
क्या राजनीतिक सुधार के नाम पर लोकतंत्र को और कमजोर किया जा रहा है?
संसद का आगामी सत्र 20 जुलाई से प्रस्तावित है। सरकार ने संकेत दिए हैं कि इस सत्र में कई महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराया जाएगा। इनमें विशेष रूप से वे विधेयक शामिल हैं जिन्हें पिछले सत्र में पर्याप्त समर्थन न मिलने के कारण पारित नहीं कराया जा सका था। उस समय सरकार को पहली बार यह अनुभव हुआ कि केवल लोकसभा में भारी बहुमत होना पर्याप्त नहीं है; राज्यसभा में संख्या का गणित भी उतना ही निर्णायक होता है। इसके बाद सत्ता पक्ष ने दोनों सदनों में अपने पक्ष में आवश्यक समर्थन जुटाने के लिए पूरी राजनीतिक शक्ति झोंक दी। भारतीय राजनीति में यह कोई नई बात नहीं है, किंतु प्रश्न यह है कि क्या लोकतंत्र में बहुमत प्राप्त करने का हर तरीका वैध माना जा सकता है?
लोकतंत्र केवल संख्या का खेल नहीं है। यदि ऐसा होता तो संविधान, संस्थाएँ, विपक्ष, संसदीय समितियाँ और न्यायपालिका जैसी व्यवस्थाओं की आवश्यकता ही नहीं रहती। लोकतंत्र का सार सत्ता पर नियंत्रण, संवाद, असहमति के सम्मान और संवैधानिक मर्यादा में निहित है। बहुमत लोकतंत्र का साधन है, उसका अंतिम लक्ष्य नहीं। जब बहुमत स्वयं लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने का माध्यम बनने लगे, तब लोकतंत्र का वास्तविक संकट आरंभ होता है।
भारत में आज सबसे बड़ी विडंबना यह है कि लोकतंत्र का क्षरण असाधारण घटना नहीं रह गया है। धीरे-धीरे वह सामान्य राजनीतिक व्यवहार का हिस्सा बनता जा रहा है। सत्ता के दुरुपयोग, संवैधानिक संस्थाओं पर दबाव, विपक्ष को कमजोर करने के प्रयास और संसदीय परंपराओं के ह्रास जैसी घटनाएँ अब लोगों को उतना विचलित नहीं करतीं जितना उन्हें करना चाहिए। समाज जैसे इन सबका अभ्यस्त हो गया है।
ऐसे समय में नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री की एक महत्वपूर्ण स्थापना स्मरण हो आती है। उनका कहना था कि कोई भी सामाजिक कुरीति यदि लंबे समय तक चलती रहती है, तो लोग उसे सामान्य मानने लगते हैं। धीरे-धीरे उनके भीतर यह चेतना ही समाप्त हो जाती है कि जिस व्यवस्था को वे स्वाभाविक समझ रहे हैं, वह वास्तव में अन्यायपूर्ण है। भारत में लोकतांत्रिक संस्थाओं के क्षरण को लेकर समाज की बढ़ती संवेदनहीनता कुछ वैसी ही प्रतीत होती है।
लोगों ने सत्ता की मनमानी को राजनीतिक यथार्थ मान लिया है। उन्हें यह अस्वाभाविक नहीं लगता कि निर्वाचित सरकारें विपक्ष को कमजोर करने के लिए हर प्रकार के राजनीतिक और प्रशासनिक साधनों का प्रयोग करें। वे यह भी नहीं पूछते कि क्या लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम है, या फिर चुनावों के बीच भी कुछ नैतिक और संवैधानिक मर्यादाएँ होती हैं। जब जनता प्रश्न पूछना बंद कर देती है, तब सत्ता का निरंकुश होना लगभग निश्चित हो जाता है।
