02orai08उरई। परमार्थ स्वयं सेवी संस्था के सचिव संजय सिंह ने कहा है कि बुंदेलखंड में सूखे के प्रकोप से त्रस्त जनजीवन को जो योजना सबसे कारगर सहारा दे सकती है वह मनरेगा है। केंद्र और प्रदेश सरकार को राजनीतिक पूर्वाग्रहों को तिलांजलि देकर तत्काल मनरेगा को प्रभावी ढंग से लागू करने पर ध्यान देना चाहिए।
आज मनरेगा की 10वीं वर्षगांठ पर आयोजित पत्रकार वार्ता में संजय सिंह ने बताया कि दिनांक 2 फरवरी 2006 को तत्कालीन सरकार ने भारत के सबसे गरीब 200 जिलों में मनरेगा को लागू किया था। इस बाद वर्ष 2008 में मनरेगा को सप्रंग सरकार ने देश के सभी जिलों में लागू कर दिया था। मनरेगा एक ऐसा कार्यक्रम है जिसने बुन्देलखण्ड में 2007 और 2008 के सूखे से निपटने के लिए अहम भूमिका निभाई थी। जिसका उदाहरण वर्ष 2007 में उत्तर प्रदेश में मनरेगा के बेहतर क्रियान्वयन के लिए जालौन के तात्कालीन जिलाधिकारी रिग्जैन सैम्फिल को राष्ट्रीय पुरुस्कार मिला था। उन्होंने मनरेगा के तहत गांव-गांव में न केवल जल संरक्षण के कार्य कराए थे बल्कि सूखे की समस्या से मजदूर मुकाबला कर सके, इसके लिए रोजगार के अधिक से अधिक अवसर उपलब्ध कराए थे। हाल के वर्षों में केन्द्र से लेकर राज्य सरकारों ने मनरेगा को कमजोर किया है वहीं पंचायतों के स्तर पर भी मनरेगा के क्रियान्वयन में उदासीनता और भ्रष्टाचार बढ़ा है। मजबूत निगरानी तन्त्र जिसके तहत सोशल आॅडिट आदि की प्रक्रिया भी सिर्फ कागजी खानापूर्ति रह गयी है। केन्द्र की सरकार ने तमाम अध्ययन और विश्लेषण के बाद मनरेगा के 100 से बढ़ाकर 150 दिन किए गए हैं किन्तु बजट में बढ़ोत्तरी नहीं हुयी है। वर्तमान में उत्तर प्रदेश सरकार को केन्द्र से मनरेगा का बजट नहीं मिल पाया है जिसके कारण भुगतान की प्रक्रिया बाधित हो रही है। बुन्देलखण्ड को सूखे और अकाल के इस दुष्काल से निकालने में मनरेगा कारगर साबित है, आवश्यकता है कि इसे केन्द्र और राज्य सरकारें पूर्ण इच्छाशक्ति के साथ लागू करें। सूखे के कारण मजदूर और किसानों की क्रय शक्ति प्रभावित हुयी है। क्रयशक्ति को बढ़ाने के लिए हमें रोजगार के अधिक से अधिक अवसर उपलब्ध कराने होंगे जिससे क्रयशक्ति बढ़ेगी और लोग अपनी जरुरतें पूरी कर सकेगे। मनरेगा से पशुबाढ़ा और पशु छावनी का भी कार्य किया जा सकता है जिसका बेहतर उदाहरण महाराष्ट्र में है। गांव के कमजोर और असहाय लोग, जो मिट्टी खुदाई का कार्य नहीं कर सकते हैं वह अपने गांवों में मनरेगा से मिलने वाली मजदूरी के आधार पर गांव के लावारिस पशुओं की देखभाल पशुबाड़ा में कर सकते हैं। वर्तमान में बुन्देलखण्ड में सबसे बड़ा संकट पशुओं का है। इसके लिए मनरेगा से पशुबाड़ा बनाए जाएं। आने वाले दिनों में जल संकट एक गम्भीर समस्या है। जिससे निपटने के लिए अभी से कार्ययोजना बनाने की आवश्यकता है और मनरेगा के कार्यों में पेयजल के मुद्दे को भी जोड़ा जाना चाहिए। जिस प्रकार शौंचालय के निर्माण में मनरेगा से धनराशि मिल रही है। उसी तरह बुन्देलखण्ड में पेयजल संरचनाओं के रखरखाव के लिए मनरेगा का उपयोग किया जाना चाहिए। प्रत्येक पंचायत में इस वित्तीय वर्ष के अन्त तक अनवरत रुप से मनरेगा के कार्य चलाए जाने की आवश्यकता है। देश के सूखा और अकाल प्रभावित इलाकों में मनरेगा आज भी कारगर है। इसी तरह बुन्देलखण्ड में इसे प्रभावी ढ़ंग से क्रियान्वयित करने की आवश्यकता है। जिसके लिए मनरेगा मजदूर यूनियन के ढ़ंाचे को मजबूत किए जाने की आवश्यकता है। परमार्थ संस्था बुन्देलखण्ड के जालौन, हमीरपुर, झांसी, ललितपुर जिलों में आज मनरेगा की 10वीं वर्षगांठ के कार्यक्रम को मजदूर सम्मेलन के रुप में मना रही है। मनरेगा में पिछले 10 वर्षों में साजिश के तहत कमजोर किया गया हैं

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