
भारतीय परंपरा में मंfcदिर केवल पूजा-अर्चना के स्थान नहीं थे। वे समाज के नैतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक केंद्र माने जाते थे। मंदिरों की भूमिका मनुष्य को केवल ईश्वर से जोड़ने तक सीमित नहीं थी, बल्कि उसे लोभ, मोह, अहंकार और स्वार्थ से ऊपर उठाकर एक बेहतर मनुष्य बनाने की भी थी। मंदिर समाज को यह सिखाने के लिए थे कि धन जीवन का साधन है, साध्य नहीं; कि मनुष्य का मूल्य उसके संग्रह में नहीं, बल्कि उसके सदाचार में है; और कि धर्म का वास्तविक अर्थ कर्मकांड नहीं, बल्कि लोकमंगल है।
इसी कारण प्राचीन भारतीय समाज मंदिरों और धार्मिक संस्थाओं के संचालन का दायित्व उन लोगों को सौंपता था जिनसे सादगी, संयम, त्याग और आत्मानुशासन की अपेक्षा की जाती थी। ब्राह्मण शब्द का मूल अर्थ भी किसी जाति विशेष का सदस्य नहीं था, बल्कि वह एक ऐसी बौद्धिक और नैतिक परंपरा का प्रतीक था जिसके कंधों पर समाज की नैतिक चेतना टिकी रहती थी। ब्राह्मणत्व एक साधना था, जन्म से प्राप्त विशेषाधिकार नहीं। उसका आधार ज्ञान, तप, त्याग और चरित्र था।
किन्तु समय के साथ एक गंभीर विचलन उत्पन्न हुआ। ब्राह्मणत्व को एक जीवंत नैतिक परंपरा के स्थान पर जन्म आधारित पहचान के रूप में देखने की प्रवृत्ति बढ़ी। परिणाम यह हुआ कि समाज ने यह पूछना लगभग बंद कर दिया कि मंदिर का संचालन करने वाला व्यक्ति व्यक्तिगत जीवन में कितना संयमी, कितना उदार, कितना निष्काम और कितना चरित्रवान है। उसकी पात्रता का आधार उसके गुणों और आचरण की बजाय उसका जन्म बनता गया।
यहीं से समस्या आरम्भ हुई। जब किसी संस्था की आत्मा उसके मूल आदर्शों से कट जाती है तो उसका बाहरी ढांचा भले बचा रहे, उसका उद्देश्य धीरे-धीरे बदलने लगता है। अनेक स्थानों पर मंदिर नैतिक अनुशासन और सामाजिक सेवा के केंद्र बनने के बजाय कर्मकांड, प्रतिष्ठा, वैभव और आर्थिक गतिविधियों के केंद्र बनते चले गए। यह कहना अतिशयोक्ति होगा कि सभी मंदिर ऐसे हो गए हैं, क्योंकि आज भी अनेक धार्मिक संस्थाएं सेवा के उत्कृष्ट कार्य कर रही हैं, लेकिन यह प्रश्न अवश्य उठता है कि क्या धर्मस्थलों की सामूहिक दिशा उस आदर्श के अनुरूप है जिसकी कल्पना भारतीय परंपरा ने की थी?
धर्म का उद्देश्य मनुष्य के भीतर सेवा और दान की भावना को जागृत करना है। संसार के लगभग सभी धर्म इस बात पर जोर देते हैं कि समाज के कमजोर, वंचित और पीड़ित वर्गों की सहायता की जाए। जब हम इस कसौटी पर विभिन्न धार्मिक परंपराओं को देखते हैं तो कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आते हैं।
भारत के अनेक गरीब और वंचित क्षेत्रों में ईसाई मिशनरियों ने शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का व्यापक नेटवर्क खड़ा किया है। दूरदराज के आदिवासी क्षेत्रों, पहाड़ी इलाकों और पिछड़े गांवों में अनेक मिशनरी स्कूल, अस्पताल और सेवा केंद्र दशकों से कार्य कर रहे हैं। यह भी एक तथ्य है कि इन सेवाओं से प्रभावित होकर कुछ लोग ईसाई धर्म स्वीकार कर लेते हैं। इस पर केवल आलोचना करना या इसे षड्यंत्र कहकर खारिज कर देना पर्याप्त नहीं है। अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जिन लोगों तक ये सेवाएं पहुंच रही हैं, वे पहले उपेक्षित क्यों थे?
