अयोध्या में भगवान श्रीराम का भव्य मंदिर केवल एक धार्मिक स्मारक नहीं है। वह भारत की सांस्कृतिक चेतना, राजनीतिक इतिहास और सामाजिक परिवर्तन का भी एक प्रतीक बन चुका है। किंतु इस मंदिर से जुड़ी एक ऐसी घटना भी है, जिस पर अपेक्षाकृत कम चर्चा हुई, जबकि उसका महत्व भविष्य की हिंदू सामाजिक संरचना को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह घटना है श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में सामाजिक प्रतिनिधित्व का क्रमशः विकसित होना—1989 में कामेश्वर चौपाल द्वारा शिलान्यास की पहली ईंट रखने से लेकर 2026 में कृष्ण मोहन को ट्रस्ट में महत्वपूर्ण प्रशासनिक दायित्व सौंपे जाने तक की यात्रा.
यदि अयोध्या में कामेश्वर चौपाल से कृष्ण मोहन तक की यात्रा को केवल एक प्रशासनिक परिवर्तन मान लिया जाए, तो उसके व्यापक अर्थ को समझना कठिन होगा। वास्तव में यह उस विचारधारा का विस्तार है जो पिछले कई दशकों से हिंदू समाज के भीतर धीरे-धीरे आकार ले रही है। यह विचारधारा कहती है कि यदि हिंदू समाज को संगठित और जीवंत रहना है, तो उसे जातिगत ऊँच-नीच की मानसिकता से ऊपर उठकर सामाजिक समरसता को व्यवहार में उतारना होगा। यही कारण है कि आज मंदिरों के प्रबंधन, धार्मिक नेतृत्व और आध्यात्मिक प्रतिष्ठा के प्रश्न पर पहले की तुलना में अधिक खुला विमर्श दिखाई देता है।
इस वैचारिक परिवर्तन की चर्चा करते समय की भूमिका का उल्लेख आवश्यक है। संघ ने अपने विभिन्न सरसंघचालकों के माध्यम से बार-बार यह कहा कि अस्पृश्यता हिंदू समाज के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकती। विशेष रूप से का 1974 का प्रसिद्ध वक्तव्य—“यदि अस्पृश्यता गलत नहीं है, तो दुनिया में कुछ भी गलत नहीं है”—सामाजिक समरसता के विमर्श में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जाता है। बाद में ने भी अनेक अवसरों पर कहा कि जाति-आधारित भेदभाव का हिंदू धर्म में कोई धार्मिक औचित्य नहीं है और समाज को आत्मसुधार करना चाहिए।
इसी प्रकार ने भी समय-समय पर धर्म संसदों, संत सम्मेलनों और समरसता अभियानों के माध्यम से यह संदेश दिया कि मंदिर किसी एक जाति की संपत्ति नहीं, बल्कि संपूर्ण हिंदू समाज की साझा धरोहर हैं। राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान कामेश्वर चौपाल को शिलान्यास का सम्मान दिया जाना केवल राजनीतिक निर्णय नहीं था; इसे सामाजिक संदेश के रूप में भी देखा गया।
यहाँ एक रोचक परिवर्तन दिखाई देता है। कभी हिंदू समाज में धार्मिक अधिकार का सबसे बड़ा आधार जन्म माना जाता था। आज उसी समाज में कथा, प्रवचन और आध्यात्मिक नेतृत्व का आधार तेजी से बदल रहा है। लाखों श्रद्धालु मोरारी बापू, साध्वी निरंजन ज्योति, परमानन्द जी महाराज सहित अनेक अन्य कथावाचकों को सुनते हैं। उनकी लोकप्रियता का कारण उनकी जाति नहीं, बल्कि उनकी वाणी, विद्वत्ता और आध्यात्मिक प्रभाव है। इनमें सभी एक ही सामाजिक पृष्ठभूमि से नहीं आते, फिर भी समाज ने उन्हें स्वीकार किया। यह परिवर्तन इस बात का संकेत है कि धार्मिक नेतृत्व की परिभाषा बदल रही है।