यह कहना उचित नहीं होगा कि भारत में लोकतांत्रिक मर्यादाओं का उल्लंघन केवल वर्तमान समय की समस्या है। स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक केंद्र और अधिकांश राज्यों में कांग्रेस का वर्चस्व रहा। उस दौर में भी सत्ता के दुरुपयोग के अनेक उदाहरण सामने आए। यदि किसी राज्य में विपक्ष की सरकार बन जाती थी, तो उसे अनुच्छेद 356 के माध्यम से समय से पहले हटाने का प्रयास असामान्य नहीं माना जाता था। संघीय ढाँचे को इससे गंभीर क्षति पहुँची।
लेकिन उस दौर और आज के समय में एक महत्वपूर्ण अंतर था। तब राजनीतिक व्यवस्था के भीतर आत्मसुधार की चेतना भी सक्रिय थी। नागरिक समाज, न्यायपालिका, मीडिया और विपक्ष लगातार लोकतांत्रिक सुधारों की माँग कर रहे थे। उसी दबाव का परिणाम था कि का गठन हुआ। आयोग ने केंद्र और राज्यों के संबंधों को अधिक संतुलित बनाने तथा अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग पर रोक लगाने के लिए महत्वपूर्ण सिफारिशें कीं। बाद में न्यायपालिका ने भी अपने ऐतिहासिक निर्णयों के माध्यम से राज्यों की निर्वाचित सरकारों को अधिक सुरक्षा प्रदान की। इससे भारतीय संघवाद पहले की तुलना में अधिक परिपक्व हुआ।
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में यदि किसी जनांदोलन ने राजनीतिक सुधारों को सबसे व्यापक रूप में प्रस्तुत किया, तो वह का संपूर्ण क्रांति आंदोलन था। इस आंदोलन का उद्देश्य केवल सरकार बदलना नहीं था। उसका लक्ष्य राजनीति की संस्कृति बदलना था। राजनीति को धनबल, बाहुबल, भ्रष्टाचार, परिवारवाद और निरंकुशता से मुक्त कर जनसरोकारों से जोड़ना उसकी मूल प्रेरणा थी।
दुर्भाग्य से संपूर्ण क्रांति के अनेक आदर्श सत्ता परिवर्तन के बाद धीरे-धीरे पीछे छूटते चले गए। फिर भी इस आंदोलन ने भारतीय राजनीति में लोकतांत्रिक सुधारों की जो चेतना उत्पन्न की, उसका प्रभाव लंबे समय तक दिखाई देता रहा।
इसी क्रम में वी पी सिंह का कार्यकाल विशेष उल्लेखनीय है। उनका प्रधानमंत्री काल भले ही लंबा नहीं रहा, किंतु उन्होंने राजनीति को अधिक नैतिक और उत्तरदायी बनाने के कई प्रयास किए। ‘एक व्यक्ति–एक पद’ का सिद्धांत, राजनीति में अपराधी और माफिया तत्वों के प्रभाव को सीमित करने की कोशिश, चुनावी खर्च के लिए सरकारी सहायता पर बहस तथा परिवारवाद को हतोत्साहित करने जैसे कदम उसी सोच का हिस्सा थे। यद्यपि उनकी अपनी पार्टी और तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियाँ इन सुधारों को आगे बढ़ाने में बाधक बन गईं।
उसी समय भारतीय जनता पार्टी स्वयं को ‘पार्टी विद ए डिफरेंस’ कहती थी। उस नारे का अर्थ केवल कांग्रेस का विरोध करना नहीं था, बल्कि राजनीति में एक अलग नैतिक मानक स्थापित करना भी था। जनता को यह विश्वास दिलाया गया था कि सत्ता परिवर्तन के साथ राजनीतिक संस्कृति भी बदलेगी। किंतु आज जब वही दल देश की सबसे शक्तिशाली राजनीतिक शक्ति है, तो स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि क्या वह अपने ही घोषित आदर्शों पर खरी उतर रही है?
