बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने अपनी प्रसिद्ध कृति शूद्र कौन हैँ में एक बेहद महत्वपूर्ण और चुनौतीपूर्ण शोध प्रस्तुत किया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि आर्य समाज में आरंभ में केवल तीन वर्ण थे—ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य। शूद्र कोई अलग चौथा वर्ण नहीं था । वे क्षत्रिय वर्ण का ही एक अंग थे, सूर्य वंशीय क्षत्रियों में ही एक गौत्र का नाम शूद्र था. शूद्र राजाओं और ब्राह्मणों के बीच लंबे संघर्ष के कारण ब्राह्मणों ने शूद्रों का उपनयन संस्कार बंद कर दिया। उपनयन से वंचित होने के कारण वे सामाजिक रूप से नीचे गिरे, वैश्यों से भी निम्न माने जाने लगे और धीरे-धीरे चौथे वर्ण के रूप में स्थापित हो गए।
यह दृष्टिकोण पारंपरिक पुरुष-सूक्त वाली दैवी उत्पत्ति की कहानी को चुनौती देता है और इतिहास को सत्ता-संघर्ष तथा संस्कार-वंचन के रूप में देखता है।
अम्बेडकर के अनुसार मनुस्मृति शुंग काल (पुष्यमित्र शुंग के समय) की रचना है, जब बौद्ध प्रभाव के बाद ब्राह्मणवादी पुनरुत्थान हो रहा था। उससे पहले मानव स्मृति जैसी व्यवस्थाएं प्रचलित थीं, जिनमें ब्राह्मणों के लिए भी दायरे और नियम तय थे। मनु ने शूद्रों के लिए उतने क्रूर प्रावधान नहीं किए जितने बाद में विकसित हुए। कालक्रम में अनुलोम-प्रतिलोम (विलोम) विवाहों के आधार पर दंड व्यवस्थाएं कठोर होती गईं। इन्हीं विवाह संबंधी प्रतिबंधों और दंडों ने जातिगत उत्पीड़न को संस्थागत रूप दिया। जाति व्यवस्था कोई शाश्वत दैवी व्यवस्था नहीं, बल्कि ऐतिहासिक प्रक्रियाओं—संघर्ष, संस्कार-वंचन और वैवाहिक बंदिशों—का परिणाम थी।
पौराणिक कथाओं का अम्बेडकरी पुनर्पाठ
इस दृष्टि से रामायण और महाभारत को देखें तो उनके काल में जाति व्यवस्था की कठोरता का अभाव साफ दिखता है।
रामायण में चौथा वर्ण स्पष्ट रूप से मौजूद नहीं लगता। धोबी प्रसंग इसका उदाहरण है। राम रात को राज्य का हाल-चाल लेने निकलते हैं तो धोबी उन्हें मिलता है। वह सीता के बारे में टिप्पणी करता है और राम उसे प्रजा की आवाज मानकर महत्व देते हैं। अगर कठोर जाति व्यवस्था और अस्पृश्यता होती, तो धोबी उसी बस्ती में अन्य लोगों के साथ न रहता, न ही उसकी बात को राजा इतनी गंभीरता से लेता। आज के कट्टर समाज में यदि कोई दलित ऐसी टिप्पणी करे तो प्रतिक्रिया अक्सर हिंसक और अपमानजनक होती है। रामायण का यह प्रसंग बताता है कि उस समय सामाजिक दूरी इतनी कठोर नहीं थी।
द्वापर युग की कृष्ण कथा में भी जाति प्रथा की कठोरता नजर नहीं आती। युद्ध शिक्षा और राजकीय कार्यों में मुख्यतः कुलीनों (राज परिवारों) को अनुमति थी—यह स्थिति यूरोप के सामंती समाज से मिलती-जुलती है, जहां पुश्तैनी कुलीनों को ही युद्ध और शासन का विशेषाधिकार था। नेपोलियन कुलीन पृष्ठभूमि से न होने के बावजूद सर्वोच्च पद तक पहुंचा, लेकिन हमेशा असुरक्षा महसूस करता रहा। उसे लगता था कि खानदानी बैकिंग न होने से उसका सिंहासन तलवार के जोर पर ही टिका है। यदि वह ढीला पड़ा तो सामंत तख्ता पलट देंगे।
एकलव्य की कहानी को इसी आधार पर समझा जा सकता है। उसका अंगूठा जाति के कारण नहीं काटा गया होगा। अपनी कुदरती धनुर्विद्या के चर्चे से उत्साहित होकर उसने द्रोणाचार्य के राजकीय आर्मी स्कूल में प्रवेश चाहा। आम परिवार से होने के कारण प्रवेश अस्वीकार कर दिया गया—जाति की बजाय कुलीनता और राजकीय नियंत्रण का प्रश्न अधिक प्रबल था।
सूत-पुत्र कर्ण का तिरस्कार भी इसी श्रेणी में आता है। यदि कठोर जाति व्यवस्था होती और वह नीच समझा जाता, तो क्षत्रिय दुर्योधन उससे दूरी रखता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मूल आपत्ति यह थी कि आम परिवार के व्यक्ति को राज परिवारों के योद्धाओं के संघर्ष में शामिल करना अनुचित समझा गया।
बौद्ध पतन के बाद का मोड़
बौद्ध काल के पतन और सनातन धर्म के पुनरुत्थान के बाद स्थिति बदली। जिनका धर्म बदल गया था यानी जो बौद्ध हो गए अपनी शुद्धता के आग्रह के तहत उन्हें सनातनियों द्वारा अपने संस्कारों में शामिल नहीं करने का निर्णय लिया गया। पृथक्करण का सिलसिला शुरू हुआ। वैवाहिक प्रतिबंधों ने इसे और विकृत कर दिया। अनुलोम-विलोम विवाहों पर सख्त दंड व्यवस्थाओं ने उत्पीड़क जाति व्यवस्था का निर्माण किया। यह प्रक्रिया अम्बेडकर के शोध को समझने की कुंजी है।
आज जब हम जाति की चर्चा करते हैं तो अक्सर उसे शाश्वत और अपरिवर्तनीय मान लेते हैं। अम्बेडकर हमें याद दिलाते हैं कि यह ऐतिहासिक उत्पाद है—सत्ता संघर्ष, संस्कार वंचना और वैवाहिक बंदिशों का परिणाम। पौराणिक कथाओं को इसी नजरिए से पढ़ने पर वे जातिगत उत्पीड़न के औचित्य-प्रमाण के बजाय सामाजिक गतिशीलता और नियंत्रण के दस्तावेज बन जाते हैं।
यह दृष्टिकोण केवल अतीत की व्याख्या नहीं करता। यह वर्तमान में जाति की कठोरता को चुनौती देने और सामाजिक समता की संभावनाएं तलाशने का रास्ता भी खोलता है। अम्बेडकर के शोध को गंभीरता से लेने का मतलब है इतिहास को दैवी नियति की बजाय मानवीय प्रक्रियाओं के रूप में देखना—और उसी आधार पर भविष्य गढ़ना।





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