इतिहास भी यही बताता है कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा ने अनेक बार जन्म से अधिक साधना को महत्व दिया। संत रविदास, जिनका जन्म उस समय सामाजिक रूप से वंचित माने जाने वाले समुदाय में हुआ, आज उत्तर भारत के सबसे पूज्य संतों में गिने जाते हैं। कबीर ने जाति पर तीखा प्रहार किया और कहा कि मनुष्य की पहचान उसके कर्म और ज्ञान से होनी चाहिए। महाराष्ट्र के चोखामेला, तमिल परंपरा के नंदनार, कर्नाटक के कनकदास और केरल के नारायण गुरु—इन सभी ने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि आध्यात्मिक ऊँचाई किसी जन्मसिद्ध विशेषाधिकार की मोहताज नहीं है।
फिर भी यह भी स्वीकार करना होगा कि इन संतों के प्रति श्रद्धा और मंदिरों के संस्थागत ढाँचे में परिवर्तन—दो अलग-अलग बातें हैं। समाज ने संतों को सम्मान दिया, लेकिन मंदिरों के प्रशासन, ट्रस्टों और निर्णय प्रक्रिया में व्यापक सामाजिक भागीदारी आने में बहुत समय लगा। यही कारण है कि अयोध्या और तमिलनाडु जैसे उदाहरणों को कई विद्वान एक नए चरण की शुरुआत मानते हैं।
हालाँकि इस परिवर्तन को लेकर मतभेद भी कम नहीं हैं। परंपरागत आगम शास्त्रों के विशेषज्ञों का कहना है कि मंदिर का प्रशासन और मंदिर की पूजा-पद्धति अलग-अलग विषय हैं। उनके अनुसार ट्रस्ट का सदस्य कोई भी योग्य व्यक्ति हो सकता है, किंतु अर्चक या प्रधान पुजारी के लिए संबंधित शास्त्रीय परंपरा का प्रशिक्षण और दीक्षा अनिवार्य होनी चाहिए। दूसरी ओर सामाजिक न्याय के समर्थकों का तर्क है कि यदि प्रशिक्षण और दीक्षा की व्यवस्था सभी के लिए समान रूप से उपलब्ध हो, तो जन्म के आधार पर किसी को अवसर से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। यह बहस आने वाले वर्षों में भी जारी रहने की संभावना है।
एक और महत्वपूर्ण परिवर्तन मंदिर प्रबंधन के स्वरूप में दिखाई देता है। आज अधिकांश बड़े मंदिरों में करोड़ों रुपये का वार्षिक लेन-देन होता है। अस्पताल, विश्वविद्यालय, धर्मशालाएँ, गौशालाएँ, भोजनालय और अनेक सामाजिक योजनाएँ भी मंदिरों से संचालित होती हैं। ऐसे में प्रशासनिक अनुभव, वित्तीय पारदर्शिता और आधुनिक प्रबंधन कौशल भी आवश्यक हो गए हैं। यही कारण है कि कई ट्रस्ट अब प्रशासनिक सेवा, न्यायपालिका, वित्त, शिक्षा और समाजसेवा से जुड़े लोगों को भी अपने साथ जोड़ रहे हैं। कृष्ण मोहन जैसे अनुभवी प्रशासनिक अधिकारी की भूमिका इसी संदर्भ में समझी जानी चाहिए।
यह भी उल्लेखनीय है कि देश के कई प्रसिद्ध मठों और आध्यात्मिक संस्थाओं ने समय के साथ सामाजिक आधार का विस्तार किया है। अनेक स्थानों पर जाति से अधिक तप, अध्ययन, सेवा और संगठन क्षमता को महत्व दिया जाने लगा है। यद्यपि सभी परंपराओं में यह परिवर्तन समान गति से नहीं हुआ है, फिर भी प्रवृत्ति स्पष्ट दिखाई देती है।
इस पूरे विमर्श में एक सावधानी भी आवश्यक है। किसी भी परिवर्तन को अतिशयोक्ति के साथ प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा। यह कहना कि अब हिंदू समाज पूरी तरह जाति से मुक्त हो गया है, वास्तविकता नहीं है। उसी प्रकार यह कहना भी सही नहीं होगा कि कोई परिवर्तन हुआ ही नहीं। सच इन दोनों के बीच है। परिवर्तन हो रहा है, लेकिन वह क्रमिक, क्षेत्रानुसार भिन्न और कई बार विवादों से घिरा हुआ है।
