## वैचारिक द्वंद्व का नया धरातल
21वीं सदी के तीसरे दशक में भारतीय राजनीति एक अभूतपूर्व मोड़ पर खड़ी है। स्वतंत्रता के बाद के शुरुआती दशकों में जहां ‘विविधता में एकता’ को भारत का मूल मंत्र माना गया, वहीं समकालीन दौर में सत्ता का झुकाव ‘एकतत्व और एकरूपता’ की ओर अधिक दिखाई देता है। वर्तमान केंद्र सरकार द्वारा आगे बढ़ाया जा रहा **’एक देश, एक चुनाव’ (One Nation, One Election)** का नारा केवल एक प्रशासनिक या वित्तीय सुधार का प्रस्ताव मात्र नहीं है; यह वास्तव में भारतीय गणराज्य के मूल चरित्र को बदलने की एक दीर्घकालिक वैचारिक परियोजना है।
यह परियोजना उस ऐतिहासिक विमर्श के ठीक विपरीत खड़ी है, जिसे कभी वी. पी. सिंह, ज्योति बसु, और एम. करुणानिधि जैसे नेताओं ने सींचा था। उनका मानना था कि भारत की विविधता ही उसकी ताकत है और क्षेत्रीय दलों का व्यापक प्रस्फुटन इस विविधता की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। आज, जब केंद्र सरकार एकरूपता की दिशा में बढ़ रही है, तब स्वायत्तता, संघवाद और लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण को लेकर एक गहरा विरोधाभास सतह पर आ गया है।
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## एक देश, एक चुनाव’ – प्रशासनिक सुविधा या विविधता पर प्रहार?
‘एक देश, एक चुनाव’ के पक्ष में सरकार का मुख्य तर्क यह है कि बार-बार होने वाले चुनावों से विकास कार्य बाधित होते हैं, आदर्श आचार संहिता के कारण नीतिगत पंगुता (Policy Paralysis) आती है और सरकारी खजाने पर भारी वित्तीय बोझ पड़ता है। सरकार इसे ‘सहज शासन’ (Smooth Governance) की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम मानती है।
### विरोधाभास और क्षेत्रीय आशंकाएं
लॉ कमीशन और उच्च स्तरीय समितियों (जैसे पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली समिति) के प्रस्तावों के आलोक में जब इस विधेयक के राजनीतिक निहितार्थों को देखा जाता है, तो इसके पीछे छिपी ‘समानतावादी’ (Homogenizing) सोच उजागर होती है। इसके विरुद्ध मुख्य आपत्तियां निम्नलिखित हैं:
* **स्थानीय मुद्दों का राष्ट्रीयकरण:** यदि लोकसभा और सभी राज्यों के विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जाते हैं, तो राष्ट्रीय स्तर की लहर या बड़े नैरेटिव के सामने राज्यों के स्थानीय मुद्दे (जैसे पानी, बिजली, स्थानीय रोजगार, भाषाई अस्मिता) दब जाएंगे। वोटर राष्ट्रीय और प्रादेशिक मुद्दों में अंतर नहीं कर पाएगा, जिसका सीधा नुकसान क्षेत्रीय दलों को होगा।
* **संविधान के बुनियादी ढांचे से छेड़छाड़:** इस व्यवस्था को लागू करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 83 (संसद के सदनों की अवधि) और अनुच्छेद 172 (राज्य विधानसभाओं की अवधि) सहित कई प्रावधानों में संशोधन करना होगा। यदि कोई राज्य सरकार बीच में गिर जाती है, तो वहां राष्ट्रपति शासन लगाना होगा या शेष बची अवधि के लिए ही चुनाव कराने होंगे, जो कि विधानसभा के 5 वर्ष के लोकतांत्रिक अधिकार का हनन है।
* **त्रिशंकु स्थिति का डर:** कांशीराम की वह स्थापना याद कीजिए जहां वे ‘मजबूर केंद्र’ को बहुजनों के हित में मानते थे। ‘एक देश, एक चुनाव’ का यह ढांचा अंततः एक राजनीतिक एकाधिकार को जन्म दे सकता है, जहां क्षेत्रीय संतुलन बनाने की राज्यों की शक्ति समाप्त हो जाएगी।
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## सहकारी संघवाद का क्षरण – दिल्ली मॉडल और राजपालों की सक्रियता
