देश एक बार फिर ऐसे दौर से गुजर रहा है जहाँ वैश्विक अस्थिरता, युद्ध जैसी परिस्थितियाँ और आर्थिक दबाव आम जनजीवन को प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे समय में प्रधानमंत्री Narendra Modi द्वारा डीजल-पेट्रोल की बचत करने, सोने की खरीद से परहेज बरतने और अनावश्यक विदेश यात्राओं से बचने की अपील स्वाभाविक रूप से चर्चा का विषय बनी। इसके साथ ही प्रधानमंत्री के काफिले में वाहनों की संख्या घटाने जैसी खबरें भी सामने आयीं। इसके बाद भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों, विधायकों और नौकरशाहों में भी ईंधन बचत तथा सादगी के प्रदर्शन की एक तरह की होड़ दिखाई देने लगी। हालांकि जनता इन दावों को संशय की दृष्टि से देख रही है, क्योंकि लंबे समय से राजनीतिक और प्रशासनिक वर्ग का आचरण इसके उलट दिखाई देता रहा है।
असल प्रश्न यह है कि क्या सादगी और संयम केवल संकट के समय अपनाने योग्य मूल्य हैं? क्या यह केवल प्रतीकात्मक अपीलों तक सीमित रहने वाली बात है, या इसे सार्वजनिक जीवन के स्थायी संस्कार के रूप में स्थापित किया जाना चाहिए? सच तो यह है कि “सादा जीवन, उच्च विचार” केवल नैतिक शिक्षा की किताबों में लिखी पंक्ति नहीं, बल्कि किसी भी सभ्य समाज की आत्मा है। जब समाज में उपभोक्तावाद और दिखावे की संस्कृति हावी हो जाती है, तब नैतिकता, ईमानदारी और सामाजिक संतुलन धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगते हैं।
आज स्थिति यह है कि सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करने वाले अनेक लोग कुछ ही वर्षों में ऐसे वैभव का प्रदर्शन करने लगते हैं, जिसकी कल्पना उनके पूर्व जीवन से मेल नहीं खाती। जो लोग कभी सामान्य जीवन जीते थे, वे सत्ता या पद मिलने के बाद अपने पारिवारिक आयोजनों में ऐसी चमक-दमक दिखाते हैं कि पुराने रईस भी फीके पड़ जाएँ। सांसद, विधायक, मंत्री, बड़े अधिकारी—सभी के विवाह समारोहों और निजी आयोजनों में बेहिसाब धन खर्च होता दिखाई देता है। सवाल यह नहीं कि कोई व्यक्ति अपनी कमाई कहाँ खर्च करता है; सवाल यह है कि क्या उस खर्च का स्रोत समाज के सामने पारदर्शी है? यदि किसी सरकारी अधिकारी की जीवनभर की वैध आय से कहीं अधिक खर्च उसके आयोजनों में दिखाई देता है, तो क्या लोकतांत्रिक व्यवस्था में इसकी नैतिक और कानूनी समीक्षा नहीं होनी चाहिए?