यदि कोई संस्था भूखे को भोजन देती है, बीमार को चिकित्सा देती है, अनपढ़ को शिक्षा देती है और असहाय को सहारा देती है, तो स्वाभाविक है कि उसके प्रति लोगों के मन में सम्मान उत्पन्न होगा। इसलिए धर्मांतरण के प्रश्न पर केवल शिकायत करने के बजाय आत्ममंथन की आवश्यकता है। यदि हिंदू समाज के धार्मिक नेतृत्व को इस स्थिति पर चिंता है तो उसे प्रतिस्पर्धा विरोध की नहीं, सेवा की करनी चाहिए। उसे ऐसी बड़ी लकीर खींचनी चाहिए कि समाज सेवा, शिक्षा, स्वास्थ्य और मानव कल्याण के क्षेत्र में वह दूसरों से आगे दिखाई दे।
इसके लिए सबसे पहली आवश्यकता त्याग की भावना है। सेवा का कार्य केवल उपदेशों से नहीं चलता, उसके लिए समर्पित जीवन चाहिए। ईसाई मिशनरियों के उदाहरण को देखें। अनेक पादरी और नन अपने देश, परिवार और सुविधाजनक जीवन को छोड़कर हजारों किलोमीटर दूर ऐसे क्षेत्रों में काम करने पहुंचते हैं जहां न रहने की सुविधाएं होती हैं, न अच्छा भोजन और न आधुनिक जीवन की सुख-सुविधाएं। फिर भी वे दशकों तक वहीं रहते हैं और अपना जीवन उस कार्य में लगा देते हैं जिसे वे अपना धार्मिक दायित्व मानते हैं।
प्रश्न यह नहीं है कि उनकी विचारधारा से कौन सहमत है और कौन असहमत। प्रश्न यह है कि क्या हम उनके समर्पण, अनुशासन और सेवा-भावना से कुछ सीख सकते हैं? धर्म की शक्ति केवल उसके सिद्धांतों में नहीं, बल्कि उन लोगों के जीवन में दिखाई देती है जो उन सिद्धांतों के लिए अपना सर्वस्व अर्पित करने को तैयार होते हैं।
यदि प्रेरणा की आवश्यकता हो तो दूर जाने की भी जरूरत नहीं है। सिख परंपरा हमारे सामने एक अत्यंत प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत करती है। गुरुद्वारों में सेवा केवल गरीबों का काम नहीं होती और न ही वह किसी विशेष वर्ग तक सीमित रहती है। वहां करोड़पति और अरबपति श्रद्धालु भी बर्तन मांजते हुए, जूते संभालते हुए और लंगर में भोजन परोसते हुए दिखाई देते हैं। वे इसे अपमान नहीं, बल्कि गौरव समझते हैं।
यह दृश्य केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं है। यह मनुष्य के अहंकार को तोड़ने और सेवा को सम्मान देने का सांस्कृतिक प्रशिक्षण है। यह बताता है कि धर्म का उद्देश्य व्यक्ति को ऊंचा दिखाना नहीं, बल्कि उसे विनम्र बनाना है। प्रश्न यह है कि क्या हमारे धर्मस्थल भी लोगों के भीतर ऐसी ही विनम्रता और सेवा-भावना पैदा कर रहे हैं?