आज सरकार जिन प्रस्तावित विधेयकों को राजनीतिक सुधार बताकर प्रस्तुत कर रही है, उनके उद्देश्य को लेकर गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं। ‘वन नेशन–वन इलेक्शन’ हो या महिला आरक्षण के साथ परिशीमन का प्रश्न—इन सब पर व्यापक राष्ट्रीय सहमति बनाने के बजाय राजनीतिक लाभ-हानि की दृष्टि अधिक प्रभावी दिखाई देती है। लोकतांत्रिक सुधारों की सफलता इस बात से नहीं मापी जाती कि वे सरकार को कितना लाभ पहुँचाते हैं, बल्कि इससे मापी जाती है कि वे लोकतंत्र को कितना अधिक न्यायपूर्ण, पारदर्शी और उत्तरदायी बनाते हैं।
यदि वास्तव में राजनीतिक सुधार ही सरकार की प्राथमिकता होती, तो भारत में प्रधानमंत्री के कार्यकाल की संवैधानिक सीमा निर्धारित करने जैसे प्रश्न पर भी राष्ट्रीय बहस प्रारंभ की जा सकती थी। अमेरिका सहित अनेक लोकतांत्रिक देशों में सर्वोच्च कार्यपालिका के प्रमुख के कार्यकाल पर सीमा निर्धारित है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष को रोकना नहीं, बल्कि सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण को रोकना है। जब कोई शासक यह जानता है कि उसका समय सीमित है, तब उसके सामने इतिहास में अपनी पहचान छोड़ने की प्रेरणा अधिक होती है, जबकि अनिश्चितकाल तक सत्ता में बने रहने की संभावना अनेक बार संस्थाओं से अधिक व्यक्ति को महत्वपूर्ण बना देती है। यही वह बिंदु है जहाँ लोकतंत्र धीरे-धीरे व्यक्तिनिष्ठ शासन की ओर बढ़ने लगता है।
यदि राजनीतिक सुधारों के प्रति वास्तविक प्रतिबद्धता होती, तो केवल कार्यकाल की सीमा ही नहीं, बल्कि लोकतंत्र को अधिक उत्तरदायी बनाने वाले अनेक अन्य विषय भी सरकार की प्राथमिकताओं में होते। उदाहरण के लिए, निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को जनता द्वारा वापस बुलाने अर्थात ‘राइट टू रिकॉल’ का प्रश्न लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है। के विचारों से प्रेरित होकर जनता दल ने इसे अपने घोषणा-पत्र में स्थान दिया था। यद्यपि तत्कालीन परिस्थितियों में इसे लागू नहीं किया जा सका, लेकिन आज तकनीकी और प्रशासनिक दृष्टि से यह पहले की अपेक्षा अधिक व्यावहारिक विषय बन चुका है। यदि जनता को अपने निर्वाचित प्रतिनिधि को कार्यकाल के बीच उत्तरदायी बनाने का अधिकार मिले, तो लोकतंत्र की गुणवत्ता निश्चित रूप से बेहतर होगी।
इसी प्रकार दल-बदल विरोधी कानून भी अपने उद्देश्य को पूर्णतः प्राप्त नहीं कर सका है। जिस कानून का उद्देश्य राजनीतिक खरीद-फरोख्त और अवसरवाद पर रोक लगाना था, वही आज अनेक कानूनी व्याख्याओं और तकनीकी कमियों के कारण प्रभावहीन होता दिखाई देता है। सामूहिक इस्तीफे, विलय की व्याख्या और अध्यक्ष के विवेकाधिकार जैसे प्रावधानों ने इस कानून की धार कुंद कर दी है। परिणाम यह है कि दल-बदल पहले की तुलना में कम नहीं, बल्कि अधिक दिखाई देता है। इससे मतदाता का विश्वास टूटता है और लोकतंत्र की नैतिक प्रतिष्ठा को गहरी क्षति पहुँचती है।
यदि सरकार वास्तव में लोकतांत्रिक सुधार चाहती, तो दल-बदल कानून की इन कमियों को दूर करने का प्रयास करती। किंतु ऐसा करना शायद उसके राजनीतिक हितों के अनुकूल नहीं है। आज की राजनीति में विधायकों और सांसदों का समर्थन जुटाना स्वयं सत्ता-प्रबंधन का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन गया है। इसलिए व्यवस्था की कमियाँ अनेक बार सुधार का नहीं, बल्कि राजनीतिक सुविधा का साधन बन जाती हैं।
