उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनावी समीकरण केवल जातियों की गिनती से नहीं बनते, उनके पीछे चलने वाली मनोवैज्ञानिक धाराओं से भी बनते हैं। यही वजह है कि समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव का अपने चर्चित PDA—पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक समीकरण में ‘P’ की एक नई व्याख्या तलाशना महज शब्दों का खेल नहीं माना जा सकता। ‘P’ को पिछड़े के साथ-साथ पंडित से जोड़ने की कोशिश दरअसल उस राजनीतिक बेचैनी का संकेत है जिसमें 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद समाजवादी पार्टी ने अपने लिए बने सामाजिक गठजोड़ को विधानसभा चुनाव के लिए फिर से परिभाषित करने की जरूरत महसूस की है।
अखिलेश यादव ने जब PDA का नारा गढ़ा था तो उसमें एक स्पष्ट राजनीतिक रणनीति थी। पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक—तीनों समूहों को एक साझा राजनीतिक छतरी के नीचे लाने की कोशिश। यह सामाजिक समीकरण जितना आकर्षक था, उतना ही सामान्य वर्ग के एक हिस्से को स्वाभाविक रूप से असहज करने वाला भी। लेकिन तब अखिलेश के सामने सवाल यह नहीं था कि सामान्य वर्ग नाराज होगा या नहीं, बल्कि यह था कि यदि सामान्य वर्ग का एक हिस्सा नाराज होता है तो क्या PDA के तीनों घटक उससे अधिक मजबूती से एकजुट होंगे?
यह जोखिम उन्होंने जानबूझकर उठाया था।
राजनीति में कभी-कभी किसी एक सामाजिक समूह की नाराजगी दूसरे समूह के भीतर एकता पैदा करने का माध्यम बनती है। अखिलेश को शायद यही गणित अनुकूल लग रहा था। सामान्य वर्ग जितना PDA को अपने विरुद्ध समझेगा, पिछड़े, दलित और मुसलमान उतना ही अपने लिए उसे सुरक्षा कवच मानेंगे। बहुमत की राजनीति में यही अंकगणित निर्णायक हो सकता है।
लेकिन अब परिस्थिति बदलती दिखाई दे रही है।
PDA के पुराने गणित में दरार की आशंका
2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को दलित मतदाताओं का जो अप्रत्याशित समर्थन मिला, उसने उत्तर प्रदेश की राजनीति के समीकरणों को हिला दिया। बसपा के परंपरागत मतदाताओं के एक हिस्से ने सपा-कांग्रेस गठबंधन का साथ दिया और सपा को लोकसभा में प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी बनने में मदद मिली।
लेकिन विधानसभा चुनाव लोकसभा चुनाव की हूबहू पुनरावृत्ति नहीं होते। स्थानीय उम्मीदवार, जातीय समीकरण, सरकार के प्रति स्थानीय असंतोष, कानून-व्यवस्था, कल्याणकारी योजनाओं का लाभ और सबसे बढ़कर बहुजन राजनीति की अपनी स्मृतियां विधानसभा में कहीं ज्यादा असर डालती हैं।
अखिलेश यादव को शायद यही एहसास हो रहा है कि दलित मतदाताओं का 2024 वाला व्यापक स्थानांतरण स्थायी नहीं है। दलित समाज का एक बड़ा हिस्सा अभी भी मायावती की राजनीतिक विरासत से पूरी तरह मुक्त नहीं हुआ है। बहन जी की राजनीतिक चमक भले पहले जैसी न रही हो, लेकिन उसका आधार समाप्त नहीं हुआ है। विधानसभा चुनाव में यह आधार बसपा के लिए फिर सक्रिय हो सकता है।
यानी 2024 में मिला दलित समर्थन सपा के लिए स्थायी संपत्ति है या परिस्थितिजन्य निवेश—इस सवाल का जवाब अभी बाकी है।
और यहीं से अखिलेश के सामने पहला संकट पैदा होता है।
पिछड़ों का भरोसा भी उतना सरल नहीं रहा
PDA की दूसरी धुरी पिछड़ा वर्ग है। लेकिन यहां भी समाजवादी पार्टी के सामने चुनौती कम नहीं है।
मंडल राजनीति के दौर का पिछड़ा वर्ग आज वैसा नहीं है जैसा मुलायम सिंह यादव के समय था। पिछड़े वर्ग के भीतर आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर भारी परिवर्तन हुआ है। अनेक पिछड़ी जातियों के भीतर सामाजिक उन्नयन की आकांक्षा बढ़ी है। एक बड़ा वर्ग अब केवल आरक्षण और सामाजिक न्याय की भाषा से संतुष्ट नहीं है। वह सत्ता, प्रतिष्ठा, धार्मिक पहचान और सामाजिक हैसियत के दूसरे प्रतीकों की तरफ भी आकर्षित है।