धर्मस्थल किसी जाति विशेष को रोजगार देने के केंद्र नहीं होने चाहिए। वे किसी समुदाय के वैभव प्रदर्शन के मंच भी नहीं होने चाहिए। उनका उद्देश्य सदाचार, सादगी, सेवा और सामाजिक उत्तरदायित्व के संस्कार विकसित करना होना चाहिए। यदि किसी धर्मस्थल का संचालन इस प्रकार हो रहा है कि वहां से समाज में करुणा, सेवा और नैतिकता का प्रसार हो रहा है, तभी वह अपने वास्तविक उद्देश्य को पूरा कर रहा है।
इस संदर्भ में गौतम बुद्ध के विचार अत्यंत प्रासंगिक हैं। बुद्ध ने कभी धन कमाने को पाप नहीं कहा। उन्होंने यह भी नहीं कहा कि मनुष्य को गरीबी में ही जीना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि इच्छा स्वाभाविक है। बेहतर जीवन, समृद्धि और सुख की आकांक्षा मानव प्रकृति का हिस्सा है। समस्या इच्छा में नहीं, बल्कि आसक्ति में है।
इच्छा मनुष्य को आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है, जबकि आसक्ति उसे नैतिक सीमाएं तोड़ने के लिए प्रेरित करती है। जब धन कमाने की इच्छा आसक्ति में बदल जाती है, तब व्यापारी मुनाफे के लिए मिलावट करने लगता है, चाहे उससे लोगों का स्वास्थ्य नष्ट हो जाए। तब डॉक्टर सेवा की भावना भूलकर मरीज को केवल आय का स्रोत समझने लगता है। तब सत्ता सेवा का माध्यम न रहकर निजी लाभ का साधन बन जाती है।
लालच की यही मानसिकता समाज में भ्रष्टाचार, शोषण और अपराध को जन्म देती है। धर्म का उद्देश्य मनुष्य को इसी मानसिकता से बचाना है। इसलिए प्रश्न उठता है कि क्या हमारे मंदिरों और धार्मिक मंचों पर इस विषय पर पर्याप्त चर्चा होती है? क्या वहां लोगों को यह सिखाया जाता है कि धन कमाना गलत नहीं, लेकिन धन का दास बन जाना विनाशकारी है? क्या वहां यह बताया जाता है कि ईश्वर को प्रसन्न करने का सर्वोत्तम मार्ग मनुष्य की सेवा है?
यदि धर्मस्थल वास्तव में आत्मचिंतन के केंद्र बनें तो वे समाज को यह भी सिखाएंगे कि ईश्वर को धन का भूखा मानना स्वयं धर्म का अपमान है। तब स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न भी उठेगा कि मंदिरों में आने वाला विशाल चढ़ावा किस उद्देश्य के लिए है।
यदि उस धन का उपयोग विद्यालय बनाने, अस्पताल चलाने, निर्धनों के विवाह में सहायता करने, अनाथ बच्चों के पालन-पोषण, भूखों को भोजन उपलब्ध कराने और जरूरतमंदों को कपड़े तथा आश्रय देने में हो रहा है, तो उसका नैतिक औचित्य स्पष्ट है। लेकिन यदि चढ़ावे का बड़ा हिस्सा केवल संस्थागत वैभव बढ़ाने, सुविधाओं का विस्तार करने या सीमित लोगों के हितों की पूर्ति में खर्च हो रहा है, तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
बुद्ध ने दान को भी अत्यंत महत्वपूर्ण बताया था, लेकिन उन्होंने दान को लेन-देन नहीं माना। उनके अनुसार दान का पुण्य तभी है जब वह प्रतिफल की इच्छा से मुक्त हो। यदि दान इस अपेक्षा से दिया जाए कि उसके बदले में कोई चमत्कार होगा, व्यापार में लाभ होगा या व्यक्तिगत लाभ प्राप्त होगा, तो वह आध्यात्मिक अर्थों में दान नहीं रह जाता, बल्कि एक प्रकार का सौदा बन जाता है।
