राजनीतिक सुधारों की दिशा और दशा: शातिर और सजावटी सक्रियता बनाम बुनियादी अपेक्षाएं

भारतीय लोकतंत्र इस समय एक अजीब अंतर्विरोध से गुजर रहा है। एक तरफ सत्ता के शीर्ष से बड़े-बड़े, चमकीले और संरचनात्मक सुधारों का नैरेटिव (विमर्श) बुना जा रहा है, तो दूसरी तरफ उन बुनियादी सुधारों पर पूरी तरह चुप्पी साध ली गई है जो वाकई में लोकतंत्र को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और आम नागरिक के अनुकूल बना सकते हैं। ‘एक राष्ट्र एक चुनाव’, ‘महिला आरक्षण’, और ‘संसद में सीटों की वृद्धि के साथ नया परिसीमन’—ये कुछ ऐसे कदम हैं जिन्हें वर्तमान व्यवस्था अपने ऐतिहासिक राजनीतिक सुधारों के रूप में पेश कर रही है।

लेकिन अगर गहराई से देखा जाए, तो इन सुधारों की जमीन पर आम जनता में कोई स्वतःस्फूर्त या बड़ी मांग नहीं थी। इसके विपरीत, वे सुधार जो भारतीय राजनीति के अपराधीकरण, धनबल के प्रभाव और नेताओं के निरंकुश आचरण को नियंत्रित कर सकते थे—जैसे प्रधानमंत्री पद की समय-सीमा तय करना, चुनाव प्रचार के लिए सरकारी फंडिंग (State Funding of Elections) और ‘राइट टू रिकॉल’ (प्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार)—उन्हें ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। यह स्थिति यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या देश में हो रहे राजनीतिक सुधार वाकई लोकतांत्रिक सुदृढ़ीकरण के लिए हैं, या यह सिर्फ एक ‘शातिर और सजावटी सक्रियता’ (Strategic and Decorative Activism) है?

## सजावटी सक्रियता: जनता की बेरुखी और सरकार का नैरेटिव

मौजूदा दौर में जिन तीन बड़े कदमों को राजनीतिक सुधारों का चेहरा बनाया गया है, उनका विश्लेषण यह समझने के लिए जरूरी है कि ये सुधार किसके हित में हैं।

### १. एक राष्ट्र एक चुनाव (One Nation, One Election)

इस विचार को एक बड़े आर्थिक और प्रशासनिक सुधार के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। तर्क दिया जाता है कि बार-बार होने वाले चुनावों से देश का पैसा बचता है और प्रशासनिक मशीनरी हमेशा ‘चुनावी मोड’ में रहने के बजाय विकास कार्यों पर ध्यान दे पाएगी। लेकिन क्या कभी आम नागरिक ने सड़कों पर उतरकर यह मांग की थी कि देश के सारे चुनाव एक साथ कराए जाएं? बिल्कुल नहीं।

जनता के लिए महत्वपूर्ण यह है कि चुनाव निष्पक्ष हों और उनके स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय मुद्दों के नीचे दबाया न जाए। ‘एक राष्ट्र एक चुनाव’ का छिपा हुआ एजेंडा प्रांतीय और स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय विमर्श के सामने बौना करना है। यह संघीय ढांचे पर एक बड़ा आघात हो सकता है, जहां एक मजबूत राष्ट्रीय लहर में राज्य स्तर के वास्तविक मुद्दे बह जाएंगे। यह लोकतांत्रिक विविधता को समरूपता में बदलने की एक शातिर कोशिश ज्यादा नजर आती है।

### २. महिला आरक्षण (Women’s Reservation Act)

दशकों से लंबित महिला आरक्षण बिल को पारित करना निश्चित रूप से एक ऐतिहासिक कदम के रूप में प्रचारित किया गया। लेकिन इसकी टाइमिंग और इसके साथ जुड़ी शर्तें इसकी नीयत पर सवाल उठाती हैं। इस कानून को पारित तो कर दिया गया, लेकिन इसे ‘अगले परिसीमन और जनगणना’ के बाद लागू करने की शर्त जोड़ दी गई। यानी, श्रेय आज ही ले लिया गया, लेकिन क्रियान्वयन को भविष्य के गर्त में धकेल दिया गया। जनता ने आरक्षण की मांग जरूर की थी, लेकिन इस तरह के पेंचदार और टालने वाले कानून की उम्मीद नहीं की थी, जो एक सजावटी आवरण से ज्यादा कुछ नहीं दिखता।

