पानी के सूखे से भी ज्यादा तकलीफदेह है ऊपर से लगाकर नीचे तक ईमानदारी का सूखा। जालौन जिले के सरसौखी गांव में सूखे से पैदा बदहाली का जायजा लेने आई केंद्रीय टीम की चैपाल में भूखे-प्यासे और बेघर लोगों का जो दर्द छलका उससे मशहूर शायर दुष्यंत कुमार की यह पंक्तियां याद आ गई-यहां आते-आते सूख जाती हैं नदियां, हमें मालूम है कि पानी कहां ठहरा हुआ होगा…..। केंद्रीय टीम ने भुखमरी की कगार पर खड़े लोगों को बांटे जा रहे समाजवादी खाद्यान्न पैकेट के बारे में पूंछा तो भीड़ नही मिला-नही मिला चिल्ला उठी। जिले के सीनियर अधिकारियों को लापरवाही और मनमानी छुपाने के लिए पैबंद ढूढ़ना मुश्किल हो गया। डीएम का इशारा पाकर सचिव ने जोर-जोर से गांव में 85 लोगों को खाद्यान्न बांटने का गुणगान शुरू किया जिससे लोगों को चुप हो जाना पड़ा। महिलाओं ने पोल खोली कि बेजुबान गायों के लिए आया चारा जन्मजात भूखे अधिकारी और कर्मचारी हजम कर गये। आवास भी पहचान-पहचान कर दिये गये। दावे हो रहे थे कि अधिकतम तालाब भरवाये जा चुके हैं लेकिन जिला मुख्यालय की नाक के नीचे सरसौखी गांव तक में तालाबों में धूल उड़ रही है। यह हकीकत एक ग्रामीण ने बताई तो अधिकारी बगलें झांकने लगे। रोजगार सेवक काम देने के लिए मोहताज मजदूरों से पैसे मांगने में न ऊपर वाले से डरता है और न नीचे के हाकिमों से। केंद्रीय टीम की आंखे इस दारुण गाथा को सुनकर भींग गईं। सरकार राहत के लिए कितनी भी घोषणाएं करे लेकिन अमल करने वालों में जब तक इंसानियत नही जगेगी तब तक कुछ हो सकेगा यह भ्रम किसी को नही पालना चाहिए।

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