इसे केवल जातीय राजनीति से समझना भूल होगी।
हिंदुत्व की राजनीति ने पिछड़ी जातियों के एक बड़े हिस्से को अपने सामाजिक-सांस्कृतिक विमर्श में समाहित किया है। धर्म का प्रभाव इतना गहरा हुआ है कि अनेक पिछड़ी जातियों के बीच कर्मकांड, धार्मिक आयोजन और मंदिर-केंद्रित सार्वजनिक पहचान अब राजनीतिक अभिव्यक्ति का हिस्सा बन चुके हैं।
यह समाजवादी पार्टी के लिए गंभीर चुनौती है।
अखिलेश यादव को यह दिखाई दे रहा होगा कि यदि पिछड़ा वर्ग का एक बड़ा हिस्सा सांस्कृतिक रूप से भाजपा के साथ अपनी निकटता महसूस करता है तो केवल ‘सामाजिक न्याय’ की भाषा के सहारे उसे लगातार अपने साथ रखना आसान नहीं होगा। और यदि समाजवादी पार्टी इस प्रवृत्ति का प्रतिरोध करती है तो उसे भाजपा के उस सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से मुकाबला करना होगा जिसकी जड़ें गांव और कस्बों तक फैल चुकी हैं।
इस रास्ते पर चलते हुए समाजवादी पार्टी कहीं भाजपा के मैदान में ही उससे मुकाबला करने के लिए मजबूर न हो जाए—यह आशंका भी वास्तविक है।
PDA का ‘A’ भी पहले जैसा नहीं
PDA का ‘A’ यानी अल्पसंख्यक वर्ग समाजवादी पार्टी का सबसे भरोसेमंद आधार माना जाता रहा है। लेकिन राजनीति में स्थायी वोट बैंक जैसी कोई चीज नहीं होती।
मुस्लिम मतदाता भाजपा के विरुद्ध सबसे प्रभावी राजनीतिक विकल्प को समर्थन देने की रणनीति अपनाते रहे हैं। उत्तर प्रदेश में लंबे समय तक यह विकल्प समाजवादी पार्टी रही। लेकिन अब मुस्लिम समाज के भीतर भी यह सवाल उठता है कि जिस समय मुस्लिम नेताओं और संस्थानों पर कार्रवाई हुई, उस समय सपा ने कितना राजनीतिक जोखिम उठाया?
आजम खान का प्रकरण हो, मुख्तार अंसारी का मामला हो अथवा मुस्लिम राजनीतिक-सामाजिक नेतृत्व पर सरकार की कार्रवाइयां—समाजवादी पार्टी ने विरोध तो किया, लेकिन उसके विरोध की तीव्रता को लेकर मुस्लिम समाज के भीतर अलग-अलग राय रही है।
रामपुर की जौहर यूनिवर्सिटी के मामले में पार्टी ने जरूर खुलकर मोर्चा लिया, लेकिन व्यापक राजनीतिक नैरेटिव में यह धारणा भी बनी कि सपा ने मुस्लिम समाज के खिलाफ हो रही कार्रवाई का वैसा प्रतिकार नहीं किया जैसा उससे अपेक्षित था।
राजनीति में धारणा कई बार वास्तविकता से अधिक शक्तिशाली होती है।
यदि मुस्लिम मतदाता के भीतर यह धारणा बैठने लगे कि सपा भाजपा के विरुद्ध पर्याप्त आक्रामक नहीं है तो उसके राजनीतिक भरोसे में दरार आ सकती है। यही कारण है कि अखिलेश के लिए मुस्लिम समर्थन को स्वतःस्फूर्त और स्थायी मान लेना अब पहले जितना सुरक्षित नहीं होगा।
मुलायम की विरासत और उठते असहज सवाल
समाजवादी राजनीति की दूसरी बड़ी चुनौती उसके अपने अतीत से भी जुड़ी है।
मुलायम सिंह यादव ने जीवन भर भाजपा की राजनीति का विरोध किया, लेकिन संसद में नरेंद्र मोदी के दोबारा प्रधानमंत्री बनने की शुभकामना देने वाली उनकी चर्चित टिप्पणी ने वर्षों से राजनीतिक विमर्श में एक सवाल जरूर छोड़ा। बाद में उन्हें मरणोपरांत पद्म सम्मान दिए जाने से भी राजनीतिक चर्चाओं को नया आधार मिला।
यहां तथ्य और राजनीतिक व्याख्या अलग-अलग चीजें हैं। पद्म सम्मान को किसी राजनीतिक सौदे का प्रमाण मानना उचित नहीं होगा। लेकिन राजनीति में सवाल हमेशा प्रमाण से नहीं, धारणा से भी पैदा होते हैं।
समाजवादी पार्टी के सामने अब यह चुनौती है कि भाजपा के साथ उसके संबंधों को लेकर पैदा होने वाली किसी भी आशंका को वह कैसे समाप्त करे।
इसी क्रम में सपा सरकार के खिलाफ पूर्व में गठित जांचों का ठंडे बस्ते में चले जाना भी राजनीतिक चर्चाओं को हवा देता है। विरोधी इसे अपने-अपने ढंग से व्याख्यायित करते हैं। सपा के लिए मुश्किल यह है कि ऐसी चर्चाओं का स्पष्ट राजनीतिक उत्तर उसके पास होना चाहिए।
अब ‘पंडित’ क्यों याद आए?
