मंडल आयोग, प्रतीक-राजनीति और वैचारिक विचलन: चंद्रशेखर की ‘सामाजिक न्याय’ विरोधी राजनीति का एक आलोचनात्मक मूल्यांकन

भारतीय राजनीति में जब भी सामाजिक न्याय, जातीय मुक्ति और हाशियाकृत तबकों की सत्ता-भागीदारी का प्रश्न उठता है, तो डॉ. भीमराव आंबेडकर, डॉ. राम मनोहर लोहिया और विश्वनाथ प्रताप सिंह के नाम एक स्वाभाविक श्रृंखला में सामने आते हैं। इन नामों के समानांतर, भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का स्थान इस पूरे विमर्श में न केवल जटिल है, बल्कि गहरा अंतर्विरोधों से भरा हुआ है। स्वयं को युवा तुर्क (Young Turk) कहने वाले, आजीवन समाजवाद का दम भरने वाले और डॉ. लोहिया की वैचारिक विरासत का उत्तराधिकारी बताने वाले चंद्रशेखर की राजनीति का जब सूक्ष्म परीक्षण किया जाता है—विशेष रूप से मंडल आयोग और पिछड़ों के आरक्षण के संदर्भ में—तो एक तीखा सच उभरता है। यह सच उनके घोषित वैचारिक आचरण और वास्तविक राजनीतिक कर्म के बीच की उस गहरी खाई को उजागर करता है, जिसे ‘सहमति निर्माण’ के लफ्फाजीपूर्ण तर्कों से ढका नहीं जा सकता।

## 1. लोहिया की विरासत बनाम चंद्रशेखर का आचरण: “पिछड़ा पावे सौ में साठ” की उपेक्षा

चंद्रशेखर की राजनीति का मूल्यांकन करने के लिए सबसे पहला पैमाना स्वयं डॉ. राम मनोहर लोहिया की वह वैचारिक जमीन है, जिसका प्रतिनिधित्व करने का दावा चंद्रशेखर हमेशा करते रहे। लोहिया का समाजवाद केवल आर्थिक गैर-बराबरी या कारखानों के राष्ट्रीयकरण तक सीमित नहीं था। लोहिया ने भारतीय समाज की उस कड़वी हकीकत को पहचाना जिसे मार्क्सवादी और पारंपरिक कांग्रेसी नेता अक्सर अनदेखा कर देते थे—वह थी **जाति प्रथा**।

लोहिया ने साफ कहा था कि भारत में जाति ही वर्ग है और जब तक प्रशासनिक, राजनीतिक और सामाजिक सत्ताओं के शीर्ष पर बैठे उच्च वर्ण के एकाधिकार को तोड़ा नहीं जाता, तब तक लोकतंत्र केवल एक छलावा रहेगा। उनका प्रसिद्ध नारा था:

> **”पिछड़ा पावे सौ में साठ, राज-काज और धन-धरती में।”**

यह नारा केवल चुनावी वैतरणी पार करने का कोई तात्कालिक हथकंडा नहीं था, बल्कि यह भारत की प्रशासनिक और नीति-निर्माता संरचनाओं में आमूलचूल बदलाव का एक क्रांतिकारी एजेंडा था। लोहिया के लिए पिछड़ों, दलितों, आदिवासियों और महिलाओं को विशेष अवसर (Special Opportunities) देना भविष्य के किसी अनिश्चित कालखंड पर टाला जाने वाला विषय नहीं, बल्कि एक अनिवार्य, तात्कालिक और गैर-परक्राम्य (Non-negotiable) कार्यक्रम था।

अब सवाल यह उठता है कि क्या चंद्रशेखर के राजनीतिक जीवन में लोहिया के इस सबसे केंद्रीय और प्रखर विचार की वैसी ही तीव्रता दिखाई देती है?

