आरएसएस-हंगामा है क्यों बरपा

भारत के सार्वजनिक जीवन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) एक ऐसी संस्था है जिसका प्रभाव उसके औपचारिक स्वरूप से कहीं अधिक व्यापक माना जाता है। लगभग एक शताब्दी के इतिहास, देशभर में फैले हजारों शाखा नेटवर्क, लाखों स्वयंसेवकों और भारतीय राजनीति, समाज तथा विचार-जगत पर गहरे प्रभाव के कारण संघ आज केवल एक संगठन नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण संस्थागत शक्ति के रूप में देखा जाता है। इसके बावजूद एक तथ्य बार-बार चर्चा का विषय बनता है कि संघ स्वयं को एक अपंजीकृत सांस्कृतिक संगठन के रूप में संचालित करता है। यह स्थिति न केवल कानूनी प्रश्न उठाती है, बल्कि उससे कहीं अधिक गंभीर नैतिक, लोकतांत्रिक और राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी बहस को जन्म देती है।

पटना हाईकोर्ट का फैसला और उसकी सीमाएँ

संघ की अपंजीकृत स्थिति के पक्ष में सबसे अधिक उद्धृत न्यायिक निर्णय 1994 का पटना हाईकोर्ट का फैसला है। यह मामला मूलतः आयकर विवाद से जुड़ा था। प्रश्न यह था कि स्वयंसेवकों द्वारा दी जाने वाली “गुरुदक्षिणा” को आयकर योग्य आय माना जाए या नहीं।

अदालत ने संघ को “Body of Individuals” अर्थात व्यक्तियों के समूह के रूप में स्वीकार करते हुए “Mutuality Principle” यानी पारस्परिकता के सिद्धांत को लागू किया। न्यायालय ने माना कि स्वयंसेवकों द्वारा दिया गया योगदान और उसी समुदाय के हित में उसका उपयोग सामान्य व्यापारिक आय नहीं माना जा सकता।

महत्वपूर्ण बात यह है कि अदालत ने यह नहीं कहा था कि संघ को हमेशा के लिए कर छूट प्राप्त है, न ही यह कहा था कि संघ को कभी पंजीकरण की आवश्यकता नहीं होगी। निर्णय केवल उस विशेष कर विवाद और गुरुदक्षिणा की प्रकृति तक सीमित था। किंतु समय के साथ इस फैसले की ऐसी व्याख्या प्रचलित हो गई मानो अदालत ने संघ को अपंजीकृत रहने का स्थायी वैधानिक संरक्षण प्रदान कर दिया हो।

1978 का सीबीडीटी आदेश : संयोग या प्रभाव?

इस पूरे विवाद में एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है। 19 दिसंबर 1978 को केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) ने एक पत्र जारी किया था जिसमें संघ को मिलने वाली गुरुदक्षिणा के संदर्भ में पारस्परिकता के सिद्धांत को स्वीकार किया गया। बाद में पटना हाईकोर्ट ने भी इस पत्र को महत्वपूर्ण माना।

यहीं से एक राजनीतिक प्रश्न जन्म लेता है।

1978 में केंद्र में जनता पार्टी की सरकार थी, जिसमें पूर्व भारतीय जनसंघ के नेता प्रभावशाली भूमिका में थे। अटल बिहारी वाजपेयी विदेश मंत्री थे और लालकृष्ण आडवाणी सूचना एवं प्रसारण मंत्री। स्वाभाविक रूप से आलोचक यह प्रश्न उठाते हैं कि क्या यह आदेश केवल विधिक विवेचना का परिणाम था या उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों ने भी इसमें भूमिका निभाई?

इस प्रश्न का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध नहीं है। किंतु लोकतंत्र में केवल तथ्य ही नहीं, बल्कि संस्थागत निष्पक्षता की सार्वजनिक धारणा भी महत्वपूर्ण होती है। जब किसी विशेष संगठन को लाभ पहुँचाने वाला आदेश उसी दौर में जारी होता है जब उससे वैचारिक रूप से जुड़े लोग सत्ता में हों, तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

क्या नरसिंह राव सरकार ने कमजोर पैरवी की?