दुर्भाग्य यह है कि इस तरह की भव्यता अब केवल उच्च वर्ग तक सीमित नहीं रही। समाज का हर वर्ग अपनी “प्रतिष्ठा” बचाने के लिए इसी दौड़ में शामिल होता जा रहा है। मध्यमवर्गीय परिवार कर्ज लेकर शादियों में लाखों रुपये फूंक रहे हैं। गरीब परिवार सामाजिक दबाव में अपनी सामर्थ्य से बाहर जाकर खर्च करने को मजबूर हैं। दिखावे की यह संस्कृति केवल आर्थिक संकट नहीं पैदा करती, बल्कि भ्रष्टाचार और बेईमानी को भी बढ़ावा देती है। जब समाज में सम्मान का पैमाना चरित्र और ईमानदारी के बजाय धन प्रदर्शन बन जाए, तब लोग किसी भी तरीके से पैसा कमाने को उचित मानने लगते हैं।
यहाँ सार्वजनिक जीवन में सक्रिय संगठनों और व्यक्तित्वों की जिम्मेदारी सबसे अधिक बढ़ जाती है। कभी भारत में ऐसे अनेक नैतिक केंद्र हुआ करते थे जो सत्ता को आईना दिखाने का साहस रखते थे। Mahatma Gandhi ने स्वयं सादगी को अपने जीवन का आधार बनाया। Jayaprakash Narayan ने सत्ता के अहंकार के विरुद्ध नैतिक आंदोलन खड़ा किया। उस दौर में सामाजिक संगठनों और जननेताओं की विश्वसनीयता इसलिए थी क्योंकि वे केवल भाषण नहीं देते थे, बल्कि अपने जीवन से उदाहरण प्रस्तुत करते थे।
आज अनेक संगठन स्वयं को नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों का रक्षक बताते हैं, जिनमें Rashtriya Swayamsevak Sangh भी प्रमुख है। संघ अक्सर भारतीय संस्कृति, संयम और राष्ट्रहित की बात करता है तथा स्वयं को वैचारिक मार्गदर्शक के रूप में प्रस्तुत करता है। लेकिन जब बात सत्ता में बैठे लोगों को नैतिक अनुशासन की याद दिलाने की आती है, तब उसका स्वर उतना मुखर दिखाई नहीं देता। यदि समाज में खर्चीली शादियों, भ्रष्टाचार से अर्जित संपत्ति के प्रदर्शन और उपभोगवादी मानसिकता के खिलाफ व्यापक अभियान नहीं चलाया जाता, तो केवल वैचारिक दावों से नैतिक नेतृत्व स्थापित नहीं किया जा सकता।
यह सही है कि किसी संगठन या सरकार के लिए ऐसे मुद्दों पर हस्तक्षेप करना आसान नहीं होता। लेकिन यदि सार्वजनिक जीवन के प्रभावशाली लोग स्वयं सादगी का उदाहरण प्रस्तुत करें, तो समाज पर उसका गहरा असर पड़ सकता है। यदि मंत्री, विधायक और अधिकारी अपने निजी आयोजनों में सीमित खर्च करें, दहेज और दिखावे से परहेज बरतें, तो आम जनता भी प्रेरित होगी। यदि राजनीतिक दल चुनावों में धनबल के प्रदर्शन को हतोत्साहित करें, तो लोकतंत्र की विश्वसनीयता बढ़ेगी। यदि ईमानदार और सादा जीवन जीने वाले लोगों को सार्वजनिक सम्मान मिले, तो समाज की दिशा बदल सकती है।
प्रधानमंत्री की अपील चाहे तत्कालीन वैश्विक परिस्थितियों से प्रेरित रही हो, लेकिन उसका व्यापक संदेश कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। ऊर्जा बचत केवल आर्थिक आवश्यकता नहीं, बल्कि जीवन दृष्टि का हिस्सा होनी चाहिए। सोने और विलासिता की अंधी दौड़ से दूरी केवल विदेशी मुद्रा बचाने का उपाय नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन का प्रश्न भी है। संयम, सादगी और जिम्मेदारी ऐसे मूल्य हैं जो किसी राष्ट्र को भीतर से मजबूत बनाते हैं।
भारत जैसे विशाल और विविध समाज में नैतिकता केवल कानून से स्थापित नहीं की जा सकती। इसके लिए सामाजिक चेतना, सार्वजनिक उदाहरण और नैतिक नेतृत्व की जरूरत होती है। जब तक सत्ता, समाज और संगठन मिलकर सादगी को सम्मान तथा फिजूलखर्ची को सामाजिक बुराई मानने का साहस नहीं दिखाएंगे, तब तक समय-समय पर की जाने वाली अपीलें केवल प्रतीक बनकर रह जाएँगी। संकट के समय ईंधन बचाने की सलाह देना उपयोगी है, लेकिन उससे भी अधिक जरूरी है ऐसा समाज बनाना जहाँ सादगी मजबूरी नहीं, बल्कि गौरव का विषय हो।







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