अगस्त 2026 के अंत में भारतीय राजनीति में एक बार फिर प्राचीन ग्रंथों का इस्तेमाल समकालीन सत्ता-संघर्ष का हथियार बन गया। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने पुणे में छात्राओं के बीच ‘छत्रों की गूंज’ कार्यक्रम में मनुस्मृति के एक प्रसिद्ध श्लोक का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि मनुस्मृति के अनुसार स्त्री को बचपन में पिता, यौवन में पति और पति की मृत्यु के बाद पुत्रों के अधीन रहना चाहिए; वह कभी स्वतंत्र नहीं हो सकती। इन शब्दों को ‘शर्मनाक’ बताते हुए उन्होंने महिलाओं से पितृसत्ता को तोड़ने और स्वयं के होने का आह्वान किया। जवाब में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ रायबरेली पहुँचे—राहुल गांधी के ही संसदीय क्षेत्र में—और मनु तथा भारतीय विरासत की रक्षा के स्वर में बोल पड़े। उन्होंने राहुल को अथर्ववेद, शतपथ ब्राह्मण और मत्स्य पुराण पढ़ने की सलाह दी, कहा कि काल-गणना मनु की देन है, और आरोप लगाया कि राहुल भारत की विरासत का अपमान कर रहे हैं तथा युवा पीढ़ी को ‘शहरी नक्सलियों’ के हाथों में सौंपना चाहते हैं।
यह विवाद सामान्य राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से कहीं आगे जाता है। योगी आदित्यनाथ गोरखनाथ मठ के महंत हैं—नाथ सम्प्रदाय की उस परंपरा के उत्तराधिकारी, जिसकी जड़ें मध्ययुगीन भारत की योगिक, समावेशी और रूढ़ि-विरोधी धारा में हैं। जब कोई नाथ परंपरा का प्रमुख मनुस्मृति की ‘ताईद’ में खड़ा होता है, तो सवाल सिर्फ राजनीतिक नहीं रह जाता। वह सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और दार्शनिक विरोधाभास बन जाता है। इस लेख में इसी विरोधाभास की पड़ताल की गई है।
नाथ परंपरा का ऐतिहासिक स्वभाव
गोरखनाथ और नाथ सम्प्रदाय की परंपरा को समझे बिना योगी जी की वर्तमान भूमिका को समझना मुश्किल है। गोरखनाथ (लगभग 11वीं-13वीं शताब्दी) मत्स्येन्द्रनाथ के शिष्य माने जाते हैं। उन्होंने हठयोग को व्यवस्थित रूप दिया और एक ऐसी साधना-धारा विकसित की जो जन्म-आधारित वर्ण-व्यवस्था से मुक्त थी। नाथ योगी कानफाटे या दरशनी कहलाते थे। वे समाज के विभिन्न स्तरों—किसान, जुलाहा, ग्वाला, दलित समुदायों—से आते थे। दीक्षा जाति नहीं, साधना और गुरु-कृपा पर आधारित थी। गोरखबानी और संबंधित रचनाओं में बार-बार ब्राह्मणवादी कर्मकांड, मंदिर-मस्जिद का भेद, बाहरी शास्त्रों की प्रधानता और जाति-पदानुक्रम की आलोचना मिलती है। “सब्द” (गुरु का शब्द) को वेद-शास्त्र-कुरान से ऊपर रखा गया। परंपरा “न हिंदू न मुसलमान, जोगी” की पहचान रखती थी। यह मध्ययुगीन भारत की उन लोक-धार्मिक धाराओं में से एक थी जो ब्राह्मणवादी वर्चस्व के विकल्प के रूप में उभरीं।
गोरखनाथ मठ में भी लंबे समय तक जाति-भेद कम प्रभावी रहा। प्रसाद बनाने वाले दलित रसोइए, विभिन्न जातियों के पुजारी और मुस्लिम जोगियों की उपस्थिति परंपरा की समावेशिता की याद दिलाती है। नाथ पंथ ने कभी मनुस्मृति जैसे धर्मशास्त्रों को आधिकारिक ग्रंथ के रूप में स्वीकार नहीं किया। वेद-स्मृति-पुराण को अंतिम प्रमाण मानने की बजाय आंतरिक योग-अनुभव और गुरु-वचन को केंद्र में रखा। वर्ण-व्यवस्था, ब्राह्मण श्रेष्ठता और स्त्रियों की अधीनता जैसे विचार—जो मनुस्मृति में विस्तार से आए हैं—नाथ दृष्टि से असंगत थे।
इस पृष्ठभूमि में जब गोरखनाथ मठ का वर्तमान महंत मनुस्मृति की रक्षा में खड़ा होता है, तो यह परंपरा के मूल स्वभाव से टकराव पैदा करता है। योगी जी ने राहुल गांधी को ग्रंथ पढ़ने की सलाह दी, लेकिन सवाल उठता है कि क्या स्वयं नाथ परंपरा के उत्तराधिकारी ने उस परंपरा के आंतरिक ग्रंथों और उसके जाति-विरोधी स्वभाव को उतना ही गंभीरता से पढ़ा है?
