11,अक्टूबर,लोकनायक जयप्रकाश नारायण की 

129 वीं जयंती पर विशेष –

 

    भारत की स्वतंत्रता, लोकतंत्र की रक्षा, सामाजिक न्याय एवं सरोकार , लोकतांत्रक मूल्यों की रक्षा एवं जनहित के लिए समर्पित महान स्वतंत्रता सेनानी, समाजवादी चिंतक,भारतीय राजनीति के युग पुरूष एवं सम्पूर्ण क्रांति के जनक भारत रत्न लोकनायक जय प्रकाशनारायण का जन्म 11 अक्टूबर , 1902 को सिताबदियारा( लाला टोला)में हुआ था, जबकि उनकी  8 अक्टूबर,1979 को वे गोलोकवासी होगये।’लोकनायक’ एवं ‘जेपी’ उपनाम से प्रसिद्ध जय प्रकाश नारायण जी 7 सितम्बर , 1979 को अंतिम बार सिताबदियारा आए थे। मरणोपरांत 1999 में उन्हें ‘भारत रत्न’ से समम्मानित किया गया। सामाजिक सरोकार से जुड़े होने एवं जन- जन की भलाई की सोच रखने के कारण ही उन्हें ‘लोकनायक’ कहकर पुकारा जाने लगा। फिर तो वो ‘लोकनायक जेपी’ के नाम से ही प्रसिद्ध हो गये।

     लोकनायक जयप्रकाश नारायण का व्यक्तित्व अन्य राजनीतिज्ञों से बिल्कुल भिन्न था। वो अपने को राजनेता नहीं मानते थे, बल्कि जनता का सेवक मानते थे।  यही कारण है कि वे सदैव समाज से जुड़े रहे एवं सामाजिक सरोकारों के लिए लड़ते रहे। वे सत्ता एवं पद से अधिक समाज एवं सिद्धांतों को महत्व प्रदान करते थे। वे नैतिक राजनीति एवं जन शक्ति के अप्रतिम् योद्धा थे।

     उच्च शिक्षा प्राप्त करने हेतु जय प्रकाश नारायण जी  अमेरिका गये, जहां समाजवाद एवं समानता जैसे विचारों से वे बेहद प्रभावित हुए।

      अमेरिका से उच्च शिक्षा प्राप्त कर जब जय प्रकाश नारायण अपने देश वापस आए तो गांधी जी के नेतृत्व में चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन से प्रभावित होकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ कर स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण एवं सक्रिय भूमिका निभाने लगे। 1942 के भारत छोड़ों आंदोलन में उनकी विशेष भूमिका एवं सक्रियता को देखते हुए उन्हें ब्रिटिश शासन द्वारा गिरफ्तार कर हजारीबाग जेल भेज दिया गया। किंतु वो कहां मानने वाले थे। उनके ऊपर तो भारत माता को स्वतंत्र करने का भूत सवार था। इसलिए वे घात लगाकर हजारीबाग जेल से फरार हो गये और भूमिगत रहते हुए ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे।

    जब देश स्वतंत्र हुआ तो वे राजनीति, सत्ता एवं पद से परे रहते हुए समाज निर्माण , खासतौर से ऐसे समाज के निर्माण हेतु संघर्ष करने लगे, जिसमें सामाजिक एवं आर्थिक शोषण तथा सामाजिक – आर्थिक असमानता न हो तथा प्रत्येक नागरिक  को  सम्मानपूर्वक जीने का अवसर प्राप्त हो,इसके लिए उन्होंने सम्पूर्ण क्रांति का आवाहन किया, जिसे 1974 का छात्र – युवा आंदोलन एवं सम्पूर्ण क्रांति के रूप में जाना गया। यह आंदोलन पूरे देश में व्यापक रूप से छा गया। इस संघर्ष में उन्होंने युवाओं का आह्वान किया। इस सम्पूर्ण क्रांति से जय प्रकाश जी का मकसत सत्ता परिवर्तन करना बिल्कुल नहीं था,बल्कि समाज, शिक्षा,राजनीति, प्रशासन एवं अर्थ व्यवस्था में आमूल – चूल परिवर्तन लाने हेतु युवा संघर्ष करें , ताकि सम्पूर्ण व्यवस्था सुव्यवस्थित हो, प्रत्येक नागरिक प्रत्येक दृष्टि से अपने को सुरक्षित महसूस करे तथा उसकी आवश्यक आवश्यकतिओं की पूर्ति हो‌। इस तरह उनके सम्पूर्ण क्रांति का नारा मात्र राजनीतिक परिवर्तन का नारा नहीं था, बल्कि इसके पीछे भ्रष्टाचार, अन्याय ,सामाजिक एवं आर्थिक असमानता तथा प्रशासनिक आव्यवस्था के  विरोध में व्यापक संघर्ष की अवधारणा को लेकर वे आगे बढ़ रहे थे। उनका स़घर्ष अंतत: रंग लाया और 1977 के आपात काल की समाप्ति के बाद हुए चुनाव में सत्ता परिवर्तन भी हुआ।

    लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने  देश के नागरिक को मात्र मतदाता न मानकर लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति  माना है। उनके अनुसार जागरूक नागरिक ही लोकतांत्रिक व्यवस्था को सुदृढ़ बना सकता है। उनके विचारों से यह संदेश प्राप्त होता है कि परिवर्तन मात्र व्यवस्थ को दोष देने से नहीं होता है, बल्कि उसके लिए स्वयं जिम्मेदारी निभानी पड़ती है, तभी परिवर्तन सम्भव हो सकेगा। उनका विचार था कि जब लोकतंत्र एवं न्याय पर संकट के बादल मंडरा रहे हों ,तो ऐसी परिस्थिति में लोकतंत्र की रक्षा हेतु एक जिम्मेदार एवं जागरूक नागरिक को मौन नहीं रहना चाहिए, अन्यथा लोकतंत्र खतरे में पड़ सकता है।

लोकनायक जय प्रकाश नारायण जी का विचार आज भी प्रासंगिक है। वर्तमान परिवेश में जब राजनीति में नैतिकता,सामाजिक एवं आर्थिक असमानता , भ्रष्टाचार तथा जन सहभागिता जैसे सरोकार निरन्तर चर्चा में रहते हैं, ऐसी स्थिति में लोक नायक जयप्रकाश नारायण जी की विचारधारा आज और भी प्रसंगिक होती हुई परिलक्षित हो रही है।

Leave a Reply