जब हम 1970 और 1980 के दशकों के चंद्रशेखर के राजनीतिक इतिहास को खंगालते हैं, तो हमें समाजवाद, किसानों की दुर्दशा, पूंजीवाद के विरोध और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा पर तो उनके बड़े-बड़े व्याख्यान मिलते हैं, परंतु ‘जाति-उन्मूलन’ और ‘पिछड़ों को आरक्षण’ जैसे बुनियादी मुद्दों पर उनकी वैचारिक प्रखरता पूरी तरह गायब दिखती है। वे वर्ग-संघर्ष और आर्थिक असमानता की बात तो प्राथमिकता से करते रहे, लेकिन जाति आधारित वंचना और उसके निदान के लिए किसी ठोस नीतिगत हस्तक्षेप पर मौन साधे रहे। यह विचलन यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि चंद्रशेखर ने लोहिया की समाजवादी शैली को तो अपनाया, लेकिन लोहिया के सामाजिक न्याय के उस कोर (Core) एजेंडे को छोड़ दिया जो ऊंची जातियों के वर्चस्व को चुनौती देता था।

## 2. जनता पार्टी का दौर और मंडल आयोग का गठन: दस वर्षों का लंबा मौन

वर्ष 1977 में आपातकाल के बाद जब देश में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी, तो जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में चंद्रशेखर का कद किसी भी शीर्ष पदधारी नेता से कम नहीं था। वे पार्टी के सबसे प्रभावशाली नीति-निर्माताओं में से एक थे। जनता पार्टी ने अपने चुनावी वादे के मुताबिक पिछड़े वर्गों की पहचान और उनके उत्थान के लिए उपाय सुझाने हेतु **1 जनवरी 1979 को बी.पी. मंडल की अध्यक्षता में दूसरे पिछड़ा वर्ग आयोग (मंडल आयोग) का गठन किया।**

यहाँ चंद्रशेखर की राजनीति पर पहला गंभीर प्रश्नचिह्न लगता है:

* **अध्यक्षीय दायित्व की सीमा क्या थी?** यदि जनता पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष सामाजिक न्याय और लोहियाई सिद्धांतों के प्रति रत्ती भर भी प्रतिबद्ध था, तो क्या उसका काम केवल एक आयोग का गठन करवाकर कागजी औपचारिकता पूरी कर लेना था?

* **वैचारिक माहौल बनाने में विफलता:** किसी भी बड़े सामाजिक सुधार को लागू करने के लिए समाज में एक वैचारिक जमीन तैयार करनी पड़ती है। एक राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष के रूप में चंद्रशेखर ने देश के पिछड़े और वंचित तबकों के बीच जाकर इस आयोग के महत्व और उसकी आवश्यकता पर कोई व्यापक संवाद क्यों नहीं शुरू किया?

इससे भी अधिक निराशाजनक दौर 1980 के बाद का है। मंडल आयोग ने **31 दिसंबर 1980** को अपनी ऐतिहासिक रिपोर्ट तत्कालीन सरकार को सौंप दी, जिसमें अन्य पिछड़े वर्गों (OBC) के लिए सरकारी नौकरियों में 27% आरक्षण की स्पष्ट सिफारिश की गई थी। इसके बाद अगले दस सालों (1980-1990) तक यह रिपोर्ट केंद्रीय सचिवालय की धूल खाती फाइलों में दबी रही।

इस दशक भर के लंबे कालखंड में चंद्रशेखर भारतीय राजनीति के एक चमकते हुए सूर्य की तरह मौजूद थे। वे विपक्ष के सबसे मुखर चेहरों में से एक थे। उन्होंने 1983 में कन्याकुमारी से राजघाट तक लगभग 4,260 किलोमीटर की ऐतिहासिक **’भारत यात्रा’** की। इस यात्रा के दौरान उन्होंने जनता की नब्ज टटोली, गरीबी, कुपोषण और सामाजिक विषमताओं पर विस्तार से बात की। लेकिन यह बेहद चौंकाने वाला और दुखद तथ्य है कि इस पूरी यात्रा और उनके तत्कालीन भाषणों में मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की मांग कभी भी उनके एजेंडे का केंद्रीय बिंदु नहीं बनी।

> **सवाल सीधा है:** जो नेता देश को बदलने के लिए पैदल चल सकता था, जिसने समाज के हर तबके से संवाद किया, उसने पिछड़े वर्गों के इस सबसे बड़े नीतिगत अधिकार (मंडल रिपोर्ट) को लेकर कोई देशव्यापी आंदोलन क्यों नहीं खड़ा किया?

