उरई। भाजपा के नादान कर्णधारों की बचकानी रणनीति ने जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव के आखिरी दौर में पार्टी की नाक बचाने के सवाल पर समाजवादी पार्टी के लोगों को एकजुट कर दिया है। लखनऊ में रविवार को हाईकमान के सामने हुई बैठक में सुरेंद्र यादव और सुदामा दीक्षित गरौठा विधायक दीपनारायण यादव की उपस्थिति में पहुंचे। उनके तमाम गिले-शिकवे मुख्यमंत्री ने खुद धैर्य पूर्वक सुने और इसके बाद उन्हें पूरा सम्मान दिलाने का वायदा करके संतुष्ट कर दिया गया। खबर है कि पार्टी की इज्जत बचाने के लिए आखिर में इन लोगों ने अधिकृत प्रत्याशी के समर्थन की हामी भर दी है हालांकि इसकी कोई आधिकारिक घोषणा नही की गई है।
सपा के ही एक खेमे की कठपुतली के रूप में जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में कथित तौर पर मैदान में उतारी गईं सुमन निरंजन रविवार को दोपहर तक निर्णायक बढ़त बनाये हुए थी लेकिन पाशा तब पलटा जब भाजपा के नादान नेताओं ने उन्हें अपना समर्थन देने की घोषणा कर दी। इसके बाद असली समाजवादी पार्टी की पहचान को सुरक्षित करने के नाम पर चुनाव लड़ रहे सुरेंद्र मौखरी के सामने दुविधापूर्ण स्थिति बन गई। सुमन निरंजन के भाजपा उम्मीदवार बन जाने से उनकी जीत समाजवादी पार्टी की नाक कट जाने का कारण साबित हो सकती है। लखनऊ में हाईकमान द्वारा अचानक तलब किये गये सुरेंद्र मौखरी और सुदामा दीक्षित के सामने वफादारी के इम्तिहान के रूप में जब यह बात रखी गई तो दोनों पशोपेश मंे पड़ गये। लखनऊ बैठक के परिणाम के बारे में सपा के नेता आधिकारिक तौर पर कुछ बताने को तैयार नही हैं। लेकिन समझा यह जा रहा है कि सुरेंद्र मौखरी अपने अंदर पार्टी का मोह जाग जाने से कदम वापस पीछे खीचने को तैयार हो गये हैं।
इसके चलते जो स्थिति नजर आ रही है उसमें अब आसना खातून और सुमन निरंजन के बीच सीधा मुकाबला होने के आसार हैं। इसमें धनबल का कारक बहुत महत्वपूर्ण हो गया है जिसमें अगर आसना खातून का खेमा शहजोर है तो सुमन निरंजन का खेमा भी कहीं से कमजोर नही है। उन्हें भाजपा के एक प्रदेश पदाधिकारी द्वारा बैठाई गई गोटियों की वजह से बसपा से जुड़े रहे एक सजातीय उद्योगपति से भरपूर फाइनेंस हो रहा है। साथ ही सपा के एक खेमें ने भी उनके लिए अपनी थैली का मुंह खोल रखा है। ऐसे में दोनों के बीच कांटे की टक्कर के आसार बन गये हैं। अब इंतजार सुरेंद्र मौखरी और सुदामा दीक्षित का लखनऊ से लौटने का है। लोग उनके मुंह से जानना और सुनना चाहते हैं कि नई परिस्थितियों में चुनाव को लेकर उन्होंने क्या फैसला लिया है।






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