### ३. सीटों में वृद्धि और नया परिसीमन (Delimitation)

नया संसद भवन बनकर तैयार है, जिसमें सीटों की संख्या भविष्य की आबादी के हिसाब से तय की गई है। सीटों का बढ़ना तकनीकी रूप से प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए जरूरी लग सकता है, लेकिन इसका राजनीतिक निहितार्थ बहुत गहरा है। दक्षिण भारत के राज्यों ने, जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण के राष्ट्रीय लक्ष्यों को बखूबी हासिल किया, उन्हें संसद में अपनी सीटें घटने या उत्तर भारत की तुलना में कम होने का डर है। जिन राज्यों ने जनसंख्या बढ़ाई, उन्हें राजनीतिक इनाम मिलेगा। आम जनता के बीच इस नए परिसीमन को लेकर कोई उत्सुकता नहीं थी; यह पूरी तरह से सत्ता के भू-राजनीतिक संतुलन को अपने पक्ष में मोड़ने की एक शीर्ष-स्तरीय कवायद है।

## जनता की वास्तविक अपेक्षाएं और सत्ता की चुप्पी

दूसरी तरफ, वे सुधार हैं जो भारतीय लोकतंत्र की रगों में जमी गंदगी को साफ कर सकते थे, लेकिन उनके प्रति मौजूदा निजाम में कोई उत्सुकता नहीं दिखती।

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### १. प्रधानमंत्री पद की अधिकतम समयावधि तय करना

दुनिया के सबसे पुराने और मजबूत लोकतंत्र, संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) में राष्ट्रपति अधिकतम दो बार (यानी ८ वर्ष) के लिए ही चुना जा सकता है। यह नियम इसलिए बनाया गया ताकि कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितना भी लोकप्रिय क्यों न हो, सत्ता का स्थायी केंद्र न बन जाए। भारत में प्रधानमंत्री की अवधि पर ऐसी कोई सीमा नहीं है।

यदि भारत में प्रधानमंत्री की अधिकतम अवधि दो या तीन कार्यकाल (१० से १५ वर्ष) के लिए सीमित कर दी जाए, तो इसके क्रांतिकारी और सकारात्मक परिणाम हो सकते हैं:

* **निरंकुश आचरण पर लगाम:** जब एक नेता को पता होता है कि वह हमेशा के लिए सत्ता में नहीं रहने वाला, तो उसके भीतर ‘अमरता का भ्रम’ (Illusion of Permanence) खत्म हो जाता है। वह नौकरशाही, न्यायपालिका और मीडिया को अपनी व्यक्तिगत जागीर समझने के बजाय संस्थाओं का सम्मान करने के लिए मजबूर होता है।

* **’मील का पत्थर’ बनने की ललक:** सीमित समय होने पर प्रधानमंत्री लोक-लुभावन (Populist) योजनाओं या केवल अगले चुनाव को जीतने की रणनीति बनाने के बजाय ऐसे दीर्घकालिक और साहसिक सुधारों पर ध्यान केंद्रित करेगा जो देश के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हों। उसे अपनी ‘लीगेसी’ (विरासत) की चिंता होगी, न कि सिर्फ अगली चुनावी जीत की।

* **पार्टी के भीतर आंतरिक लोकतंत्र:** वर्तमान में भारतीय राजनीतिक दल ‘एकला चलो’ और व्यक्ति-केंद्रित पूजा (Personality Cult) के शिकार हैं। समयावधि तय होने से पार्टियों को नया नेतृत्व तैयार करना ही होगा, जिससे वंशवाद और व्यक्ति-केंद्रित तानाशाही दोनों का अंत होगा।

