दो तिहाई बहुमत जुटाने की कवायद -इरादे क्या हैं

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि उसने केवल संविधान की लिखित धाराओं के सहारे नहीं, बल्कि संवैधानिक परंपराओं, राजनीतिक मर्यादाओं और संस्थागत आत्मसंयम के आधार पर भी अपनी यात्रा तय की है। संविधान निर्माताओं ने स्वयं यह स्वीकार किया था कि किसी भी संविधान में शासन और राजनीति के हर संभावित विवाद का समाधान शब्दशः नहीं लिखा जा सकता। इसलिए संविधान के अक्षर के साथ-साथ उसकी आत्मा, उसकी मंशा और उसके मूल उद्देश्यों को भी समझना आवश्यक होगा।

यही कारण है कि भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में समय-समय पर यह बहस उठती रही है कि क्या केवल कानून की शब्दावली का पालन कर लेना पर्याप्त है, या फिर उस व्यापक लोकतांत्रिक भावना का भी सम्मान किया जाना चाहिए जिसके लिए संविधान बनाया गया था।

आज यह प्रश्न पहले से अधिक प्रासंगिक दिखाई देता है। राज्यपालों द्वारा विधेयकों को लंबे समय तक लंबित रखने की प्रवृत्ति, दिल्ली सरकार और केंद्र के बीच अधिकारों का संघर्ष, चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव, संसद की संशोधन शक्तियों की सीमा पर विवाद, तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे प्रभावशाली संगठन की जवाबदेही और पारदर्शिता को लेकर उठते प्रश्न—ये सभी घटनाएं मिलकर एक व्यापक संवैधानिक विमर्श को जन्म देती हैं।

यह विमर्श केवल किसी एक दल, सरकार या संगठन का नहीं है। यह भारतीय लोकतंत्र की दिशा और भविष्य से जुड़ा प्रश्न है।

संविधान केवल कानून की किताब नहीं है

भारतीय संविधान दुनिया का सबसे विस्तृत लिखित संविधान माना जाता है। इसके बावजूद संविधान निर्माताओं ने यह कभी दावा नहीं किया कि उन्होंने हर स्थिति के लिए अंतिम उत्तर लिख दिया है।

संविधान सभा की बहसों में बार-बार यह बात सामने आई कि लोकतंत्र का संचालन केवल कानूनी प्रावधानों से नहीं बल्कि संवैधानिक नैतिकता से होगा।

संवैधानिक नैतिकता का अर्थ है—

सत्ता का संयमित प्रयोग,

संस्थाओं का सम्मान,

विपक्ष के अधिकारों की रक्षा,

और लोकतांत्रिक भावना के अनुरूप आचरण।

यदि कोई पक्ष संविधान की भाषा का तकनीकी पालन करते हुए भी उसकी मूल भावना को कमजोर करता है, तो संवैधानिक संकट की शुरुआत यहीं से होती है।

बेसिक स्ट्रक्चर : न्यायपालिका का सुरक्षा कवच या लोकतंत्र पर अंकुश?

भारतीय संवैधानिक राजनीति में सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांतों में से एक है “बेसिक स्ट्रक्चर सिद्धांत”।

1973 में केशवानंद भारती मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि संसद संविधान में संशोधन कर सकती है, लेकिन संविधान की मूल संरचना को नष्ट नहीं कर सकती।

लोकतंत्र, संघवाद, न्यायिक समीक्षा, चुनावों की निष्पक्षता, विधि का शासन और मौलिक अधिकार जैसी अवधारणाओं को इस मूल संरचना का हिस्सा माना गया।

वर्ष 2022-23 में तत्कालीन कानून मंत्री किरण रिजिजू और उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने इस सिद्धांत पर गंभीर प्रश्न उठाए। उनका तर्क था कि निर्वाचित संसद की सर्वोच्चता को न्यायपालिका सीमित नहीं कर सकती।

यह तर्क नया नहीं था। आपातकाल के दौर में भी ऐसी सोच सामने आई थी।

लेकिन इसके विरोध में अनेक संवैधानिक विशेषज्ञों ने कहा कि भारत में संसद सर्वोच्च नहीं है, संविधान सर्वोच्च है। संसद स्वयं संविधान की रचना है, इसलिए वह संविधान के मूल ढांचे को नष्ट नहीं कर सकती।

यह विवाद केवल कानूनी नहीं था। इसके पीछे यह प्रश्न छिपा था कि यदि किसी सरकार को भविष्य में लोकसभा और राज्यसभा दोनों में तीन-चौथाई बहुमत मिल जाए तो क्या वह संविधान की मूल प्रकृति को बदल सकती है?