इसी पृष्ठभूमि में PDA में ‘P’ को ‘पंडित’ से जोड़ना महत्वपूर्ण हो जाता है।
ब्राह्मण समाज का एक वर्ग योगी आदित्यनाथ सरकार से असंतुष्ट बताया जाता है। विभिन्न अवसरों पर ब्राह्मणों की नाराजगी की चर्चाएं उठती रही हैं। विकास दुबे के एनकाउंटर के बाद भी ब्राह्मण असंतोष का मुद्दा खूब उछला था।
लेकिन सवाल यह है कि नाराजगी और राजनीतिक स्थानांतरण में कितना अंतर है?
2022 के विधानसभा चुनाव ने दिखाया था कि असंतोष की चर्चाओं के बावजूद ब्राह्मण मतदाताओं का बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ बना रहा। इसलिए केवल यह मान लेना कि भाजपा से नाराज ब्राह्मण स्वतः समाजवादी पार्टी के साथ आ जाएगा, एक राजनीतिक अतिसरलीकरण होगा।
फिर भी अखिलेश का प्रयास महत्वहीन नहीं है।
राजनीति में पांच प्रतिशत मत भी कई बार पांच सीटों को पचास सीटों में बदल देते हैं और एक प्रतिशत का मामूली बदलाव कई बार सत्ता का पूरा समीकरण बदल देता है। इसलिए भाजपा के सामाजिक गठबंधन में संभावित दरारों की तलाश करना किसी भी विपक्षी दल की स्वाभाविक रणनीति है।
लेकिन असली खतरा ब्राह्मणों से ज्यादा पिछड़ों का है
अखिलेश के इस नए प्रयोग में सबसे बड़ा जोखिम शायद ब्राह्मणों को जोड़ने में नहीं, बल्कि अपने पुराने सामाजिक आधार को असहज करने में है।
यदि ‘पंडित’ को PDA के ‘P’ का नया राजनीतिक विस्तार इस तरह प्रस्तुत किया गया कि इससे पिछड़े वर्ग को लगे कि समाजवादी पार्टी अपने मूल सामाजिक न्याय के एजेंडे से पीछे हट रही है, तो नुकसान अपेक्षा से बड़ा हो सकता है।
विशेषकर पिछड़े वर्ग का वह अधिक रेडिकल हिस्सा, जिसने सपा को इसलिए स्वीकार किया था क्योंकि उसे भाजपा के सामाजिक-सांस्कृतिक वर्चस्व के मुकाबले अपनी राजनीतिक जगह यहां अधिक सुरक्षित दिखती थी, वह असमंजस में पड़ सकता है।
अखिलेश के सामने इसलिए बहुत महीन संतुलन है।
उन्हें ब्राह्मणों को संदेश देना है कि सपा केवल पिछड़ों और मुसलमानों की पार्टी नहीं है। साथ ही पिछड़ों को यह भरोसा भी दिलाना है कि पंडितों की ओर बढ़ता कदम उनके हिस्से की राजनीतिक जमीन कम नहीं करेगा।
यानी एक तरफ नया घर बनाना है और दूसरी तरफ पुराना घर गिरने नहीं देना है।
माता प्रसाद पांडेय का प्रयोग भी इसी रणनीति का हिस्सा था
समाजवादी पार्टी ने पहले ही सामान्य वर्ग के बीच राजनीतिक संकेत देने शुरू कर दिए थे। माता प्रसाद पांडेय को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाना इसी क्रम में देखा गया।
यह फैसला केवल संगठनात्मक या विधायी आवश्यकता के रूप में देखने की बजाय सामाजिक संकेत के रूप में भी पढ़ा गया। सपा नेतृत्व शायद यह संदेश देना चाहता था कि PDA का अर्थ सवर्ण-विरोध नहीं है और पार्टी के भीतर ब्राह्मण नेतृत्व के लिए भी पर्याप्त जगह है।
लेकिन राजनीति में प्रतीक तभी प्रभावी होते हैं जब उनके पीछे लगातार दिखाई देने वाली राजनीतिक दिशा हो।
एक नियुक्ति से धारणा बदलती है, लेकिन स्थायी राजनीतिक विश्वास कई चुनावों में बनता है।
कांग्रेस क्यों जरूरी हो गई है?