उपलब्ध सार्वजनिक अभिलेख, संसदीय बहसें और उनके द्वारा लिखे गए लेख यह कहीं नहीं दर्शाते कि वे पिछड़े वर्गों के आरक्षण के पक्ष में सामाजिक सहमति बनाने या कांग्रेस सरकार पर इसे लागू करने का दबाव बनाने के किसी संगठित प्रयास का नेतृत्व कर रहे थे। यह लंबा मौन यह साफ करता है कि मंडल का मुद्दा उनके राजनीतिक प्राथमिकताओं के नक्शे में कहीं बहुत नीचे, लगभग अदृश्य था।

## 3. 1989 का घोषणा-पत्र और 1990 का यू-टर्न: ‘सहमति’ की आड़ में अवरोध

साल 1989 में जब कांग्रेस के खिलाफ विपक्ष एकजुट हुआ और **जनता दल** का गठन हुआ, तो party ने अपने चुनावी घोषणा-पत्र (Manifesto) में मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने का एक अत्यंत स्पष्ट और ठोस वादा शामिल किया। चंद्रशेखर इस नई बनी पार्टी के भी शीर्ष मार्गदर्शकों और नेताओं में शामिल थे।

ऐतिहासिक साक्ष्य बताते हैं कि जब यह घोषणा-पत्र तैयार हो रहा था या जब इसे जनता के बीच ले जाया जा रहा था, तब चंद्रशेखर ने इसके किसी भी बिंदु पर कोई सार्वजनिक आपत्ति दर्ज नहीं कराई। उन्होंने इस वादे के विरोध में न तो कोई बयान दिया और न ही पार्टी के भीतर इसे रोकने की कोशिश की। चुनावी रैलियों में वे जनता दल के इसी घोषणा-पत्र के आधार पर वोट मांग रहे थे। इसका सीधा और साफ मतलब यह था कि 1989 तक उनका सार्वजनिक रुख मंडल आयोग के प्रति कम से कम कागजी तौर पर सहमति का ही था।

परंतु, जैसे ही **7 अगस्त 1990** को तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने संसद में मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की ऐतिहासिक घोषणा की, चंद्रशेखर का एक बिल्कुल बदला हुआ रूप सामने आया। उन्होंने तुरंत इस फैसले पर अपनी गहरी आपत्ति जताई और तर्क दिया कि:

> *”इतना बड़ा और संवेदनशील निर्णय लागू करने से पहले समाज में एक व्यापक आम सहमति (Consensus) बनाई जानी चाहिए थी। बिना सहमति के इसे लागू करना समाज को बांटने जैसा है।”*

यह तर्क पहली नजर में बहुत ही परिपक्व, लोकतांत्रिक और संतुलित प्रतीत हो सकता है, लेकिन जब हम इसकी गहराई में जाते हैं, तो यह वैचारिक रूप से खोखला और राजनीतिक रूप से बेहद कपटपूर्ण नजर आता है। इस तर्क के उठते ही कुछ बेहद तीखे सवाल चंद्रशेखर के अपने राजनीतिक आचरण पर खड़े होते हैं:

1. **दस साल तक सहमति किसने रोकी थी?** यदि 1979 में आयोग बनने से लेकर 1990 तक पूरे 11 साल का समय देश के पास था, और चंद्रशेखर स्वयं को सामाजिक न्याय का मसीहा और लोहिया का चेला मानते थे, तो उस पूरे दशक में उन्होंने खुद इस ‘सामाजिक सहमति’ के निर्माण का नेतृत्व क्यों नहीं किया?

2. **सहमति का इंतजार या यथास्थितिवाद?** भारत जैसे गहरे जातिवादी समाज में, जहाँ प्रशासनिक और सामाजिक सत्ताओं पर उच्च जातियों का सदियों से कब्जा रहा हो, क्या शोषक वर्ग कभी स्वेच्छा से शोषित वर्ग को उसका हक देने पर ‘सहमति’ जताएगा? सामाजिक न्याय कभी भी आम सहमति से नहीं आता; वह हमेशा स्थापित सत्ताओं के खिलाफ संघर्ष और साहसिक राजनीतिक इच्छाशक्ति से आता है।