1994 में जब पटना हाईकोर्ट का निर्णय आया, तब केंद्र में पी. वी. नरसिंह राव के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी।

यह भी एक बहस का विषय रहा है कि क्या उस समय संघ के विरुद्ध आयकर विभाग ने पर्याप्त दृढ़ता से अपना पक्ष रखा था। उपलब्ध न्यायिक अभिलेखों में ऐसा कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिलता कि सरकार ने जानबूझकर कमजोर पैरवी करवाई हो। फिर भी यह प्रश्न बना रहता है कि यदि मामला इतना महत्वपूर्ण था, तो उसके बाद सर्वोच्च न्यायालय में प्रभावी चुनौती क्यों दिखाई नहीं देती।

यहाँ भी निर्णायक निष्कर्ष निकालना कठिन है, लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि संघ की वर्तमान कानूनी स्थिति केवल एक न्यायिक निर्णय का परिणाम नहीं, बल्कि दशकों से चली आ रही प्रशासनिक और राजनीतिक प्रक्रियाओं का संयुक्त परिणाम है।

संघ और भाजपा : सांस्कृतिक या राजनीतिक संबंध?

संघ स्वयं को सांस्कृतिक संगठन कहता है। लेकिन भारतीय राजनीति का शायद ही कोई गंभीर अध्येता होगा जो संघ और भाजपा के गहरे संबंधों से अनभिज्ञ हो।

भाजपा में संगठन मंत्री की परंपरा इसका सबसे प्रत्यक्ष उदाहरण है। दशकों से संघ के प्रचारकों को भाजपा में संगठनात्मक जिम्मेदारियाँ दी जाती रही हैं। भाजपा के अनेक राष्ट्रीय अध्यक्ष, मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री और शीर्ष नेता संघ की पृष्ठभूमि से आए हैं।

यहाँ मूल प्रश्न यह नहीं है कि संघ को राजनीति में रुचि रखने का अधिकार है या नहीं। लोकतंत्र में हर संगठन को वैचारिक प्रभाव डालने का अधिकार है। प्रश्न यह है कि जब कोई संगठन देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी की संरचना, नेतृत्व निर्माण और रणनीतिक दिशा पर प्रत्यक्ष प्रभाव रखता हो, तब क्या उसे केवल “सांस्कृतिक संगठन” कहकर सामान्य सामाजिक संगठनों की श्रेणी में रखा जा सकता है?

पारदर्शिता का प्रश्न

विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू वित्तीय पारदर्शिता है।

संघ बार-बार कहता है कि उसकी आय का प्रमुख स्रोत स्वयंसेवकों की गुरुदक्षिणा है। लेकिन सार्वजनिक रूप से यह जानकारी उपलब्ध नहीं है कि किसी वर्ष उसे कुल कितनी गुरुदक्षिणा प्राप्त हुई, कितने दानदाताओं ने योगदान दिया, कितना धन विभिन्न गतिविधियों पर खर्च हुआ और कितना शेष रहा।

यहाँ प्रश्न केवल संघ का नहीं है। किसी भी लोकतंत्र में जितना बड़ा संगठन होता है, उससे उतनी अधिक जवाबदेही की अपेक्षा की जाती है।

आज दुनिया भर में गैर-सरकारी संगठन, धार्मिक संस्थाएँ, विश्वविद्यालय, थिंक टैंक और लॉबी समूह नियमित रूप से अपनी वार्षिक रिपोर्ट और ऑडिट विवरण प्रकाशित करते हैं। इससे उनकी वैधता और विश्वसनीयता बढ़ती है।

यदि कोई संगठन स्वयं को राष्ट्र निर्माण का वाहक और चरित्र निर्माण का माध्यम मानता है, तो क्या उससे न्यूनतम कानूनी अपेक्षाओं से आगे बढ़कर अधिक पारदर्शिता की अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए?

राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेशी प्रभाव का नया विमर्श

इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में एक नया विमर्श उभरा है। दुनिया भर के लोकतंत्र यह स्वीकार कर रहे हैं कि विदेशी शक्तियाँ अब केवल सैन्य माध्यमों से नहीं, बल्कि वैचारिक, सांस्कृतिक और सूचना-आधारित नेटवर्कों के माध्यम से भी प्रभाव स्थापित करती हैं।

अमेरिका, यूरोप और एशिया के अनेक देशों में विदेशी प्रभाव, अपारदर्शी फंडिंग और दुष्प्रचार अभियानों को लेकर गंभीर चिंताएँ व्यक्त की जा रही हैं।

भारत भी इससे अछूता नहीं है।

ऐसी स्थिति में यह प्रश्न और अधिक प्रासंगिक हो जाता है कि क्या विशाल जनाधार और वैचारिक प्रभाव वाले संगठनों के लिए स्वैच्छिक पारदर्शिता लोकतांत्रिक सुरक्षा का हिस्सा नहीं बन जानी चाहिए?

यहाँ किसी एक संगठन पर आरोप लगाने का प्रश्न नहीं है। प्रश्न सिद्धांत का है। यदि कल कोई अन्य संगठन—चाहे वह धार्मिक, जातीय, क्षेत्रीय या वैचारिक हो—आरएसएस का उदाहरण देकर अपंजीकृत रहना चाहे, तो राज्य के पास उसे रोकने का क्या नैतिक आधार होगा?