मनुस्मृति: पाठ, विवाद और प्रतीक
मनुस्मृति (मनुस्मृति या मानव धर्मशास्त्र) प्राचीन धर्मशास्त्रों में सबसे प्रभावशाली मानी जाती है। इसमें सृष्टि, वर्ण-व्यवस्था, आश्रम-धर्म, स्त्री-धर्म, राजा-धर्म और दंड-व्यवस्था का विस्तृत वर्णन है। कुछ श्लोक स्त्रियों की स्वतंत्रता को नकारते हैं, शूद्रों के लिए कठोर नियम तय करते हैं और ब्राह्मण को सर्वोच्च स्थान देते हैं। आधुनिक भारत में यह ग्रंथ जाति-प्रथा और पितृसत्ता का प्रतीक बन गया। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने 1927 में महाड़ में मनुस्मृति जलाई थी। संविधान निर्माताओं ने समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के आधार पर नया ढाँचा चुना।
यह भी सच है कि मनुस्मृति कभी पूरे भारत में समान रूप से लागू नहीं हुई। क्षेत्रीय रीति-रिवाज, अन्य स्मृतियाँ और व्यावहारिक जीवन अक्सर इसके आदर्शों से अलग रहे। कई विद्वान इसे ब्राह्मण आकांक्षाओं का आदर्श चित्रण मानते हैं, न कि वास्तविक प्रशासनिक संहिता। फिर भी, राजनीतिक विमर्श में यह ग्रंथ ‘सनातन’ और ‘विरासत’ का प्रतीक बन गया है। जो इसका बचाव करते हैं, वे अक्सर कहते हैं कि इसे संदर्भ में पढ़ा जाए, अच्छे पक्षों को अपनाया जाए और विकृत व्याख्याओं को नकारा जाए। जो इसकी आलोचना करते हैं, वे कहते हैं कि इसके केंद्रीय प्रावधान ही असमानता और अधीनता को वैध ठहराते हैं।
राहुल गांधी का उद्धरण सही है—श्लोक मौजूद है। लेकिन योगी जी का जवाब भी ध्यान देने योग्य है। उन्होंने मनुस्मृति के विवादास्पद श्लोकों का बचाव नहीं किया, बल्कि मनु को अथर्ववेद, शतपथ ब्राह्मण और मत्स्य पुराण से जोड़कर व्यापक ‘विरासत’ का हिस्सा बनाया। काल-गणना का उल्लेख कर उन्होंने मनु को वैज्ञानिक-सांस्कृतिक योगदान देने वाला बताया। यह रणनीति है—विवादास्पद पाठ को सांस्कृतिक गौरव से जोड़कर आलोचना को ‘विरासत-विरोध’ ठहराना।
विरोधाभास की जड़ें
यहीं पर योगी जी की स्थिति विचित्र लगने लगती है। नाथ परंपरा ने न केवल जाति-व्यवस्था को नकारा, बल्कि ब्राह्मणवादी धर्मशास्त्रीय वर्चस्व को भी चुनौती दी। गोरखनाथ की रचनाओं में योग को कर्मकांड से ऊपर रखा गया। मठ की परंपरा में दीक्षा जाति-निरपेक्ष रही। आधुनिक काल में गोरखनाथ मठ ने हिंदू पहचान के साथ खुद को जोड़ा, राजनीतिक शक्ति अर्जित की और योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश की सत्ता तक पहुँचा। लेकिन मूल परंपरा का समावेशी और रूढ़ि-विरोधी चरित्र पूरी तरह मिट नहीं पाया।