यही कारण है कि अयोध्या का उदाहरण विशेष महत्व रखता है। राम भारतीय समाज के सबसे व्यापक सांस्कृतिक प्रतीकों में हैं। यदि उनके मंदिर के ट्रस्ट में सामाजिक प्रतिनिधित्व का विस्तार होता है, तो उसका संदेश पूरे देश में जाता है। कामेश्वर चौपाल को शिलान्यास का सम्मान, ट्रस्ट में उनकी भूमिका और फिर कृष्ण मोहन को महत्वपूर्ण दायित्व मिलना—इन घटनाओं को इसी व्यापक संदर्भ में समझना चाहिए।
भविष्य का सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि मंदिर का ट्रस्टी किस जाति का है। उससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि क्या वह व्यक्ति ईमानदार है, धार्मिक परंपराओं का सम्मान करता है, समाज के प्रति उत्तरदायी है और मंदिर को सार्वजनिक विश्वास की संस्था के रूप में विकसित कर सकता है। यदि इन कसौटियों पर चयन होगा, तो स्वाभाविक रूप से समाज के सभी वर्गों के योग्य लोगों के लिए अवसर बढ़ेंगे।
संभव है कि आने वाले वर्षों में मंदिर ट्रस्टों के गठन के लिए अधिक पारदर्शी व्यवस्था बने। धार्मिक विद्वानों, समाजसेवियों, प्रशासनिक विशेषज्ञों, दानदाताओं और विभिन्न सामाजिक वर्गों के प्रतिनिधियों का संतुलित समावेश हो। इससे मंदिरों का प्रबंधन भी अधिक उत्तरदायी होगा और सामाजिक विश्वास भी मजबूत होगा।
भारतीय सभ्यता की सबसे बड़ी शक्ति उसकी आत्मसुधार की क्षमता रही है। इस समाज ने समय-समय पर अपने भीतर उठे प्रश्नों का उत्तर खोजने का प्रयास किया है। सती प्रथा, बाल विवाह, अस्पृश्यता और स्त्री शिक्षा जैसे विषयों पर भी परिवर्तन इसी प्रक्रिया से आया। मंदिर प्रबंधन और धार्मिक नेतृत्व का प्रश्न भी उसी आत्ममंथन की अगली कड़ी प्रतीत होता है।
शायद इसीलिए आज सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि मंदिर किसके हाथ में है, बल्कि यह है कि मंदिर किस भावना से चलाया जा रहा है। यदि मंदिर समाज को जोड़ने का माध्यम बने, यदि वहाँ जन्म नहीं बल्कि सेवा का सम्मान हो, यदि वहाँ अधिकार नहीं बल्कि उत्तरदायित्व की भावना हो, तो वही भारतीय धार्मिक परंपरा की वास्तविक आत्मा होगी।
कामेश्वर चौपाल से कृष्ण मोहन तक की यात्रा, तमिलनाडु में प्रशिक्षित गैर-ब्राह्मण अर्चकों की नियुक्तियाँ, संत रविदास से नारायण गुरु तक की विरासत और आधुनिक हिंदू समाज में योग्यता आधारित धार्मिक स्वीकार्यता—ये सभी घटनाएँ मिलकर एक नए युग का संकेत देती हैं। यह युग अभी प्रारंभिक अवस्था में है। इसकी दिशा और गति पर मतभेद हो सकते हैं, किंतु इतना स्पष्ट है कि हिंदू समाज के भीतर अब यह प्रश्न स्थायी रूप से उठ खड़ा हुआ है कि क्या जन्म किसी व्यक्ति की अंतिम पहचान है, या फिर ज्ञान, साधना, सेवा और चरित्र उससे कहीं अधिक बड़े मूल्य हैं?
संभवतः आने वाले दशकों में इसी प्रश्न का उत्तर भारत के मंदिरों, मठों और धार्मिक संस्थाओं की नई संरचना निर्धारित करेगा। और यदि ऐसा हुआ, तो इतिहास यह दर्ज करेगा कि इक्कीसवीं सदी का भारत केवल नए मंदिर बनाने का युग नहीं था, बल्कि मंदिरों की सामाजिक चेतना को नए अर्थ देने का भी युग था।
यह केवल दो व्यक्तियों की कहानी नहीं है। यह उस वैचारिक परिवर्तन का संकेत है जिसमें हिंदू समाज पहली बार गंभीरता से यह प्रश्न पूछ रहा है कि क्या धार्मिक नेतृत्व और मंदिर प्रबंधन का आधार केवल जन्म होना चाहिए, या फिर योग्यता, साधना, ईमानदारी, संगठन क्षमता और सामाजिक स्वीकार्यता भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं?
