
भारतीय राजनीति का एक विचित्र सत्य यह है कि लगभग हर बड़ा नेता अपने संघर्षकाल में आंदोलनों का ऋणी होता है, लेकिन सत्ता में पहुँचते ही उसे आंदोलन व्यवस्था के लिए खतरा लगने लगते हैं। यह केवल व्यक्तियों का परिवर्तन नहीं, बल्कि सत्ता के स्वभाव का भी परिवर्तन है। इसी संदर्भ में जब आज के भारत में विरोध प्रदर्शनों, धरनों और जनआंदोलनों के प्रति बढ़ती असहजता दिखाई देती है, तो इतिहास के पन्नों से Muhammad Ali Jinnah की याद अनायास सामने आ खड़ी होती है।
जिन्ना अपने शुरुआती राजनीतिक जीवन में जनआंदोलनों और भीड़ आधारित राजनीति के आलोचक थे। वे संवैधानिक सुधार, संवाद और विधायी प्रक्रिया में विश्वास रखते थे। Mahatma Gandhi के असहयोग आंदोलन का उन्होंने इसी कारण विरोध किया था। उन्हें लगता था कि हड़तालें, बहिष्कार और उग्र जनसक्रियता व्यवस्था को पटरी से उतार देती हैं। वे मानते थे कि भीड़ की राजनीति अंततः संस्थाओं को कमजोर करती है और समाज को अराजकता की ओर ले जाती है।
विडंबना देखिए कि आज भारतीय लोकतंत्र में सत्ता और संस्थानों के कुछ स्वर उसी तर्क के आसपास मंडराते दिखाई देते हैं।

Narendra Modi जब विपक्ष में थे, तब सड़क से संसद तक आंदोलनों की राजनीति भारतीय जनता पार्टी की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा थी। राम मंदिर आंदोलन से लेकर भ्रष्टाचार विरोधी अभियानों तक, जनसक्रियता को लोकतांत्रिक दबाव की वैध अभिव्यक्ति माना जाता था। लेकिन सत्ता में आने के बाद वही आंदोलन अब “व्यवधान”, “अराजकता” और “राष्ट्रहित के विरुद्ध दबाव” की तरह दिखाई देने लगे।
इसी मनोवृत्ति का सबसे चर्चित रूप तब सामने आया जब मोदी ने कुछ आंदोलनकारियों को “आंदोलनजीवी” कहा। यह शब्द केवल राजनीतिक व्यंग्य नहीं था; इसके भीतर आंदोलनों के प्रति सत्ता की गहरी वितृष्णा छिपी थी। संदेश साफ था—कुछ लोग विरोध को पेशा बना चुके हैं और लोकतंत्र की ऊर्जा को बाधित कर रहे हैं।
यहाँ प्रश्न केवल शब्द का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या लोकतंत्र में असहमति को संदेह की निगाह से देखने की प्रवृत्ति बढ़ रही है? क्या विरोध को अब लोकतांत्रिक अधिकार की जगह प्रशासनिक समस्या की तरह देखा जाने लगा है?
भारतीय लोकतंत्र की बुनियाद ही आंदोलनों पर खड़ी हुई थी। स्वतंत्रता आंदोलन स्वयं दुनिया के सबसे बड़े जनआंदोलनों में से एक था। किसान आंदोलन, दलित आंदोलन, महिला आंदोलन, जेपी आंदोलन, मंडल आंदोलन—इन सबने भारतीय राजनीति और समाज को आकार दिया है। यदि हर विरोध को व्यवस्था-विरोधी मान लिया जाए, तो लोकतंत्र केवल चुनावी प्रक्रिया तक सीमित होकर रह जाएगा।