यही वह आशंका है जिसने बेसिक स्ट्रक्चर सिद्धांत को भारतीय लोकतंत्र का सुरक्षा कवच बना दिया।

EWS आरक्षण और बदलती न्यायिक व्याख्याएँ

आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) के लिए आरक्षण का मामला भी इस बहस को नया आयाम देता है।

1992 के इंद्रा साहनी फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि केवल आर्थिक आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता।

लेकिन 103वें संविधान संशोधन और बाद के न्यायिक निर्णयों ने इस स्थिति को बदल दिया।

यह घटना बताती है कि न्यायपालिका की संवैधानिक व्याख्याएं समय के साथ बदल सकती हैं।

इसीलिए कुछ लोग यह प्रश्न उठाते हैं कि यदि एक संवैधानिक सिद्धांत की व्याख्या बदल सकती है, तो क्या भविष्य में बेसिक स्ट्रक्चर सिद्धांत भी बदल सकता है?

यद्यपि वर्तमान स्थिति में ऐसा प्रतीत नहीं होता, लेकिन यह प्रश्न लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा बन चुका है।

राज्यपाल : संवैधानिक संरक्षक या राजनीतिक अवरोध?

पिछले कुछ वर्षों में राज्यपालों की भूमिका को लेकर विवाद अभूतपूर्व स्तर पर पहुंचा है।

तमिलनाडु, केरल, पंजाब और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में राज्यपालों द्वारा विधेयकों को लंबे समय तक लंबित रखने की घटनाओं ने गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं।

संविधान राज्यपाल को यह अधिकार देता है कि वे कुछ परिस्थितियों में विधेयकों पर विचार करें या उन्हें राष्ट्रपति के पास भेजें।

लेकिन क्या उन्हें अनिश्चितकाल तक रोक सकते हैं?

संविधान इस बारे में स्पष्ट नहीं है।

यहीं से “संविधान की आत्मा” का प्रश्न उठता है।

यदि निर्वाचित विधानसभा किसी विधेयक को पारित कर दे और राज्यपाल उसे वर्षों तक लंबित रखें, तो क्या यह लोकतांत्रिक जनादेश का सम्मान है?

सर्वोच्च न्यायालय ने भी कई अवसरों पर संकेत दिया है कि राज्यपालों को “पॉकेट वीटो” जैसी स्थिति नहीं बनानी चाहिए।

यह विवाद दिखाता है कि संविधान की चुप्पी का उपयोग किस प्रकार राजनीतिक संघर्ष के उपकरण के रूप में किया जा सकता है।

दिल्ली मॉडल : लोकतंत्र बनाम प्रशासनिक नियंत्रण

दिल्ली में केंद्र और निर्वाचित सरकार के बीच अधिकारों का संघर्ष भी इसी प्रकार का उदाहरण है।

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि लोकतंत्र का अर्थ है कि जनता द्वारा चुनी गई सरकार के पास प्रशासनिक नियंत्रण होना चाहिए।

लेकिन इसके बाद केंद्र ने कानून बनाकर सेवाओं और तबादलों पर अपना प्रभाव बढ़ा लिया।

आलोचकों का कहना है कि यदि अफसरशाही निर्वाचित सरकार के प्रति जवाबदेह न हो तो लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व कमजोर पड़ जाता है।

दूसरी ओर सरकार का तर्क है कि दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी है और इसलिए उसकी स्थिति अन्य राज्यों से भिन्न है।

यह विवाद बताता है कि संविधान की व्याख्या केवल कानूनी नहीं बल्कि राजनीतिक प्रश्न भी बन जाती है।

चुनाव आयोग की नियुक्ति : स्वतंत्रता या नियंत्रण?

चुनाव आयोग भारतीय लोकतंत्र की रीढ़ माना जाता है।

सर्वोच्च न्यायालय ने 2023 में अंतरिम व्यवस्था के तहत मुख्य न्यायाधीश को चयन समिति में शामिल किया था।

लेकिन बाद में संसद द्वारा बनाए गए कानून में मुख्य न्यायाधीश को हटाकर एक केंद्रीय मंत्री को शामिल कर दिया गया।

सरकार का तर्क था कि संविधान संसद को ऐसी व्यवस्था बनाने का अधिकार देता है।

विरोधियों का तर्क था कि इससे चयन प्रक्रिया में कार्यपालिका का प्रभाव बढ़ जाता है।

यहां मूल प्रश्न यह नहीं है कि कानून वैध है या अवैध।

प्रश्न यह है कि क्या चुनाव आयोग जैसी संस्था की स्वतंत्रता संविधान की उस मंशा का हिस्सा है जो लोकतंत्र की निष्पक्षता सुनिश्चित करती है।

RSS और जवाबदेही का प्रश्न

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारतीय सार्वजनिक जीवन का अत्यंत प्रभावशाली संगठन है।

उसके स्वयंसेवक राजनीति, शिक्षा, सामाजिक कार्य, श्रमिक संगठनों, छात्र संगठनों और अनेक सार्वजनिक क्षेत्रों में सक्रिय हैं।

यहीं से एक प्रश्न उठता है।

यदि कोई संगठन समाज और शासन के लगभग हर क्षेत्र को प्रभावित करने की क्षमता रखता है, तो क्या उसे अधिक पारदर्शिता और संस्थागत जवाबदेही नहीं दिखानी चाहिए?

