किस नये सामाजिक नियोजन की भूमिका है यह विध्वंस
27c0e33e-70ae-40cd-b9cb-6e01381eb0ceउरई। बुंदेलखंड में अधिकतम् बिजली देने का सरकारी सब्जबाग हकीकत के धरातल पर फरेब साबित हो रहा है। जिला मुख्यालय पर पिछले कुछ दिनों से 10 घंटे बिजली नसीब नही है। यहां तक कि रात को भी बिजली के लाले हैं। अचानक लड़खड़ाई बिजली व्यवस्था के कारण जनाक्रोश चरम पर उबलने लगा है।
गर्मी शुरू होते ही बिजली विभाग ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया है। सुबह 10 बजे बिजली गायब हो जाती है। इसके बाद दोपहर में कुछ घंटे बिजली रहती है लेकिन रात होते-होते फिर कई घंटों के लिए बिजली उस समय गोल हो जाती जब लोगों के घरों में खाना तैयार करने और खाने का समय होता है। साढ़े दस बजे से पौने ग्यारह बजे के बीच बिजली आती है। जल्दी-जल्दी इसके बाद लोग सोने की तैयारी करते हैं। लेकिन लोग झपक ही पाते है कि 2 बजे के बाद फिर सुबह तक के लिए बिजली लापता हो जाती है।
बिजली की इस आंख मिचौली की वजह से न तो लोग ढंग से खा पा रहे हैं और न ही सो पा रहे हैं। रात को होने वाली आपूर्ति में बाधा लोगों के मानसिक संतुलन को बिगाड़ने का कारण बनती जा रही है। एक सर्वे के अनुसार पिछले एक सप्ताह में घरेलू कलह के मामले 70 फीसदी बढ़ गये हैं। पति-पत्नी, मां-बाप और बेटे-बेटियों और भाईयों तलक कोई रिश्ता नही बचा जो नींद पूरी न हो पाने की वजह से बढ़ रहे चिड़चिड़ेपन की जद में आने से बच रहा हो। क्या यह बिजली विभाग की ओर से किसी नये सामाजिक नियोजन के कार्यक्रम के तहत हो रहा है ?
इसी बीच लोगों के बिजली विभाग और प्रशासन के प्रति उमड़ रहे आक्रोश की धार भी तेज होने लगी है। कहीं ऐसा न हो कि यह समस्या किसी विस्फोटक आंदोलन के उददीपन की वजह बन जाये और इसके बाद कानून व्यवस्था को लेकर बदनाम अर्थों में जिले का नाम सुर्खियों में छाने की नौबत आ जाये। जिम्मेदार अधिकारियों से इस कारण समय रहते सुधारात्मक कदम उठाने की गुजारिश की जा रही है।

Leave a comment