इसी संदर्भ में Justice Surya Kant की कुछ टिप्पणियाँ भी बहस का विषय बनीं। विरोध प्रदर्शनों और सड़क अवरोधों को लेकर उनकी कठोर टिप्पणियाँ इस बात का संकेत देती हैं कि न्यायपालिका का एक हिस्सा भी “व्यवस्था बनाम विरोध” की बहस में व्यवस्था के पक्ष में अधिक झुकता दिखाई देता है।
“कॉकरोच” वाला मुहावरा इसी असहजता का प्रतीक बन गया। सार्वजनिक जीवन में शब्द कभी केवल शब्द नहीं होते; वे मानसिकता का दर्पण भी होते हैं। जब आंदोलनकारी समूहों के लिए ऐसे रूपकों का प्रयोग होता है, तो यह संदेश जाता है कि विरोध करने वाले नागरिक अब लोकतांत्रिक साझेदार नहीं, बल्कि व्यवस्था पर बोझ समझे जा रहे हैं। यही कारण है कि वह टिप्पणी लंबे समय तक विवादों में रही।
दरअसल सत्ता और संस्थान स्वभावतः स्थिरता चाहते हैं, जबकि आंदोलन स्वभावतः बेचैनी पैदा करते हैं। सत्ता को सड़क पर उतरता जनसमूह अक्सर खतरे की तरह दिखाई देता है, क्योंकि वह स्थापित नियंत्रण को चुनौती देता है। यही कारण है कि इतिहास में लगभग हर शासन ने आंदोलनों को लेकर दोहरी मानसिकता दिखाई है—विपक्ष में रहते हुए उन्हें लोकतंत्र का उत्सव कहा जाता है और सत्ता में आने के बाद उन्हें अव्यवस्था का स्रोत।
जिन्ना का उदाहरण इसलिए दिलचस्प है क्योंकि वे मूलतः अभिजात और संवैधानिक राजनीति के व्यक्ति थे। वे अदालतों, समझौतों और विधायी बहसों के जरिए परिवर्तन चाहते थे। उन्हें गांधी की जनराजनीति असहज करती थी। लेकिन इतिहास की विडंबना देखिए कि बाद के वर्षों में वही जिन्ना मुस्लिम राजनीतिक लामबंदी के सबसे बड़े प्रतीक बन गए। यानी राजनीति अंततः केवल सिद्धांतों से नहीं, परिस्थितियों से भी संचालित होती है।
भारत में भी यही द्वंद्व दिखाई देता है। जो दल कल तक धरना और सत्याग्रह को लोकतंत्र की आत्मा बताते थे, वे आज ट्रैफिक जाम, सार्वजनिक असुविधा और आर्थिक क्षति का हवाला देकर आंदोलनों को सीमित करना चाहते हैं। दूसरी ओर जो समूह आज विरोध की स्वतंत्रता की बात कर रहे हैं, वे स्वयं सत्ता में आने पर शायद अलग रवैया अपनाएँ।
यही लोकतंत्र का शाश्वत तनाव है—व्यवस्था कितनी हो और असहमति कितनी।
यदि केवल व्यवस्था ही सर्वोच्च मूल्य बन जाए, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे अनुशासित मौन में बदलने लगता है। लेकिन यदि हर क्षण केवल आंदोलन ही आंदोलन हो, तो शासन चलाना असंभव हो जाता है। लोकतंत्र की परिपक्वता इसी संतुलन में निहित है कि राज्य विरोध को सहन करे और आंदोलन भी संस्थागत सीमाओं का सम्मान करें।
लेकिन चिंता तब पैदा होती है जब विरोध को नैतिक रूप से ही संदिग्ध ठहराया जाने लगे। “आंदोलनजीवी” या “कॉकरोच” जैसे मुहावरे केवल तात्कालिक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं रह जाते; वे लोकतांत्रिक संस्कृति को प्रभावित करने लगते हैं। वे नागरिकों को यह एहसास दिलाते हैं कि सत्ता असहमति को सुनने से अधिक उसे नियंत्रित करने में रुचि रखती है।

और तभी स्मृति के किसी कोने से आडवाणी प्रसंग भी उभर आता है। Lal Krishna Advani ने जब जिन्ना की एक विशेषता—उनके 11 अगस्त 1947 के भाषण—की प्रशंसा कर दी थी, तब उन्हें अपने ही वैचारिक परिवार की तीखी नाराज़गी झेलनी पड़ी थी। भारतीय राजनीति में जिन्ना का नाम केवल इतिहास नहीं, भावनात्मक प्रतीक भी है। इसलिए उनकी किसी भी विशेषता का उल्लेख तुरंत वैचारिक विवाद में बदल जाता है।
लेकिन इतिहास की विडंबनाएँ अक्सर असुविधाजनक होती हैं। कभी-कभी जिन व्यक्तियों की आलोचना की जाती है, उन्हीं के कुछ विचार अनजाने में वर्तमान सत्ता और संस्थानों के व्यवहार में झलकने लगते हैं। विरोध प्रदर्शनों को लेकर आज की बेचैनी शायद उसी विडंबना का एक नया अध्याय है।







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