उरई। जिला प्रशासन की नाक के नीचे तक पेयजल समस्या का कोई पुरसाहाल नही है। चैरसी, राहिया, रगेदा और सरसौंखी आदि में पानी के लिए मचा हाहाकार जिला प्रशासन की दिखावटी मुस्तैदी का मुंह चिढ़ा रहा है।
सूखे के कारण मई-जून में पेयजल संकट को लेकर सतर्कता बरतने के निर्देश राज्य सरकार मार्च से ही जारी कर रही थी। लेकिन सरकार की बात एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देने की लत के शिकार अधिकारियों ने इसमें कोई गंभीरता नही दिखाई। बैठकों में पेयजल संकट के समाधान के लिए जुबानी जमा खर्च करने और राहत के इंतजामों के नाम पर कागजी घोड़े दौड़ाये जाने का नतीजा है कि पेयजल प्रभावित जिला मुख्यालय के नजदीकी गांवों तक में कोई सार्थक पहल गर्मी के मौसम के लिए नही हुई। नतीजतन उक्त गांवों में भूमिगत जल नीचे खिसकने से सरकारी हैण्डपंप एक के बाद एक ठप्प होते गये। इक्के-दुक्के बचे हैंडपंपों पर इतनी भीड़ जुटती है कि मारामारी के बावजूद लोग घंटों बाद पानी भर पाते हैं। जहां तक पेयजल संकट से ग्रस्त गांवों में टैंकर भेजने के इंतजाम की बात है गाल बजाने के अलावा अधिकारियों ने इस दिशा में काम करने के लिए भी कोई प्रयास न करने की कसम खा रखी है। जिससे उक्त गांवों में एक भी दिन टैंकर नही पहुंचा है।
उक्त गांवों में मवेशियों की दशा तो और ज्यादा बुरी है। तालाब न भरे जाने से प्यास के कारण तमाम मवेशी दम तोड़ चुके हैं। पशु पालकों ने जीव हत्या बचने और नुकसान को कम करने के लिए गरज में औने-पौने में मवेशियों को बेचना शुरू कर दिया है। आज जिलाधिकारी से शिकायत करने आये उक्त गांवों के वाशिंदों ने कहा कि अब जबकि एक पखवारे बाद बरसात शुरू हो जायेगी तो हमारा चिल्लाना अपने आप बंद हो जायेगा। इसलिए अधिकारी कुछ करना नही चाहते। बारिश शुरू होने से पहले जितने मवेशी और आदमी पेयजल संकट की भेंट चढ़ जायें वे सब उनकी बला से।






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