12orai03माधौगढ़-उरई। आधा दर्जन से अधिक गांवों को जोड़ने वाले संपर्क मार्ग की हालत बेहाल है। लंबे समय से मरम्मत न होने की वजह से सड़क अपना वजूद खो चुकी है। सड़क के नाम पर जगह-जगह गहरे गढढे और नुकीली पत्थर की चटटानें निकली रहती हैं। जिनसे राहगीर चुटहिल होते रहते हैं।
वैसे तो ग्रामीण क्षेत्र की सभी सड़कों का लगभग एक जैसा हाल है। राजनैतिक दबाव पड़ने अथवा कोई और परिस्थिति की वजह से उपेक्षित इलाके में कभी गांवों की सड़के बन तो जाती हैं लेकिन हाशिये का इलाका होने की वजह से इन सड़कों का अस्सी प्रतिशत बजट कमीशन में हड़प लेने में गुरेज नही किया जाता। जाहिर है कि ऐसी लिफाफिया सड़कें कितने दिन तक लोगों का साथ दे सकती हैं। प्रत्येक सड़क की मरम्मत के लिए नियमित अंतराल पर बजट निकाला जाता है लेकिन ग्रामीण क्षेत्र की सड़कें समीक्षा के नाम पर भुलाकर रखी जाती हैं। इसलिए इनका बजट भी किस मद में कौन चट कर गया यह जानने तक की जरूरत कोई नही समझता।
हम जिस सड़क की बात कर रहे हैं उससे सात गांव बाबस्ता हैं। लक्ष्मणपुरा, हैदलपुरा, हरौली, जमरेही, गालमपुरा, नुनाइचा और गींधन की खोड़ ये सभी वे गांव हैं जो कभी मुख्य धारा के नक्शे में नजर नही आते रहे हैं। आज भी ये गांव पहले के तरह ही गुमनाम बने हुए हैं। इसलिए इतने ज्यादा गांवों में ध्वस्त सड़कों के कारण मचा हाहाकार माधौगढ़ ब्लाॅक के गलियारों तक में कोई गंूज पैदा नही कर पा रहा है। जिले की कलेक्टेªटी तक तो इसकी कोई आहट नही है। लेकिन गांव वाले इस बार आक्रोश में हैं और इस जहाने फानी में वे भी कोई हस्ती रखते हैं। यह दिखाने के लिए कुलबुला रहे हैं। अगर उनका गुस्सा इसी तरह परवान चढ़ता रहा तो कलेक्ट्रेट में बैठे जिले के हुकुमरानों को किसी दिन लेने के देने पड़ जायेंगे।

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