संघ के समर्थक कहते हैं कि संविधान नागरिकों को संगठन बनाने की स्वतंत्रता देता है और पंजीकरण हर संगठन के लिए अनिवार्य नहीं है।

आलोचक कहते हैं कि प्रभाव जितना व्यापक होगा, जवाबदेही भी उतनी ही व्यापक होनी चाहिए।

यह विवाद कानूनी से अधिक लोकतांत्रिक नैतिकता का प्रश्न है।

संवैधानिक हार्डबॉल : लोकतंत्र का नया संकट

राजनीतिक विज्ञान में एक शब्द प्रचलित हुआ है—Constitutional Hardball।

इसका अर्थ है—

नियमों को तोड़े बिना उनकी ऐसी व्याख्या करना जिससे सत्ता का अधिकतम लाभ प्राप्त हो।

आज भारतीय राजनीति के अनेक विवाद इसी श्रेणी में रखे जा सकते हैं।

राज्यपाल बिल नहीं रोकते, केवल लंबित रखते हैं।

नियुक्ति प्रक्रियाएं बदली जाती हैं लेकिन संवैधानिक भाषा का पालन किया जाता है।

संस्थागत नियंत्रण बढ़ाया जाता है लेकिन कानूनी औचित्य प्रस्तुत कर दिया जाता है।

तकनीकी रूप से सब कुछ वैध दिखाई देता है।

लेकिन प्रश्न उठता है कि क्या यह संविधान की भावना के अनुरूप है?

तीन-चौथाई बहुमत और लोकतांत्रिक आशंकाएं

यदि भविष्य में किसी सरकार को अत्यधिक बहुमत प्राप्त हो जाए तो चिंताएं और बढ़ सकती हैं।

ऐसी स्थिति में:

संसद पर कार्यपालिका का प्रभाव बढ़ सकता है,

संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता घट सकती है,

संघीय ढांचे पर दबाव बढ़ सकता है,

न्यायपालिका के साथ टकराव बढ़ सकता है।

यही कारण है कि आधुनिक लोकतंत्र केवल चुनावी बहुमत पर नहीं बल्कि संस्थागत संतुलन पर आधारित होते हैं।

बहुमत लोकतंत्र का आवश्यक तत्व है, लेकिन पर्याप्त तत्व नहीं।

समाधान क्या है?

समाधान केवल न्यायपालिका नहीं दे सकती।

समाधान केवल संसद भी नहीं दे सकती।

समाधान तीन स्तरों पर खोजना होगा।

पहला : संवैधानिक परंपराओं को मजबूत करना

हर चीज कानून में नहीं लिखी जा सकती।

राजनीतिक दलों को ऐसी परंपराओं का सम्मान करना होगा जो लोकतंत्र को जीवित रखती हैं।

दूसरा : संस्थागत सुधार

राज्यपालों के लिए समय-सीमा,

नियुक्ति प्रक्रियाओं में बहुदलीय भागीदारी,

संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता,

जैसे सुधार आवश्यक हैं।

तीसरा : संवैधानिक नैतिकता

लोकतंत्र केवल इस प्रश्न पर नहीं टिकता कि “क्या यह कानूनी है?”

लोकतंत्र यह भी पूछता है—

“क्या यह उचित है?”

“क्या यह सत्ता के संतुलन का सम्मान करता है?”

“क्या इससे जनता की प्रतिनिधिक इच्छा सुरक्षित रहती है?”

निष्कर्ष : भारत के सामने वास्तविक चुनौती

भारतीय लोकतंत्र के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती संविधान बदलने की नहीं, बल्कि संविधान की भावना को सुरक्षित रखने की है।

संविधान की धाराएँ जितनी महत्वपूर्ण हैं, उतना ही महत्वपूर्ण उनका उद्देश्य भी है।

यदि सत्ता पक्ष हर अवसर पर कानून की अधिकतम अनुकूल व्याख्या करेगा और विपक्ष हर निर्णय को अलोकतांत्रिक बताएगा, तो संस्थाओं में विश्वास कमजोर होगा।

लोकतंत्र का वास्तविक परीक्षण तब होता है जब किसी पक्ष के पास शक्ति हो और वह स्वेच्छा से अपने ऊपर सीमाएँ स्वीकार करे।

भारतीय संविधान की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं है कि उसने सत्ता दी, बल्कि यह है कि उसने सत्ता पर नियंत्रण की व्यवस्था भी बनाई।

आज आवश्यकता इस बात की है कि संविधान को केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि एक लोकतांत्रिक अनुबंध के रूप में देखा जाए—ऐसा अनुबंध जिसमें बहुमत शासन करता है, लेकिन संस्थाएं, अधिकार और संवैधानिक मर्यादाएं उसे निरंकुश बनने से रोकती हैं।

यही भारतीय लोकतंत्र की आत्मा है। यही उसकी स्थिरता का आधार है। और यही वह कसौटी है जिस पर वर्तमान और भविष्य की हर सरकार, हर संस्था और हर प्रभावशाली संगठन को परखा जाएगा।

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