जब तक रोटी के प्रश्नों पर रखा रहेगा भारी पत्थर…” : मई दिवस संगोष्ठी में गूंजे संघर्ष और श्रम के स्वर

उरई। महान मई दिवस के अवसर पर शहर के वरिष्ठ वामपंथी नेता कॉमरेड कैलाश पाठक की बगिया में आयोजित संगोष्ठी में श्रमिक अधिकार, श्रम संस्कृति और मौजूदा सामाजिक-आर्थिक हालात पर वक्ताओं ने अपने विचार रखे। कार्यक्रम में उरई इप्टा की टीम ने जनगीत प्रस्तुत कर श्रमिक एकता और संघर्ष का संदेश दिया।

उरई इप्टा से चार दशकों से जुड़े वरिष्ठ रंगकर्मी राज पप्पन ने मई दिवस को “श्रम संस्कृति दिवस” बताते हुए गृहणियों के श्रम को मान्यता देने की जरूरत पर जोर दिया। उनके इस वक्तव्य ने कार्यक्रम में नई बहस को जन्म दिया।

वरिष्ठ पत्रकार केपी सिंह ने नोएडा में हड़ताली श्रमिकों पर हुए सरकारी दमन की आलोचना करते हुए कहा कि मजदूरों को मिलने वाली अल्प मजदूरी उनके श्रम का उपहास है। वहीं वरिष्ठ पत्रकार अनिल शर्मा ने मजदूरों को समाज निर्माण की बुनियाद बताया।

पूर्व विधायक कप्तान सिंह राजपूत और संतराम कुशवाहा ने सरकार की नीतियों को मजदूर विरोधी करार देते हुए श्रमिकों की समस्याओं पर गंभीर चिंता व्यक्त की।

संगोष्ठी में कॉमरेड सुधीर अवस्थी, आदित्य मिश्र, कॉमरेड विजय सिंह चौहान, भाकपा माले नेता रामसिंह सहित अन्य वक्ताओं ने भी अपने विचार रखे। इस दौरान देवेन्द्र शुक्ला ने कविता की पंक्तियां पढ़ीं—

“…मगर इतना पाते हो

कि सांस चलती रहे,

आ सको काम पर

अगली शाम पर…”

जन संघर्ष मोर्चा के संयोजक गिरेन्द्र सिंह ने कार्यक्रम का संचालन करते हुए मई दिवस के इतिहास और उसके संघर्षपूर्ण महत्व पर प्रकाश डाला।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे 92 वर्षीय कॉमरेड रामकृष्ण शुक्ला ने मजदूरों से एकजुट होकर संघर्ष करने का आह्वान किया। अंत में कॉमरेड कैलाश पाठक ने क्रांतिकारी नारे—

“जीना है तो मरना सीखो,

कदम-कदम पर लड़ना सीखो”

के साथ श्रमिक एकता और संघर्ष का संदेश दिया।

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