### २. चुनाव प्रचार के लिए सरकारी फंड का गठन (State Funding of Elections)

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी बीमारी ‘काला धन’ और ‘क्रॉनी कैपिटलिज्म’ (सांठगांठ वाली पूंजीवादी व्यवस्था) है। आज चुनाव लड़ना इतना महंगा हो चुका है कि एक ईमानदार और मध्यमवर्गीय नागरिक इसके बारे में सोच भी नहीं सकता। पार्टियां कॉर्पोरेट घरानों से गुप्त चुनावी बॉन्ड या अन्य माध्यमों से हजारों करोड़ रुपये चंदा लेती हैं और सत्ता में आने के बाद उन्हीं कॉर्पोरेट्स के हितों के लिए नीतियां बनाती हैं।

इंद्रजीत गुप्त समिति (१९९८) ने चुनाव के लिए सरकारी फंडिंग की सिफारिश की थी। यदि सरकार खुद उम्मीदवारों को एक निश्चित दायरा तय करके संसाधन (जैसे मीडिया समय, गाड़ियां, पेट्रोल आदि) उपलब्ध कराए और निजी चंदे पर पूरी तरह रोक लगा दे, तो धनबल का खेल खत्म हो जाएगा। लेकिन सरकार इस दिशा में रत्ती भर भी उत्सुक नहीं है, क्योंकि मौजूदा चुनावी व्यवस्था में भारी-भरकम पूंजी ही उनकी सत्ता की सबसे बड़ी ढाल है।

### ३. राइट टू रिकॉल (Recall का अधिकार)

लोकतंत्र का मतलब सिर्फ पांच साल में एक बार वोट देना नहीं होना चाहिए। यदि कोई चुना हुआ प्रतिनिधि अपने वादों से मुकर जाता है, भ्रष्टाचार में लिप्त पाया जाता है या अपने क्षेत्र की जनता की उपेक्षा करता है, तो जनता के पास उसे कार्यकाल के बीच में ही पद से हटाने का अधिकार होना चाहिए। भारत के कुछ राज्यों में स्थानीय निकायों (जैसे पंचायतों) में यह नियम कागजों पर है, लेकिन इसे लोकसभा या विधानसभा स्तर पर लागू करने से हर नेता डरता है। यदि यह अधिकार आ जाए, तो नेताओं का जनता के प्रति जवाबदेह होना उनकी मजबूरी बन जाएगा, न कि कोई एहसान।

## ‘शातिर और सजावटी सक्रियता’ का अंतर्निहित एजेंडा

सरकार की इस पूरी कवायद को ‘शातिर’ और ‘सजावटी’ क्यों कहा जा रहा है, इसे तीन रणनीतिक कोणों से समझा जा सकता है:

> **१. ध्यान भटकाने की कला (Diversionary Tactics):** जब देश बेरोजगारी, महंगाई, आर्थिक असमानता और गिरते हुए लोकतांत्रिक सूचकांकों जैसे वास्तविक संकटों से जूझ रहा होता है, तब ‘एक राष्ट्र एक चुनाव’ या ‘नया परिसीमन’ जैसे भव्य और जटिल विमर्शों को सामने ला दिया जाता है। मीडिया और बुद्धिजीवी इन विषयों पर अंतहीन बहसों में उलझ जाते हैं और सरकार बुनियादी सवालों के कटघरे से बच निकलती है।

> **२. सत्ता का अति-केंद्रीकरण (Hyper-Centralization):** जितने भी सुधार सरकार द्वारा प्रस्तावित हैं, उन सभी का एक सामान्य गुणसूत्र (Common DNA) है—सत्ता को केंद्र की ओर खींचना। एक साथ चुनाव कराने से राज्यों की स्वायत्तता कमजोर होती है, परिसीमन से क्षेत्रीय संतुलन बिगड़ता है। यह विविधता वाले देश को एक सिंगल-विंडो कमांड सिस्टम में बदलने की शातिर कोशिश है।