सबसे चिंताजनक और व्यावहारिक पहलू वह है जहां संघवाद को केवल कागजों पर समेटने की कोशिशें दिखती हैं। विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों में केंद्र सरकार और राज्यों के बीच का टकराव अब प्रशासनिक शिष्टाचार की सीमाएं लांघ चुका है।
### दिल्ली: एक निर्वाचित सरकार को पंगु बनाने का प्रयोग
अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार के बीच का विवाद इस बात का सटीक उदाहरण है कि कैसे ‘मनमाने प्रावधानों’ के जरिए एक चुनी हुई सरकार की शक्तियों को सीमित किया गया।
* उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने स्पष्ट फैसला दिया था कि पुलिस, भूमि और लोक व्यवस्था (Public Order) को छोड़कर सेवाओं (Services) पर नियंत्रण निर्वाचित सरकार का होगा।
* परंतु, केंद्र सरकार ने अध्यादेश और बाद में संसद के माध्यम से **’राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (संशोधन) अधिनियम’** पारित कर नौकरशाही पर अंतिम नियंत्रण उपराज्यपाल (LG) को सौंप दिया।
* यह कदम इस विरोधाभास को पुख्ता करता है कि जहां एक तरफ ‘एक चुनाव’ की बात हो रही है, वहीं दूसरी तरफ यदि कोई क्षेत्रीय या गैर-काल्पनिक दल चुनाव जीत भी जाता है, तो उसकी विधायी शक्तियों को संस्थागत रूप से पंगु (Crippled) कर दिया जाता है।
### ख. केरल, तमिलनाडु और पंजाब: राजपालों के माध्यम से विधायी वीटो
दक्षिण और उत्तर के राज्यों में राजपालों (Governors) की भूमिका एक स्वतंत्र संवैधानिक प्रमुख के बजाय केंद्र के ‘राजनीतिक एजेंट’ के रूप में अधिक दिखाई देने लगी है।
* **केरल, तमिलनाडु और पंजाब** की सरकारों द्वारा जनहित या शिक्षा सुधारों को लेकर पारित किए गए विधेयकों को राज्यपालों द्वारा महीनों या सालों तक रोके रखा गया या उन्हें राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रख लिया गया।
* स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि पंजाब और तमिलनाडु की सरकारों को उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ा। देश के प्रधान न्यायाधीश को कड़ी टिप्पणी करनी पड़ी कि *”राज्यपाल यह न भूलें कि वे जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि नहीं हैं।”*
* राजपालों के माध्यम से चुनी हुई सरकारों को विफल करने की यह प्रवृत्ति **उच्चतम न्यायालय और राष्ट्रपति भवन (केंद्र सरकार की सलाह पर कार्य करने वाली संस्था)** को एक अदृश्य आमने-सामने की स्थिति में खड़ा कर देती है, जिससे संवैधानिक संतुलन बिगड़ता है।
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## पौराणिक आडंबरों के प्रति मुग्धता बनाम व्यावहारिक वास्तविकता
एक तरफ सरकार प्रशासनिक आधुनिकता और डिजिटल इंडिया का दावा करती है, वहीं दूसरी तरफ उसकी राजनीतिक भाषा और प्रतीकों में **पौराणिक आडंबरों के प्रति एक गहरी मुग्धता (Obsession)** दिखाई देती है।
### सेंगोल से लेकर चक्रवर्ती सम्राट तक का नैरेटिव
* नए संसद भवन के उद्घाटन के समय **’सेंगोल’ (राजदंड)** की स्थापना को जिस तरह से प्रचारित किया गया, वह आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों के बजाय मध्यकालीन राजशाही के प्रतीकों को महिमामंडित करने जैसा था। सेंगोल ‘दैवीय अधिकार’ और राजा के शासन का प्रतीक है, न कि जनता की संप्रभुता का।
* राजनीतिक विमर्श में ‘चक्रवर्ती सम्राट’ या अखंड भारत की जो सांस्कृतिक कल्पनाएं पेश की जा रही हैं, वे आधुनिक बहुसांस्कृतिक और बहु-भाषाई भारत की वास्तविकताओं से कोसों दूर हैं।