इसीलिए अखिलेश यादव के लिए कांग्रेस का साथ भी अब पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का संगठनात्मक प्रभाव भले सीमित हो, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी की राजनीति ने दलितों और मुसलमानों के बीच एक वैकल्पिक राजनीतिक भरोसा पैदा किया। संविधान और आरक्षण की रक्षा का नैरेटिव कांग्रेस के पक्ष में गया।
समाजवादी पार्टी के लिए कांग्रेस का साथ इसलिए महज सीटों का गणित नहीं है।
यह सामाजिक आश्वासन का भी प्रश्न है।
कांग्रेस के साथ रहने से मुस्लिम मतदाता को यह संदेश जाता है कि भाजपा के विरुद्ध व्यापक विपक्षी मोर्चा कायम है। दलित मतदाता के लिए भी कांग्रेस का साथ एक अतिरिक्त सुरक्षा-रेखा का काम कर सकता है। और सपा के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कांग्रेस के साथ रहने से वह अपने ऊपर लगने वाले किसी ‘एक जातीय या सामुदायिक दल’ के आरोप को कमजोर कर सकती है।
यानी कांग्रेस अखिलेश के लिए चुनावी सहयोगी से कहीं अधिक, सामाजिक संतुलन का उपकरण बन सकती है।
अखिलेश की असली दुविधा
अखिलेश यादव के सामने आज जो दुविधा है, उसका सार यही है कि 2024 ने उन्हें बहुत कुछ दिया, लेकिन उसी सफलता ने विधानसभा चुनाव के लिए उनकी रणनीति को और कठिन बना दिया।
लोकसभा में भाजपा को रोकने के लिए जिस व्यापक सामाजिक असंतोष ने काम किया, वह विधानसभा में उसी अनुपात में सपा के पक्ष में स्थायी रूप से स्थानांतरित हो जाएगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है।
दलित मायावती की तरफ लौट सकते हैं।
पिछड़ों का एक हिस्सा भाजपा के साथ बना रह सकता है।
मुसलमानों में सपा के प्रति भरोसे पर सवाल उठ सकते हैं।
ब्राह्मणों को भाजपा से नाराजगी हो सकती है, लेकिन नाराजगी सपा के समर्थन में बदलना जरूरी नहीं।
और कांग्रेस के बिना इन सभी सामाजिक समूहों को एक साथ साधना सपा के लिए और कठिन हो सकता है।
यही कारण है कि अखिलेश अब अपने राजनीतिक प्रयोगों का दायरा बढ़ा रहे हैं।
राजनीति में पांसा फेंकना जरूरी है, मगर दांव समझकर
राजनीति आखिर जोखिम का ही खेल है। कोई भी नेता अपने मौजूदा समीकरण को अजेय मानकर हमेशा नहीं बैठ सकता। यदि उसे लगता है कि उसके सामाजिक गठबंधन में दरार पड़ रही है तो नए सामाजिक समूहों की ओर हाथ बढ़ाना जरूरी हो जाता है।
अखिलेश यादव का ‘पंडित’ वाला पांसा भी इसी कोशिश का हिस्सा है।
सवाल यह नहीं है कि उन्होंने पंडितों की ओर हाथ बढ़ाकर गलती की या नहीं। सवाल यह है कि क्या वे इस हाथ को बढ़ाते हुए अपने पिछड़े आधार को यह भरोसा दिला पाएंगे कि उनकी मूल राजनीति बदली नहीं है?
क्योंकि अगर ब्राह्मण उनके साथ नहीं आए और पिछड़ों का एक हिस्सा भी उनसे दूर हो गया तो यह प्रयोग उलटा पड़ सकता है।
तब स्थिति वही हो सकती है जिसे राजनीति की भाषा में कहा जाता है—माया मिली न राम।
अखिलेश के सामने चुनौती केवल भाजपा से मुकाबला करने की नहीं है। उन्हें अपने पुराने सामाजिक गठजोड़ को नए सामाजिक विस्तार के साथ इस तरह जोड़ना है कि कोई वर्ग खुद को विस्थापित महसूस न करे।
PDA का अगला संस्करण इसलिए केवल P—पंडित जोड़ देने से नहीं बनेगा। उसे पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक और पंडित के बीच ऐसा राजनीतिक संतुलन बनाना होगा जिसमें कोई भी घटक दूसरे की कीमत पर शामिल होता हुआ न दिखे।
यही उनकी सबसे बड़ी परीक्षा है।
क्योंकि चुनावी राजनीति में नया वोट जोड़ना जितना जरूरी है, उससे कहीं ज्यादा जरूरी है—पुराना वोट न खोना।
और अखिलेश यादव के सामने आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि पंडितों की तलाश में कहीं पिछड़ों की अपनी गाँठ की पूंजी ही हाथ से न निकल जाए।







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