> **३. लोकलुभावनवाद का आवरण (Populist Facade):** महिला आरक्षण जैसे कदमों को इस तरह पेश किया जाता है मानो सरकार से बड़ा कोई प्रगतिशील मसीहा नहीं है। लेकिन इसके भीतर छिपी शर्तों के कारण यह केवल एक सजावटी घोषणा बनकर रह जाता है, जिसका राजनीतिक लाभ तुरंत ले लिया जाता है, लेकिन वास्तविक परिणाम दशकों दूर होते हैं।

## एक वास्तविक सुधार एजेंडे की आवश्यकता

यदि हमें भारत को वास्तव में एक परिपक्व लोकतंत्र बनाना है, तो सुधारों का रुख ‘शीर्ष से नीचे’ (Top-Down) होने के बजाय ‘नीचे से ऊपर’ (Bottom-Up) होना चाहिए। इसके लिए निम्नलिखित कदम अनिवार्य हैं:

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| **शीर्ष नेतृत्व की जवाबदेही** | असीमित कार्यकाल, व्यक्ति-पूजा और केंद्रीकृत निर्णय प्रक्रिया। | प्रधानमंत्री पद के लिए अधिकतम २ या ३ कार्यकाल की वैधानिक सीमा तय करना। |

| **चुनावी पारदर्शिता** | अपारदर्शी चंदा प्रणाली और कॉरपोरेट-राजनीतिक गठजोड़ का प्रभुत्व। | पूर्णतः राज्य द्वारा पोषित चुनाव (State Funding) और कॉरपोरेट चंदे पर पूर्ण प्रतिबंध। |

| **प्रतिनिधित्व की गुणवत्ता** | केवल संख्यात्मक वृद्धि (परिसीमन) और प्रतीकात्मक आरक्षण। | संसद के भीतर आंतरिक लोकतंत्र, दागी सांसदों की तत्काल बर्खास्तगी और ‘राइट टू रिकॉल’। |

| **संस्थागत स्वतंत्रता** | चुनाव आयोग, सीबीआई, ईडी जैसी संस्थाओं पर वैचारिक नियंत्रण का आरोप। | इन संस्थाओं के प्रमुखों की नियुक्ति के लिए पूरी तरह निष्पक्ष और बहु-सदस्यीय कोलेजियम व्यवस्था। |

##  लोकतंत्र के मर्म को बचाने की चुनौती

राजनीतिक सुधार किसी भी जीवंत लोकतंत्र की अनिवार्य प्रक्रिया हैं। समय के साथ नियमों और संरचनाओं में बदलाव होना चाहिए। लेकिन जब सुधारों का उद्देश्य लोकतंत्र को मजबूत करने के बजाय सत्ताधारी दल के राजनीतिक नियंत्रण को मजबूत करना बन जाए, तो वे सुधार नहीं बल्कि ‘रणनीतिक पैंतरेबाज़ी’ कहलाते हैं।

वर्तमान निजाम द्वारा पैदा की गई राजनीतिक सुधारों की यह ‘हवा’ दरअसल एक भ्रमजाल है। आम जनता में इन सुधारों के प्रति कोई उत्साह न होना यह साबित करता है कि जनता सत्ता की इस सजावटी सक्रियता को अंदर ही अंदर समझ रही है। जनता को नए संसद भवन की बड़ी दीर्घाओं या एक साथ होने वाले चुनावों से उतना सरोकार नहीं है, जितना इस बात से है कि उनका चुना हुआ प्रतिनिधि उनके प्रति कितना ईमानदार है।

जब तक हम प्रधानमंत्री जैसे शक्तिशाली पदों की समय-सीमा तय करके निरंकुशता के अंदेशे को समाप्त नहीं करते, जब तक हम चुनावों से धनबल के प्रभाव को खत्म करके एक आम नागरिक के लिए राजनीति के दरवाजे नहीं खोलते, और जब तक हम नेताओं को पांच साल के एकाधिकार के बजाय हर दिन जवाबदेह बनाने वाला ‘राइट टू रिकॉल’ नहीं लाते—तब तक हर राजनीतिक सुधार केवल एक सजावटी मुखौटा ही रहेगा। असली लोकतांत्रिक सुधार वही है जो जनता को सशक्त करे, न कि केवल सत्ता के संचालन को और अधिक शातिर व आसान बनाए।

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