### वास्तविकता के प्रति ग़फ़लत (Neglect of Reality)
यह मुग्धता सरकार के भीतर एक ऐसी व्यावहारिक नजरिये की कमी (Lack of Pragmatism) को दर्शाती है, जो देश की विविधता को एक समस्या या कमजोरी के रूप में देखती है, जिसे ठीक करने की जरूरत है। राहुल गांधी के उस हालिया नैरेटिव (INDIA गठबंधन के संदर्भ में) को यहां देखा जा सकता है, जो कहता है कि भारत किसी एक सम्राट का साम्राज्य नहीं, बल्कि **”राज्यों का एक संघ” (Union of States)** है। जब केंद्र सरकार पौराणिक एकरूपता के नैरेटिव में खोई रहती है, तो वह भूल जाती है कि तमिलनाडु की भाषाई अस्मिता या केरल का सामाजिक मॉडल देश के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है जितना दिल्ली का सत्ता केंद्र।
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## संघवाद की पुनर्स्थापना की आवश्यकता
‘एक देश, एक चुनाव’ का प्रस्तावित विधेयक केवल तारीखों को मिलाने का प्रयास नहीं है, बल्कि यह भारत के राजनीतिक मानचित्र को एकरंगी बनाने की कोशिश है। जैसा कि इतिहास में वी. पी. सिंह और अन्य नेताओं ने रेखांकित किया था, भारत की विविधता को दबाने का कोई भी प्रयास अंततः असंतोष को जन्म देता है।
दिल्ली सरकार को पंगु बनाना या राज्यपालों के जरिए राज्यों के विधेयकों को रोकना यह साबित करता है कि सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। भारत को इस समय ‘चक्रवर्ती’ सोच की नहीं, बल्कि ‘सहकारी संघवाद’ की व्यावहारिक समझ की आवश्यकता है, जहां हर राज्य, हर क्षेत्रीय दल और हर अनूठी आवाज को देश के विकास में बराबर का भागीदार माना जाए। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो एकरूपता लाने की यह ज़िद भारत के लोकतांत्रिक ताने-बाने को अपूरणीय क्षति पहुंचा सकती है।
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केंद्र में मजबूत सरकार का दर्शन बहुजन विरोधी -कांसीराम
#### *व्यावहारिक और परिणाम-उन्मुख दृष्टिकोण**
कांशीराम की गठबंधन सरकारों और क्षेत्रीय दलों से जुड़ी राजनीतिक धारणा विशुद्ध रूप से **”व्यावहारिक और परिणाम-उन्मुख”** थी। उनका दृष्टिकोण किसी पारंपरिक वैचारिक आदर्शवाद या प्रशासनिक सुगमता से नहीं, बल्कि हाशिए पर खड़े बहुजन समाज (दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक) के वास्तविक सशक्तिकरण से प्रेरित था।
#### “मजबूर सरकार” बनाम “मजबूत सरकार”**
कांशीराम का एक बहुत ही चर्चित और बेबाक नारा था—**”मजबूत सरकार नहीं, मजबूर सरकार चाहिए।”** उनका स्पष्ट मानना था कि जब भी केंद्र या राज्य में किसी एक राष्ट्रीय दल को पूर्ण बहुमत मिलता है, तो सत्ता निरंकुश और अहंकारी हो जाती है। ऐसी ‘मजबूत सरकारें’ बहुजन समाज की आकांक्षाओं को दबा देती हैं और उन्हें सत्ता में उनकी सही हिस्सेदारी नहीं देतीं।
#### *गठबंधन: मोलभाव और किंगमेकर बनने का अवसर**
इसके विपरीत, त्रिशंकु संसद या कमजोर गठबंधन सरकारों को वे एक ऐतिहासिक अवसर के रूप में देखते थे। उनका तर्क था कि जब राष्ट्रीय दल बहुमत के लिए क्षेत्रीय और छोटे दलों पर निर्भर होंगे, तब वे ‘मजबूर’ होंगे। इसी राजनीतिक मजबूरी का लाभ उठाकर शोषित समाज किंगमेकर की भूमिका में आ सकता है, सत्ता में अपनी शर्तें मनवा सकता है और नीतियों को अपने हक में मोड़ सकता है।
उत्तर प्रदेश में समय-समय पर किए गए उनके राजनीतिक प्रयोग इसी व्यावहारिक नजरिए का प्रमाण थे, जिसने देश के पारंपरिक सत्ता समीकरणों को हमेशा के लिए बदलकर रख दिया था।






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