3. **संसदीय मर्यादा और अंतर्विरोध:** जब कोई दल अपने घोषणा-पत्र में किसी नीति को शामिल करता है और जनता उस दल को चुनकर सत्ता में भेजती है, तो वह नीति अपने आप में लोकतांत्रिक सहमति प्राप्त कर चुकी होती है। सरकार बनने के बाद यह कहना कि ‘पहले सहमति बनाओ’, वास्तव में उस जनादेश का अपमान था और मंडल रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डालने की एक सोची-समझी कोशिश थी।

## 4. प्रतीक-राजनीति का खेल: आंबेडकर बनाम पटेल और भारत रत्न का अंतर्निहित संदेश

विश्वनाथ प्रताप सिंह (V.P. Singh) की सरकार केवल नीतियों के स्तर पर ही नहीं, बल्कि प्रतीकों के स्तर पर भी सामाजिक न्याय की राजनीति को एक नया आधार दे रही थी। वी.पी. सिंह की सरकार ने भारतीय संविधान के निर्माता और शोषितों के मसीहा **डॉ. भीमराव आंबेडकर को मरणोपरांत भारत रत्न** प्रदान किया। यह केवल एक राजकीय सम्मान नहीं था, बल्कि यह उस पूरे बहुजन विमर्श और चेतना को देश के सर्वोच्च पटल पर स्थापित करने का एक बड़ा प्रतीकात्मक कदम था, जिसे मंडल आयोग के लागू होने से एक नई ऊर्जा मिल रही थी।

इसके कुछ ही समय बाद, वी.पी. सिंह की सरकार गिरती है और कांग्रेस के बाहरी समर्थन से चंद्रशेखर देश के प्रधानमंत्री बनते हैं। प्रधानमंत्री बनते ही चंद्रशेखर की सरकार जो सबसे पहला और बड़ा प्रतीकात्मक निर्णय लेती है, वह था—**सरदार वल्लभभाई पटेल को मरणोपरांत भारत रत्न देना।**

इस निर्णय का राजनीतिक और सामाजिक संदर्भ अत्यंत गहरा है और यह किसी भी राजनीतिक विश्लेषक को सोचने पर मजबूर करता है:

### पटेल को भारत रत्न: सम्मान या प्रतिवाद?

सरदार पटेल स्वतंत्र भारत के एक महान राष्ट्र-निर्माता थे, इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती और उन्हें भारत रत्न मिलना पूरी तरह से न्यायोचित था। लेकिन राजनीति में **क्रोनोलॉजी (कालक्रम) और टाइमिंग (समय)** का बहुत बड़ा महत्व होता है। चंद्रशेखर के पूरे राजनीतिक जीवन का यदि अध्ययन किया जाए, तो समाजवादी धारा के होने के कारण सरदार पटेल कभी भी उनके वैचारिक आदर्श या प्रेरणास्रोत के रूप में नहीं उभरे थे। वे हमेशा लोहिया, आचार्य नरेंद्र देव और जयप्रकाश नारायण की बात करते थे। फिर अचानक प्रधानमंत्री बनते ही उन्हें सरदार पटेल की याद आना और उन्हें भारत रत्न देना एक गहरे राजनीतिक निहितार्थ की ओर इशारा करता है।

इसे समझने के लिए हमें इतिहास के कुछ कड़वे तथ्यों को देखना होगा। सरदार पटेल अपने समय में देश के भीतर आरक्षण और जाति आधारित विशेष अवसरों की व्यवस्था को लेकर बहुत अधिक उत्साही नहीं थे। उन्होंने संविधान सभा की बहसों के दौरान और बाद में भी बड़े पैमाने पर जाति आधारित रियायतों के प्रति एक रूढ़िवादी रुख अपनाया था। दूसरी ओर, डॉ. आंबेडकर ने जब संविधान सभा में पिछड़ों और दलितों के अधिकारों की बात की थी, तो उस दौर की कांग्रेस के भीतर के दक्षिणपंथी धड़े (जिसका प्रतिनिधित्व अक्सर पटेल से जोड़कर देखा जाता है) ने उसका तीखा विरोध किया था।