भारतीय संघवाद भी इस समय गंभीर बहस का विषय है। संविधान ने राज्यपाल को केंद्र और राज्यों के बीच संवैधानिक सेतु के रूप में परिकल्पित किया था, किंतु व्यवहार में अनेक अवसरों पर यह पद राजनीतिक विवाद का केंद्र बन गया है। विपक्ष-शासित राज्यों में सरकार गठन, बहुमत परीक्षण, विधेयकों को लंबित रखने तथा प्रशासनिक निर्णयों में हस्तक्षेप जैसे मुद्दों ने राज्यपाल संस्था की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगाए हैं। विभिन्न राजनीतिक दल अलग-अलग समय पर इन आरोपों का सामना करते रहे हैं, किंतु हाल के वर्षों में इस विषय पर विवादों की आवृत्ति और तीव्रता दोनों बढ़ी हैं।
भारत जैसा बहुभाषी, बहुसांस्कृतिक और संघीय देश तभी सुदृढ़ रह सकता है जब राज्यों की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं का सम्मान हो। यदि राज्यों को यह महसूस होने लगे कि उनकी निर्वाचित सरकारें निरंतर राजनीतिक दबाव में हैं, तो इसका प्रभाव केवल राज्य सरकारों पर नहीं, बल्कि पूरे संघीय ढाँचे पर पड़ता है। लोकतंत्र का अर्थ केवल मजबूत केंद्र नहीं, बल्कि सम्मानजनक और संतुलित संघवाद भी है।
चुनावी व्यवस्था का बढ़ता व्यावसायीकरण भी उतना ही चिंताजनक है। चुनाव अब इतने महंगे हो चुके हैं कि सामान्य पृष्ठभूमि का योग्य व्यक्ति चुनाव लड़ने की कल्पना भी कठिनाई से कर सकता है। चुनावी राजनीति पर धनबल का प्रभाव लगातार बढ़ा है। प्रचार, संगठन, जनसंपर्क और संसाधनों की प्रतिस्पर्धा ने लोकतंत्र को असमान बना दिया है। आर्थिक रूप से समर्थ दल और उम्मीदवार स्वाभाविक बढ़त प्राप्त कर लेते हैं।
इसका एक दूसरा दुष्परिणाम भी सामने आया है। बड़े उद्योगपति और आर्थिक हित समूह राजनीतिक व्यवस्था पर पहले की तुलना में कहीं अधिक प्रभावशाली होते जा रहे हैं। लोकतांत्रिक सरकारें जनता के प्रति जितनी उत्तरदायी होनी चाहिए, उतनी ही अनेक बार आर्थिक शक्ति केंद्रों के प्रति भी संवेदनशील दिखाई देती हैं। यह स्थिति लोकतंत्र के मूल दर्शन के विपरीत है, क्योंकि लोकतंत्र में अंतिम निर्णायक नागरिक होना चाहिए, पूँजी नहीं।
यही कारण है कि चुनावों के लिए सरकारी वित्तपोषण का प्रश्न समय-समय पर उठता रहा है। ने भी इस दिशा में बहस प्रारंभ करने का प्रयास किया था। यदि चुनावी व्यय का एक बड़ा भाग सार्वजनिक व्यवस्था के माध्यम से वहन किया जाए और निजी धन पर निर्भरता घटे, तो राजनीति में आर्थिक असमानता का प्रभाव कम किया जा सकता है। किंतु जिस व्यवस्था में धन स्वयं सत्ता प्राप्ति का सबसे बड़ा साधन बन चुका हो, वहाँ ऐसे सुधारों की संभावना स्वाभाविक रूप से क्षीण हो जाती है।
इसी संदर्भ में ‘वन नेशन–वन इलेक्शन’ जैसे प्रस्तावों पर भी व्यापक राष्ट्रीय विमर्श आवश्यक है। प्रशासनिक सुविधा और चुनावी खर्च कम करने के तर्क अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण लोकतंत्र में इस विषय के संवैधानिक, राजनीतिक और संघीय आयाम कहीं अधिक गंभीर हैं। यदि चुनावों की आवृत्ति कम होने से जनता के हाथ में सरकारों को जवाबदेह बनाने का अवसर भी सीमित हो जाए, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि सुविधा और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व के बीच संतुलन कैसे स्थापित होगा। ऐसे विषयों पर व्यापक सहमति और गहन विमर्श के बिना आगे बढ़ना लोकतांत्रिक दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता।