दान का आधार करुणा होना चाहिए, लालच नहीं। वह किसी जाति, समुदाय या वर्ग विशेष के पोषण का माध्यम नहीं बनना चाहिए। उसका उद्देश्य उस व्यक्ति तक सहायता पहुंचाना होना चाहिए जिसे उसकी वास्तविक आवश्यकता है। धर्म की दृष्टि में पीड़ा का कोई जातिगत वर्गीकरण नहीं होता।
इसी प्रकार धार्मिक नेतृत्व के चयन पर भी पुनर्विचार की आवश्यकता है। चाहे वह मंदिर का महंत हो, पुजारी हो, कथा-वाचक हो या किसी धार्मिक संस्था का संचालक—उसकी पात्रता केवल वंश या परंपरा से नहीं तय होनी चाहिए। उसके जीवन को भी उसी कसौटी पर परखा जाना चाहिए जिस कसौटी पर प्राचीन काल में आदर्श धार्मिक व्यक्तित्वों को परखा जाता था।
समाज को यह देखने का अधिकार है कि जो व्यक्ति धर्म का प्रतिनिधित्व कर रहा है, उसका व्यक्तिगत जीवन कितना सादा है, वह कितना निष्काम है, समाज सेवा में उसकी क्या भूमिका है और उसका आचरण उसके उपदेशों के अनुरूप है या नहीं। धर्म की विश्वसनीयता केवल ग्रंथों से नहीं, बल्कि उसके प्रतिनिधियों के चरित्र से बनती है।
हाल के वर्षों में विभिन्न धार्मिक संस्थानों से जुड़ी वित्तीय अनियमितताओं और चढ़ावे में कथित गड़बड़ियों की खबरें समय-समय पर सामने आती रही हैं। जब किसी बड़े मंदिर से जुड़ी ऐसी घटनाएं चर्चा में आती हैं तो उससे केवल संस्था की प्रतिष्ठा को आघात नहीं पहुंचता, बल्कि धर्म की नैतिक छवि भी प्रभावित होती है। इसलिए पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और सार्वजनिक निगरानी की व्यवस्था को मजबूत करना आवश्यक है।
धर्म का भविष्य भव्य भवनों में नहीं, बल्कि नैतिक विश्वसनीयता में सुरक्षित है। मंदिरों की ऊंची शिखरियां तभी सार्थक हैं जब उनके नीचे करुणा, सेवा, त्याग और सत्यनिष्ठा की मजबूत नींव हो। यदि धर्मस्थल समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति के जीवन में आशा का प्रकाश नहीं पहुंचा पा रहे, तो उन्हें अपने उद्देश्य पर पुनर्विचार करना होगा।
आज आवश्यकता किसी पर आरोप लगाने की नहीं, बल्कि उस मूल भावना की ओर लौटने की है जिसने भारतीय धार्मिक परंपरा को महान बनाया था। दधीचि का त्याग, बुद्ध की करुणा, गुरु परंपरा की सेवा और संतों की सादगी—यही वे आदर्श हैं जिनसे धर्म की आत्मा निर्मित होती है। यदि मंदिर फिर से नैतिक अनुशासन, सामाजिक सेवा और आत्मिक विकास के केंद्र बन सकें, तो वे केवल पूजा स्थल नहीं रहेंगे, बल्कि समाज के पुनर्निर्माण के सबसे शक्तिशाली माध्यम बन सकते हैं।
धर्म की वास्तविक विजय तब होगी जब उसके द्वार से निकलने वाला व्यक्ति अधिक विनम्र, अधिक ईमानदार, अधिक करुणामय और अधिक उत्तरदायी नागरिक बनकर निकले। यही किसी भी धर्मस्थल की सबसे बड़ी सफलता और किसी भी धार्मिक परंपरा की सबसे बड़ी परीक्षा है।





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