जब वी.पी. सिंह ने आंबेडकर को भारत रत्न दिया और मंडल रिपोर्ट लागू की, तो देश का सवर्ण तबका बेहद आक्रोशित था। ऐसे में चंद्रशेखर द्वारा तुरंत सरदार पटेल को भारत रत्न दिए जाने को कई राजनीतिक विश्लेषक **”मंडल और आंबेडकर की प्रतीक-राजनीति के खिलाफ एक सवर्ण-प्रतिवाद (Upper Caste Counter-Response)”** के रूप में देखते हैं। यह एक तरह से देश के उस सवर्ण मानस को शांत करने और उसे यह संदेश देने का प्रयास था कि उनकी सरकार आंबेडकरवादी या मंडलवादी अति-उत्साह के बजाय पारंपरिक राष्ट्रवादी और यथास्थितिवादी प्रतीकों की ओर लौट रही है। चंद्रशेखर का यह कदम मंडल आंदोलन की धार को कुंद करने का एक बेहद चतुर और सांकेतिक प्रयास था।

## 5. संसद की वह ऐतिहासिक बहस: वी.पी. सिंह के विश्वास मत पर चंद्रशेखर का रुख

चंद्रशेखर की सामाजिक न्याय विरोधी राजनीति का सबसे प्रामाणिक और अकाट्य दस्तावेज **नवंबर 1990** में संसद के भीतर वी.पी. सिंह सरकार के खिलाफ आए विश्वास मत के दौरान दिए गए उनके अपने भाषणों में मिलता है। जब वी.पी. सिंह सरकार मंडल आयोग को लागू करने और लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा को समस्तीपुर में रोककर धर्मनिरपेक्षता की रक्षा करने के कारण संकट में थी, तब चंद्रशेखर ने संसद के पटल पर जो रुख अपनाया, उसने उनके अंतर्विरोधों को पूरी तरह नग्न कर दिया।

उस ऐतिहासिक बहस के दौरान चंद्रशेखर के वक्तव्य के मुख्य बिंदु इस प्रकार थे:

* **निर्णय की प्रक्रिया पर हमला:** चंद्रशेखर ने वी.पी. सिंह पर आरोप लगाया कि उन्होंने यह फैसला केवल अपनी गिरती हुई राजनीतिक साख को बचाने और खुद को पिछड़ों का मसीहा साबित करने के लिए ‘अचानक’ और ‘अकेले’ लिया। उन्होंने इसे एक “अपरिपक्व और बचकाना” कदम बताया।

* **देश को झुलसाने का आरोप:** उन्होंने मंडल विरोधी छात्र आंदोलनों और आत्मदाह की घटनाओं का पूरा ठीकरा वी.पी. सिंह के सिर पर फोड़ते हुए कहा कि इस एक फैसले ने देश के युवाओं को आपस में लड़ा दिया है और समाज को गृहयुद्ध के मुहाने पर खड़ा कर दिया है।

* **आर्थिक आधार की वकालत:** अपने भाषण में समाजवाद की आड़ लेते हुए चंद्रशेखर ने दबी जुबान में आरक्षण के लिए जाति के बजाय ‘आर्थिक पिछड़ेपन’ को तरजीह देने की बात कही। यह वही तर्क था जो देश का पारंपरिक सवर्ण तबका हमेशा से मंडल आयोग को खारिज करने के लिए देता आया था।

इस बहस में चंद्रशेखर कहीं से भी एक ऐसे समाजवादी नेता नहीं लग रहे थे जो पिछड़ों के अधिकारों के लिए खड़ा हो, बल्कि वे एक ऐसे रूढ़िवादी राजनेता की तरह बोल रहे थे जो कानून-व्यवस्था और सामाजिक स्थिरता के नाम पर एक युगांतकारी सामाजिक बदलाव को रोकना चाहता था। उन्होंने वी.पी. सिंह को हटाने के लिए उस कांग्रेस से हाथ मिलाया, जिसने खुद 10 साल तक मंडल रिपोर्ट को दबा कर रखा था। यह सत्ता लोलुपता और वैचारिक पतन का वह चरम बिंदु था जहाँ सामाजिक न्याय की बलि चढ़ा दी गई।