जब योगी जी मनुस्मृति की ताईद में खड़े होते हैं, तो दो प्रक्रियाएँ एक साथ चलती दिखती हैं। पहली, परंपरा का राजनीतिक विनियोजन। नाथ पंथ जैसे लोक-धार्मिक आंदोलन को ‘सनातन’ के व्यापक छत्र के नीचे लाकर हिंदू एकता का प्रतीक बनाना। दूसरी, आलोचना को ‘विदेशी’ या ‘नक्सली’ प्रभाव बताकर सांस्कृतिक रक्षा का नैरेटिव खड़ा करना। यह नैरेटिव प्रभावी है, लेकिन ऐतिहासिक रूप से अधूरा। गोरखनाथ स्वयं ‘सनातन’ के उस रूप के विरोधी थे जिसमें जन्म-आधारित श्रेष्ठता और बाहरी शास्त्रों की प्रधानता थी।
सवाल यह भी उठता है कि क्या योगी जी ने स्वयं मनुस्मृति को गंभीरता से पढ़ा है? राहुल गांधी को अथर्ववेद आदि पढ़ने की सलाह देते समय यह स्वाभाविक जिज्ञासा पैदा होती है। राजनीतिक भाषणों में ग्रंथों का उल्लेख अक्सर प्रतीकात्मक होता है। वास्तविक अध्ययन और आलोचनात्मक समझ अलग चीज है। यदि नाथ परंपरा के उत्तराधिकारी मनुस्मृति के वर्ण-आधारित प्रावधानों को स्वीकार करते हैं, तो उन्हें यह भी बताना चाहिए कि गोरखनाथ की जाति-निरपेक्ष साधना और मनु की जन्म-आधारित व्यवस्था कैसे साथ चल सकती हैं।
राजनीति, प्रतीक और भविष्य
यह विवाद सिर्फ दो नेताओं का टकराव नहीं है। यह भारत में परंपरा, आधुनिकता और सत्ता के संबंधों का प्रतिबिंब है। एक तरफ संविधान की समानता और स्वतंत्रता है, दूसरी तरफ प्राचीन ग्रंथों को ‘विरासत’ के रूप में संरक्षित करने का आग्रह। राहुल गांधी मनुस्मृति को पितृसत्ता और असमानता का प्रतीक बनाकर दलित-बहुजन और महिला वोट को लक्षित कर रहे हैं। योगी जी उसे सांस्कृतिक हमले के रूप में पेश करके ऊपरी जातियों और रूढ़िवादी तबके को एकजुट करने की कोशिश कर रहे हैं। दोनों पक्ष ग्रंथ को अपने राजनीतिक लक्ष्य के अनुकूल इस्तेमाल कर रहे हैं।
नाथ परंपरा का इतिहास याद दिलाता है कि भारत की धार्मिक परंपराएँ एकरूप नहीं रहीं। कई धाराएँ रूढ़ि के खिलाफ उठीं, समावेश की बात कही और आंतरिक अनुभव को बाहरी नियमों से ऊपर रखा। गोरखनाथ उनमें से एक थे। जब उनके नाम पर चलने वाले मठ का प्रमुख मनुस्मृति की रक्षा में लगोट फेंट खड़ा होता है, तो यह सिर्फ राजनीतिक चुनावी गणित नहीं, परंपरा के आंतरिक विरोधाभास का भी प्रदर्शन है।
अंत में, यह सवाल बाकी रह जाता है—क्या हम ग्रंथों को सिर्फ राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करेंगे, या उनकी आलोचनात्मक समझ विकसित करेंगे? योगी जी राहुल गांधी को पढ़ने की सलाह देते हैं। शायद दोनों पक्षों को नाथ परंपरा के मूल ग्रंथों और गोरखबानी को भी उतनी ही गंभीरता से पढ़ना चाहिए। तब शायद यह स्पष्ट होगा कि समावेश, योग और जाति-निरपेक्ष साधना की परंपरा मनुस्मृति की कठोर व्यवस्थाओं से कितनी दूर खड़ी है। राजनीतिक विवाद शांत हो सकते हैं, लेकिन ऐतिहासिक विरोधाभास बने रहेंगे—जब तक हम उन्हें ईमानदारी से नहीं देखेंगे।





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