उरई। समाजवादी पार्टी में बुंदेलखंड को लेकर जिस तरह से अंदरूनी समीकरण बदले गये हैं उसे लेकर पुराने दिग्गजों में बगावत की आग भड़कना लाजिमी है। जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव के घमासान को बहुत लोग इस बात से भी जोड़ कर देख रहे हैं।
सपा सुप्रीमों मुलायम सिंह जब तक खुद पार्टी का संचालन कर रहे थे तब तक उन्होंने बुंदेलखंड की सूबेदारी जिन लोगों को सौंप रखी थी। नये दौर में उन लोगों को लगातार हाशिए पर किया जा रहा है। बात यहां तक बढ़ गई है कि पुराने सूबेदारों द्वारा हाईकमान को चुनौती देकर अपने वजूद का एहसास कराने तक की बातें चलने लगी हैं। सुमन निरंजन की उम्मीदवारी को सपा के बुंदेलखंडी क्षत्रपों के शक्ति प्रदर्शन की कार्रवाई माना जा रहा है। इसीलिए निर्दलीय होते हुए भी उनकी ताकत को प्रेक्षक इतने प्रचंड रूप में आंक रहे हैं।
ऐसे में जबकि आसना खातून की हार सपा हाईकमान के लिए नीचा देखने का कारण बनेगी इसके बावजूद पार्टी के लोगों को उनके खिलाफ पर्चा भरने से रोकने और सुमन निरंजन के पर्चे की वापसी के लिए क्षत्रपों की लगाम कसने में पार्टी हाईकमान ने अभी तक सख्ती क्यों नही दिखाई है यह सवाल जोरो से पूंछा जा रहा है। लेकिन कहा यह जा रहा है कि अभी तक जो ढील हो गई सो हो गई लेकिन 29 अगस्त के पहले सपा हाईकमान पार्टी अनुशासन का जलवा दिखाकर पूरे संकट को इस तरह मैनेज कर देगा कि सारी उथल-पुथल पार्टी के लिए सुखद पटाक्षेप में तब्दील हो जायेगी।






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