यह प्रश्न जितना धार्मिक है, उतना ही सामाजिक और राजनीतिक भी है। क्योंकि मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं है। मंदिर समाज का सांस्कृतिक केंद्र है, आर्थिक संसाधनों का केंद्र है, सामाजिक नेतृत्व का केंद्र है और करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। इसलिए मंदिर का प्रबंधन केवल प्रशासनिक विषय नहीं, बल्कि सामाजिक शक्ति के वितरण का भी विषय है।
सदियों तक भारत में अधिकांश बड़े मंदिरों का संचालन विशिष्ट परंपरागत समूहों, राजपरिवारों, मठों या पुजारी परिवारों के हाथों में रहा। इसके पीछे केवल जातिगत कारण ही नहीं थे, बल्कि तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था, धार्मिक परंपराएँ, राजकीय संरक्षण और स्थानीय इतिहास भी थे। इसलिए इस पूरे इतिहास को केवल एक कारण से समझना उचित नहीं होगा। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि इस व्यवस्था में समाज के अनेक वर्ग, विशेषकर दलित समुदाय, निर्णय प्रक्रिया से लगभग बाहर रहे।
बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में दलित समाज का संघर्ष मंदिरों के प्रबंधन के लिए नहीं, बल्कि मंदिरों में प्रवेश के लिए था। अनेक क्षेत्रों में उन्हें मंदिर के बाहर खड़ा रहने के लिए बाध्य किया जाता था। कुएँ अलग थे, रास्ते अलग थे और सामाजिक व्यवहार भी अलग था। ऐसे समय में मंदिर प्रवेश आंदोलन केवल धार्मिक अधिकार का नहीं, बल्कि मानव सम्मान का आंदोलन बन गया।
महात्मा गांधी ने अस्पृश्यता को हिंदू समाज का सबसे बड़ा कलंक कहा। उन्होंने हरिजन यात्राएँ निकालीं, मंदिरों के द्वार खोलने की अपील की और समाज से आत्ममंथन करने का आग्रह किया। उनका विश्वास था कि यदि हिंदू समाज को जीवित रहना है तो उसे जातिगत भेदभाव छोड़ना ही होगा।
दूसरी ओर डॉ. भीमराव आंबेडकर का दृष्टिकोण अलग था। वे मानते थे कि मंदिर प्रवेश महत्वपूर्ण अवश्य है, किंतु उससे भी अधिक महत्वपूर्ण सामाजिक समानता और सम्मान है। उन्होंने प्रश्न उठाया कि यदि किसी व्यक्ति को मंदिर में प्रवेश तो मिल जाए, लेकिन समाज में सम्मान न मिले, तो क्या वास्तविक परिवर्तन कहा जा सकता है? यही कारण था कि उन्होंने सामाजिक न्याय को केवल धार्मिक अधिकारों तक सीमित नहीं रखा।
इन दोनों विचारों के बीच अंतर था, लेकिन एक समानता भी थी। दोनों इस बात पर सहमत थे कि जाति आधारित अपमान किसी भी सभ्य समाज के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकता।
स्वतंत्रता के बाद भारतीय संविधान ने इस दिशा में निर्णायक कदम उठाया। अनुच्छेद 17 ने अस्पृश्यता को समाप्त घोषित किया। अनुच्छेद 25 और 26 ने धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक संस्थाओं के अधिकारों की रक्षा की। इसके बाद धीरे-धीरे मंदिर प्रवेश की बाधाएँ कम हुईं। किंतु मंदिर प्रबंधन का प्रश्न लंबे समय तक लगभग यथावत बना रहा।
यहीं से आज की बहस शुरू होती है।
क्या मंदिर केवल श्रद्धालुओं के लिए खुले होने चाहिए, या उनके संचालन में भी समाज के सभी वर्गों की भागीदारी होनी चाहिए?
