
रामपुरा-उरई। रामपुरा का सरकारी अस्पताल अपग्रेड होकर पीएचसी से सीएचसी बन गया है लेकिन अस्पताल की असली हालत नाम बड़े, दर्शन छोटे की कहावत को चरितार्थ कर रही है। बल्कि स्थिति तो यह है कि यह अस्पताल डिस्पेंसरी से भी गई गुजरी हालत का नमूना पेश कर रहा है।
अस्पताल में मरीजों की सुविधाओं के लिए की गई व्यवस्थायें दिखावे की हैं। शुद्ध पेयजल के लिए लगे वाटर कूलर के स्थान पर इस कदर गंदगी है कि लोग घिन के मारे इस वाटर कूलर से पानी पीने की हिम्मत नही जुटा पाते। इसी तरह कहने को तो यह 30 बैड का अस्पताल है। लेकिन किसी बैड का कोई उपयोग नही है। अगर किसी को बोतल चढ़ानी हो तो उसे स्ट्रेचर पर लिटा कर यह काम किया जाता है। पूरे अस्पताल में गंदगी का भीषण अंबार है।
फरमान यह है कि सरकारी अस्पताल में आने वाले मरीज के लिए दवाईयां बाहर की नही लिखी जायेगी लेकिन व्यवहार में जो होता है वो इसके विपरीत है। अस्पताल के पर्चे के साथ एक पर्ची संलग्न कर उस पर बाहर की दवाईयां धड़ल्ले से लिखी जा रही हैं जिनमें डाॅक्टर का कमीशन होने से दवाई की कीमत मंहगी भी होती है और कमीशन की यह दवाई कारगर भी नही होती।
धांधली की एक बानगी प्रसूताओं को कोई आहार न दिये जाने के रूप में देखी जा सकती है जबकि प्रसूताओं को पोषण आहार देने के लिए हर महीने अच्छा खासा बजट कागजों पर खर्च दर्शाया जाता है। सीएचसी में प्रवेश द्वारा के बाद बरामदे को मोटर साइकिल स्टैण्ड में तब्दील कर दिया गया है जिससे बाहर-भीतर होते समय मरीजों और उनके तीमारदारों को भारी कठिनाई का सामना करना पड़ता है।
उधर सीएचसी के चिकित्साधीक्षक डाॅ. वीरप्रताप सिंह अक्सर मौजूद नही रहते। बिना राजा की फौज की तरह सीएचसी के कार्य संचालन से अराजकता की स्थिति बनी रहना लाजिमी है।






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