## 6. मंडल रिपोर्ट को “अपनी मौत मरने देने” का गुप्त एजेंडा

चंद्रशेखर जब नवंबर 1990 में प्रधानमंत्री बने, तो उनकी सरकार पूरी तरह से कांग्रेस के रहमोकरम पर टिकी हुई थी। सत्ता में आने के बाद उनका जो रुख मंडल आयोग को लेकर रहा, उसे इतिहासकार **”पैसिव रेजिस्टेंस (निष्क्रिय प्रतिरोध)”** या रिपोर्ट को **”अपनी मौत मरने देने (Letting it die its own death)”** की रणनीति कहते हैं।

चूँकि वी.पी. सिंह सरकार पहले ही इसका सरकारी नोटिफिकेशन (अधिसूचना) जारी कर चुकी थी, इसलिए चंद्रशेखर के लिए इसे सीधे तौर पर पूरी तरह निरस्त कर पाना राजनीतिक रूप से आत्मघाती हो सकता था। अतः उन्होंने एक अधिक सूक्ष्म और खतरनाक रास्ता चुना:

* **कार्यान्वयन में ढिलाई:** उनकी सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशों के तहत सरकारी नौकरियों में पिछड़ों की भर्ती की प्रक्रियाओं को आगे बढ़ाने के लिए कोई प्रशासनिक सक्रियता नहीं दिखाई। मंत्रालयों को कोई कड़े निर्देश जारी नहीं किए गए।

* **अदालती कार्यवाही पर ढुलमुल रवैया:** जब मंडल आयोग के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई (जो बाद में *इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ* मामले के रूप में जाना गया), तब चंद्रशेखर सरकार की ओर से इस ऐतिहासिक सामाजिक सुधार के पक्ष में वैसी मजबूत और आक्रामक कानूनी पैरवी नहीं की गई जैसी अपेक्षित थी। सरकार का रवैया बेहद उदासीन रहा, जिससे ऐसा लगा कि वे चाहते हैं कि अदालत ही इस पर कोई रोक लगा दे या इसे उलझा दे।

यहाँ यह तर्क दिया जा सकता है कि बाद में जब कांग्रेस की पी.वी. नरसिम्हा राव सरकार आई या उसके बाद जब भाजपा की सरकारें आईं, तो किसी ने भी मंडल आयोग के फैसले को पलटा नहीं। लेकिन इसके पीछे इन पार्टियों का मंडल के प्रति कोई वैचारिक प्रेम नहीं था, बल्कि वह **”मंड़लीकरण की राजनीति”** का वह दबाव था जिसे वी.पी. सिंह और तत्कालीन पिछड़े नेताओं (लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, शरद यादव आदि) ने देश की रगों में इस कदर दौड़ा दिया था कि उसे पलटना किसी भी राजनीतिक दल के लिए खुदकुशी करने जैसा था। चंद्रशेखर का प्रयास इसी उभरती हुई चेतना को उसके शुरुआती दौर में ही दबा देने का था, जिसमें वे अंततः असफल रहे।

## 7. वैचारिक निरंतरता का मूल्यांकन: क्या चंद्रशेखर वास्तव में सामाजिक न्याय विरोधी थे?

इस पूरे विश्लेषण के बाद अंततः हमें इस बुनियादी प्रश्न पर आना होगा कि क्या चंद्रशेखर को सीधे तौर पर ‘सामाजिक न्याय विरोधी’ घोषित किया जा सकता है?

इतिहास केवल यह नहीं देखता कि किसी नेता ने सत्ता की कुर्सी पर बैठकर क्या भाषण दिए; इतिहास यह देखता है कि जब समाज एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा था, तब वह नेता इतिहास के किस पक्ष में खड़ा था। इस कसौटी पर चंद्रशेखर का पक्ष बेहद कमजोर और प्रतिगामी नजर आता है।