राम जन्मभूमि आंदोलन ने इस प्रश्न को नए रूप में प्रस्तुत किया।
1989 में जब अयोध्या में शिलान्यास का निर्णय हुआ, तब पहली शिला रखने के लिए कामेश्वर चौपाल का चयन किया गया। वे बिहार के दलित समाज से आते थे और लंबे समय से सामाजिक एवं धार्मिक कार्यों से जुड़े थे। उस समय इस निर्णय को लेकर व्यापक चर्चा हुई। कुछ लोगों ने इसे प्रतीकात्मक बताया, तो कुछ ने इसे हिंदू समाज में समरसता का ऐतिहासिक संदेश माना।
लेकिन यदि यह केवल प्रतीकात्मक कदम होता, तो संभवतः आगे उसकी निरंतरता दिखाई नहीं देती। बाद में जब सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन हुआ, तब कामेश्वर चौपाल को ट्रस्ट का सदस्य बनाया गया। इससे यह संकेत मिला कि उन्हें केवल शिलान्यास तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि संस्थागत भूमिका भी दी गई।
2026 में उनके निधन के बाद ट्रस्ट में कृष्ण मोहन, जो भारतीय वन सेवा के सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं, को महत्वपूर्ण प्रशासनिक दायित्व दिया गया। यह नियुक्ति इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी गई क्योंकि राम मंदिर का ट्रस्ट आज देश की सबसे प्रतिष्ठित धार्मिक संस्थाओं में से एक है। इससे यह संदेश गया कि मंदिर प्रशासन में सामाजिक प्रतिनिधित्व और प्रशासनिक योग्यता साथ-साथ चल सकते हैं।
यहाँ एक बात समझना आवश्यक है। इन घटनाओं को यह कहकर प्रस्तुत करना कि अब पूरे देश के मंदिरों का प्रबंधन दलितों के हाथ में जा रहा है—तथ्यों के अनुरूप नहीं होगा। ऐसा नहीं है। लेकिन यह कहना पूरी तरह उचित होगा कि पहली बार देश के सबसे प्रतिष्ठित मंदिरों में से एक की संस्थागत संरचना में सामाजिक प्रतिनिधित्व को सार्वजनिक रूप से महत्व मिला है। यही इस परिवर्तन का वास्तविक महत्व है।
यह परिवर्तन केवल अयोध्या तक सीमित नहीं है।
तमिलनाडु में लंबे समय तक यह धारणा रही कि मंदिरों में अर्चक बनने का अधिकार केवल परंपरागत परिवारों तक सीमित है। लेकिन पिछले दो दशकों में वहाँ सरकारों ने आगम शास्त्रों का प्रशिक्षण सभी जातियों के योग्य अभ्यर्थियों के लिए उपलब्ध कराया। इसके बाद अनेक गैर-ब्राह्मण और अनुसूचित जाति समुदाय के प्रशिक्षित अर्चकों की नियुक्तियाँ हुईं।
इन नियुक्तियों का विरोध भी हुआ। मामला न्यायालयों तक पहुँचा। परंतु एक बात निर्विवाद रूप से स्थापित हुई कि यदि कोई व्यक्ति आवश्यक धार्मिक प्रशिक्षण प्राप्त कर ले, तो समाज के एक बड़े वर्ग ने उसे स्वीकार करने की मानसिक तैयारी दिखाई है। यह परिवर्तन धीमा है, लेकिन महत्वपूर्ण है।
इसी प्रकार केरल में नारायण गुरु ने एक शताब्दी पहले ही घोषणा की थी—”एक जाति, एक धर्म, एक ईश्वर।” उन्होंने स्वयं मंदिरों की स्थापना कर यह चुनौती दी कि ईश्वर पर किसी एक जाति का अधिकार नहीं हो सकता। उस समय उनके विचार क्रांतिकारी माने गए थे। आज वही विचार अनेक सामाजिक चर्चाओं के केंद्र में हैं।
भक्ति आंदोलन के संतों ने तो इससे भी पहले यह रास्ता दिखा दिया था। संत रविदास, कबीर, चोखामेला, नंदनार, नामदेव, कनकदास—इन सभी ने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि आध्यात्मिक ऊँचाई जन्म की मोहताज नहीं होती। विडंबना यह रही कि समाज ने उनकी वाणी को तो स्वीकार किया, लेकिन उनके संदेश को संस्थागत ढाँचे में बदलने में सदियाँ लग गईं।
आज पहली बार परिस्थितियाँ बदलती दिखाई दे रही हैं।
दिलचस्प तथ्य यह भी है कि आधुनिक भारत में धार्मिक लोकप्रियता का आधार भी तेजी से बदल रहा है। आज करोड़ों लोग कथा सुनने जाते हैं, लेकिन मंच पर बैठे कथावाचक की जाति नहीं पूछते। वे उसकी विद्वत्ता, अभिव्यक्ति, आध्यात्मिक अनुभव और नैतिक विश्वसनीयता को देखते हैं। यह परिवर्तन अपने आप में अत्यंत महत्वपूर्ण सामाजिक संकेत है।
यही कारण है कि गैर-ब्राह्मण पृष्ठभूमि से आने वाले अनेक कथावाचकों, संतों और आध्यात्मिक गुरुओं को व्यापक सम्मान मिला है। इससे यह स्पष्ट होता है कि समाज के स्तर पर जन्म आधारित सीमाएँ पहले जैसी कठोर नहीं रह गई हैं।
लेकिन क्या यही परिवर्तन मंदिरों के ट्रस्टों, मठों और प्रशासनिक संस्थाओं तक भी पहुँचेगा? यही वह प्रश्न है जो आज हिंदू समाज के सामने खड़ा है, और जिसका उत्तर आने वाले वर्षों में भारतीय धार्मिक जीवन की दिशा तय करेगा।







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