तरह से जाति संघर्ष का रूप दिया जा रहा है वह किसी बड़े षणयंत्र का इशारा करता है।
खंडन-मंडन का सिलसिला सनातन में आम
भारत की धार्मिक प्रकृति की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधिता और नये विचारों की ग्राह्यता रही है। शास्त्रार्थ की परंपरा में पहले से चली आ रही धार्मिक मान्यताओं को कई बार कालातीत मानकर खारिज कर दिया जाता था और यह स्वीकार्य होता था। आदि गुरू शंकराचार्य ने अपने समय में सर्वस्वीकृत द्वैतवाद का मंडन मिश्र से शास्त्रार्थ में प्रतिवाद किया था तो क्या इसके लिए उन्हें धर्म से बहिष्कृत कर देने की सोची गयी थी। बल्कि हुआ यह था कि मंडन मिश्र ने उनके सामने अपनी पराजय स्वीकार कर ली थी और वे उनके शिष्य बन गये थे। स्थापित होने के बाद स्वयं शंकराचार्य की प्रच्छन्न बौद्ध कहकर आलोचना होती रही थी बिना इस भय के कि उन्हें धार्मिक भावनाओं को आहत करने का श्राप देकर दण्डित कर दिया जायेगा। गौतम बुद्ध ने वेदों की निंदा की फिर भी अपनी समय के सर्वाधिक मेधावी ब्राह्मणों ने उनसे दीक्षा लेने में संकोच नही किया। बौद्ध धर्म के प्रख्यात आचार्यों में सर्वाधिक संख्या ब्राह्मणों की रही। आधुनिक काल में भी ललई सिंह और रामस्वरूप वर्मा सनातन धर्म पर प्रहार करते रहे, अर्जक संघ जैसे विद्रोही पंथों की लंबी परंपरा रही। 2007 के बाद के अपने शासनकाल में मायावती ने खुलेआम कहा कि पत्थर के देवी-देवताओं को पूजने की बजाय उन जैसी देवियों के पास में आओ और दान चढ़ाओ। उनके साथ तो कई सवर्ण विधायक, सांसद और मंत्री थे लेकिन किसी के खून में कोई उबाल नही आया। आज जैसी देशव्यापी आग कहीं धधकती नजर नही आई।
अध्यात्म के हर प्रारूप का संगम है सनातन
कारण यह नही है कि सनातनी कहीं कायर हों लेकिन समय-समय पर स्वयं के गिरेबान में झांकते रहना उनके स्वभाव में है। सनातनी अपनी आलोचना-समालोचना के अभ्यस्त हैं। आज देश में सनातन के सबसे बड़े रक्षक के रूप में उभरे गोरखनाथ पीठ के महंत योगी आदित्यनाथ की पीठ अवतार प्रथा के खिलाफ रही है। उसका जोर सत्य की निष्पक्ष खोज, हठयोग और गुरु-शिष्य परंपरा पर रहा न कि मंदिरों में मूर्ति पूजा पर। लेकिन सनातन की मुख्य धारा से इतना इतर होते हुए भी आज गोरखपीठ सनातन के एक अंग के रूप में मान्य है तो जरा-जरा सी बात पर आज सनातन इतना असुरक्षित, इतना असहज क्यों होने लगा। इसीलिए हम कहते हैं कि जो हो रहा है वह स्वाभाविक नही कृत्रिम है। गवई साहब तो अब नेपथ्य में चले गये हैं- विघ्न संतोषियों को यह आरक्षण का बदला लेने, बाबा साहब अंबेडकर की बेमन की पूजा का हिसाब चुकाने और लड़खड़ाती वर्ण व्यवस्था को पुनर्जीवन देने का अवसर इसमें नजर आ रहा है। सरकार मूक दर्शक रह कर जिस आग को तापने का आनंद लेना चाहती है उसे अंदाजा नही है कि उसकी लपटें खुद सरकार को जला डालेगीं। राष्ट्रीय एकता के लिए इतना बड़ा संकट हाल में कभी पैदा नही हुआ था। जरूरत इस पर पानी डालने की है लेकिन इसमें समाज और देश के सभी शुभेच्छुओं को चाहे वे सवर्ण हों, पिछड़े हों या दलित सहभागिता करनी होगी। भाई चारे में आई दरारों को समय रहते मिलकर पाट देना पड़ेगा।

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