उनकी राजनीति को सामाजिक न्याय विरोधी मानने के पक्ष में निम्नलिखित अकाट्य तर्क दिए जा सकते हैं:

| राजनीतिक संदर्भ | घोषित समाजवादी विचार | वास्तविक राजनीतिक आचरण / परिणति |

| — | — | — |

| **लोहिया की विरासत** | जाति-उन्मूलन और पिछड़ों को सत्ता में ६०% भागीदारी का समर्थन। | जाति के सवाल से लगातार दूरी और केवल आर्थिक विषमता पर बात करना। |

| **मंडल आयोग (1980-90)** | पिछड़े वर्गों के उत्थान के प्रति सैद्धांतिक प्रतिबद्धता। | १० वर्षों तक रिपोर्ट को लागू कराने के लिए कोई भी राष्ट्रीय आंदोलन न चलाना। |

| **अगस्त 1990 की घोषणा** | जनता दल के घोषणा-पत्र के वादे पर मौन सहमति। | वी.पी. सिंह के फैसले के बाद ‘सामाजिक सहमति’ के नाम पर तीखा विरोध। |

| **प्रतीक-राजनीति** | आंबेडकर के विचारों के प्रति सम्मान का दिखावा। | आंबेडकर और मंडल के उभार को दबाने के लिए पटेल को प्रति-प्रतीक बनाना। |

| **संसदीय आचरण** | शोषितों की आवाज बनने का दावा। | वी.पी. सिंह सरकार को गिराने के लिए मंडल-विरोधी ताकतों (कांग्रेस) से हाथ मिलाना। |

चंद्रशेखर के समर्थक अक्सर यह ढाल आगे करते हैं कि वे समाज में किसी भी तरह के हिंसक टकराव या ‘जाति युद्ध’ के खिलाफ थे, इसलिए वे धीरे-धीरे और सहमति से इसे लागू करना चाहते थे। यह तर्क पूरी तरह से यथास्थितिवाद (Status quoism) का छद्म आवरण है।

दुनिया का इतिहास गवाह है कि जब भी किसी शोषित समाज को उसका हक दिया जाता है, तो शोषक वर्ग विशेषाधिकार छोड़ने के डर से सड़कों पर उतरता ही है। अमेरिकी नागरिक अधिकार आंदोलन (Civil Rights Movement) हो या भारत में दलितों-पिछड़ों का संघर्ष—टकराव सामाजिक बदलाव की एक अनिवार्य प्रक्रिया है। एक सच्चे समाजवादी नेता का काम इस टकराव से डरकर कदम पीछे खींच लेना या शोषकों की भाषा बोलना नहीं होता, बल्कि वंचितों के साथ मजबूती से खड़े होकर उस बदलाव को तार्किक परिणति तक पहुंचाना होता है। चंद्रशेखर इस मोर्चे पर पूरी तरह विफल रहे।

डॉ. राम मनोहर लोहिया ने एक बार कहा था कि **”भारतीय राजनीति में लोग सिद्धांतवादी होने का ढोंग करते हैं, लेकिन जब परीक्षा की घड़ी आती है, तो उनका जातीय मानस और सत्ता का स्वार्थ हावी हो जाता है।”** चंद्रशेखर का पूरा राजनीतिक जीवन और विशेषकर 1990 का उनका आचरण लोहिया के इसी कथन की पुष्टि करता है।

वे एक महान वक्ता थे, एक जुझारू सांसद थे और देश के प्रधानमंत्री भी बने, लेकिन जब भारत के इतिहास ने उनसे यह मांग की कि वे सदियों से हाशिए पर धकेले गए पिछड़ों, दलितों और शोषितों के हक में खड़े होकर ‘मंडल क्रांति’ के सारथी बनें, तब उन्होंने एक रूढ़िवादी, उच्च-जातीय मानसिकता से प्रेरित और यथास्थितिवादी राजनेता का रास्ता चुना।

उनका ‘सहमति निर्माण’ का तर्क वास्तव में एक ऐसी राजनीतिक प्रतिक्रिया थी जो उनके समाजवादी परिचय को पूरी तरह झुठलाती थी। इसीलिए, जब भी भारतीय राजनीति में सामाजिक न्याय के संघर्ष का वास्तविक इतिहास लिखा जाएगा, चंद्रशेखर का नाम उसके नायकों में नहीं, बल्कि उन लोगों की सूची में दर्ज होगा जिन्होंने एक ऐतिहासिक सामाजिक क्रांति की राह में अवरोध पैदा करने की हर मुमकिन कोशिश की थी। उनकी यह राजनीति वैचारिक निरंतरता का उदाहरण नहीं, बल्कि सत्ता के लिए किया गया एक गहरा वैचारिक विचलन थी।

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