महिला आरक्षण का उद्देश्य निस्संदेह स्वागतयोग्य है। भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ना समय की आवश्यकता है। किंतु यदि इसके क्रियान्वयन को परिशीमन और जनगणना जैसी शर्तों से जोड़ दिया जाए, तो राजनीतिक आशंकाएँ जन्म लेना स्वाभाविक है। किसी भी सुधार की विश्वसनीयता तभी बनती है जब उसकी मंशा पर संदेह की गुंजाइश न्यूनतम हो।
लोकतंत्र का सबसे बड़ा आधार जनता की जागरूकता है। संविधान चाहे जितना उत्कृष्ट हो, संस्थाएँ चाहे जितनी सशक्त हों, यदि नागरिक अपने अधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति उदासीन हो जाएँ तो कोई भी व्यवस्था अधिक समय तक स्वस्थ नहीं रह सकती। इतिहास बताता है कि लोकतंत्र का पतन अचानक नहीं होता। वह धीरे-धीरे नागरिकों की संवेदनहीनता, संस्थाओं की निष्क्रियता और सत्ता के बढ़ते केंद्रीकरण के माध्यम से घटित होता है।
विडंबना यह है कि आज भी समाज का बड़ा वर्ग लोकतंत्र की वास्तविक उपयोगिता को केवल मतदान तक सीमित समझता है। जबकि लोकतंत्र नागरिक को केवल सरकार चुनने का अधिकार नहीं देता; वह उसे असहमति व्यक्त करने, प्रश्न पूछने, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपयोग करने और सत्ता को निरंतर उत्तरदायी बनाए रखने का अधिकार भी देता है। यही अधिकार किसी नागरिक को प्रजा बनने से बचाते हैं।
यदि लोकतांत्रिक संस्थाएँ लगातार कमजोर होती गईं, यदि संसद विमर्श का मंच बनने के बजाय केवल औपचारिकता का माध्यम बनती गई, यदि राजनीतिक सुधारों का अर्थ केवल सत्ता की दीर्घायु सुनिश्चित करना रह गया, तो अंततः सबसे बड़ी क्षति नागरिक की स्वतंत्रता को होगी। तब लोकतंत्र केवल संविधान की पुस्तकों में जीवित रहेगा, जनजीवन में नहीं।
इसीलिए संसद का प्रत्येक सत्र केवल विधेयकों की संख्या से नहीं, बल्कि इस कसौटी पर परखा जाना चाहिए कि उसने लोकतंत्र को कितना मजबूत किया। संसद की सफलता इस बात में नहीं है कि सरकार कितने विधेयक पारित करा लेती है, बल्कि इस बात में है कि वे विधेयक लोकतांत्रिक मूल्यों, संवैधानिक संतुलन और नागरिक अधिकारों को कितना सुदृढ़ करते हैं।
यदि संसद केवल सरकार की इच्छा का अनुमोदन करने वाली संस्था बनकर रह जाए, तो उसकी गरिमा घटती है। किंतु यदि वही संसद सत्ता को प्रश्नों के कटघरे में खड़ा करे, विपक्ष को सार्थक भूमिका निभाने का अवसर दे और राष्ट्रीय सहमति का मंच बने, तभी वह लोकतंत्र का वास्तविक मंदिर कहलाने की अधिकारी है।
भारत का लोकतंत्र आज ऐसे ही एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। आने वाला समय केवल यह तय नहीं करेगा कि कौन-सा विधेयक पारित हुआ और कौन-सा नहीं; वह यह भी तय करेगा कि भारतीय लोकतंत्र अधिक परिपक्व होगा या अधिक केंद्रीकृत। इतिहास अंततः सरकारों का मूल्यांकन उनकी चुनावी सफलताओं से नहीं, बल्कि इस आधार पर करता है कि उन्होंने लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत किया या उन्हें अपने राजनीतिक हितों का साधन बना दिया।






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