क्या अन्य धार्मिक समुदायों को भी ऐसी छूट है?

तकनीकी रूप से उत्तर है—हाँ।

कानून किसी मुस्लिम, सिख, ईसाई या अन्य सांस्कृतिक संगठन को भी वही अधिकार देता है जो किसी हिंदू संगठन को देता है।

लेकिन व्यवहारिक स्तर पर स्थिति अलग है। भारत के अधिकांश बड़े मुस्लिम, सिख और ईसाई संगठन ट्रस्ट, सोसाइटी या किसी अन्य पंजीकृत ढाँचे में कार्य करते हैं। शायद ही कोई अन्य संगठन ऐसा हो जो संघ जैसी व्यापक संरचना रखते हुए केंद्रीय स्तर पर अपंजीकृत हो।

यही कारण है कि यह बहस केवल कानूनी नहीं, बल्कि संस्थागत नैतिकता का प्रश्न बन जाती है।

कानून और नैतिकता में अंतर

संघ समर्थकों का सबसे मजबूत तर्क यह है कि कानून उन्हें पंजीकरण के लिए बाध्य नहीं करता।

यह तर्क विधिक रूप से सही हो सकता है।

लेकिन लोकतांत्रिक समाज केवल कानून पर नहीं चलते। वे नैतिक उदाहरणों, संस्थागत परंपराओं और सार्वजनिक विश्वास पर भी चलते हैं।

कई बार जो कार्य कानूनी रूप से वैध होता है, वह सार्वजनिक जवाबदेही की कसौटी पर पर्याप्त नहीं माना जाता।

उदाहरण के लिए कोई राजनीतिक दल कानून के न्यूनतम मानकों का पालन कर सकता है, लेकिन फिर भी स्वैच्छिक रूप से अपने चंदे और व्यय का अधिक विवरण प्रकाशित कर सकता है। ऐसा करने से उसकी विश्वसनीयता बढ़ती है।

यही तर्क संघ पर भी लागू किया जा सकता है।

क्या संघ को पहल करनी चाहिए?

मेरे विचार से आज बहस का केंद्र यह नहीं होना चाहिए कि अदालत ने 1994 में क्या कहा था या 1978 में सीबीडीटी ने कौन-सा पत्र जारी किया था।

असल प्रश्न यह है कि 2026 के भारत में लोकतांत्रिक जवाबदेही का मानक क्या होना चाहिए।

यदि कोई संगठन स्वयं को राष्ट्रभक्ति, चरित्र निर्माण और सार्वजनिक जीवन की नैतिकता का प्रतीक मानता है, तो उससे अपेक्षा की जा सकती है कि वह पारदर्शिता के उच्चतम मानक स्थापित करे।

यह अपेक्षा केवल संघ से नहीं, बल्कि सभी बड़े धार्मिक, सामाजिक, वैचारिक और राजनीतिक संगठनों से समान रूप से होनी चाहिए।

आरएसएस का अपंजीकृत रहना वर्तमान भारतीय कानून के अंतर्गत संभवतः वैध है। पटना हाईकोर्ट का निर्णय और उसके पीछे की कर-विधिक व्याख्याएँ इस स्थिति को कुछ हद तक समर्थन प्रदान करती हैं।

लेकिन वैधता और औचित्य समानार्थी नहीं हैं।

आज जब भारत विदेशी प्रभाव, वैचारिक ध्रुवीकरण, अपारदर्शी वित्तपोषण और सूचना-युद्ध जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब यह प्रश्न पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है कि क्या अत्यंत प्रभावशाली संगठनों को केवल कानूनी न्यूनतम मानकों तक सीमित रहना चाहिए, या उन्हें स्वेच्छा से अधिक पारदर्शिता अपनानी चाहिए।

यदि संघ स्वयं को राष्ट्रहित का संगठन मानता है, तो उसके लिए सबसे सशक्त उत्तर अदालतों के पुराने फैसले नहीं, बल्कि सार्वजनिक रूप से उपलब्ध वित्तीय पारदर्शिता, संस्थागत जवाबदेही और स्वैच्छिक पंजीकरण की पहल हो सकती है। ऐसा कदम न केवल संघ की विश्वसनीयता बढ़ाएगा, बल्कि उन संगठनों के लिए भी एक आदर्श स्थापित करेगा जो भविष्य में राष्ट्रहित के नाम पर अपारदर्शी संरचनाएँ खड़ी करने का प्रयास कर सकते हैं।

यही वह बिंदु है जहाँ कानून समाप्त होता है और नैतिक नेतृत्व प्रारंभ होता है।

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