konch4कोंच-उरई। सरकारी व्यवस्था को आखिर लोग क्यों न कोसें, समय से अगर कोई काम नहीं होता है तो खामियाजा तो किसी न किसी को उठाना ही पड़ता है। अब सरकारी स्कूलों की अगर बात करें तो यह किसी से छिपा नहीं है कि टीचर अगर बच्चों को पढाना भी चाहें तो कई तरह की दुश्वारियां उनके आगे मुंह उठाये खड़ी नजर आती हैं। बेसिक शिक्षा विभाग के स्कूलों में अप्रैल महीने से सत्र प्रारंभ हो गया है लेकिन बच्चों के हाथों तक अभी भी किताबें नहीं पहुंची हैं, ऐसी स्थिति में पढाई कैसे हो, यह बड़ा सवाल है।
बेसिक शिक्षा विभाग द्वारा संचालित विद्यालयों में सत्र शुरू हुये लगभग पांच माह होने को आये हैं, यानी आधा समय बीत चुका है लेकिन हैरानी बाली बात यह है कि बच्चों को पुस्तकें अभी तक नहीं उपलब्ध कराई गई हैं। अध्यापकों के समय से स्कूल पहुंचने, समय से स्कूल खोलने और समय से ही स्कूल बंद करने जैसे फरमानों से भी ऊपर मिड डे मील बनाने और मीनू के मुताबिक बच्चों को खिलाने जैसी नाना प्रकार की नसीहतें देते लोग नहीं थकते हैं लेकिन अभी तक किसी ने यह भी सुध नहीं ली है कि बिना किताबों के बच्चे पढेंगे क्या और लिखेंगे क्या। पूर्व माध्यमिक शिक्षक संघ के प्रांतीय कार्यकारिणी के सदस्य रामशंकर छानी ने माना कि बिना किताबों के पढाई व्यवस्था में व्यवधान आ रहा है लेकिन वह कर भी क्या सकते हैं, यह नीतिगत फैसला है और इस पर शासन-प्रशासन को संज्ञान लेने की जरूरत है।

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