उरई। जनपद की कालपी विधानसभा सीट भारतीय जनता पार्टी के लिए सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण रही है। पार्टी के गठन के बाद से प्रदेश विधानसभा के 9 चुनाव हुए हैं। जिनमें से केवल एक बार भारतीय जनता पार्टी को कामयाबी मिल पाई है। इस कारण इस सीट के लिए कारगर व्यूह रचना करने में पार्टी के दिग्गजों को सर्वाधिक मशक्कत की जरूरत महसूस हो रही है।
भारतीय जनता पार्टी का गठन 1980 में हुआ था। तब से विधानसभा के पहले चुनाव में लोकदल के चै. शंकर सिंह, 1984 में कांगे्रस के बद्रीसिंह, 1989 में जनता दल के चैधरी शंकर सिंह, 1991 में बहुजन समाज पार्टी के श्रीराम पाल, 1993 में बहुजन समाज पार्टी के श्रीराम पाल और 1996 में बहुजन समाज पार्टी से ही फिर श्रीराम पाल निर्वाचित हुए। यह सिलसिला 2002 के विधानसभा चुनाव में तब टूटा जब बहुजन समाज पार्टी ने श्रीराम पाल को निष्कासित कर दिया। इसी चुनाव में भाजपा को पहली बार डाॅ. अरुण मेहरोत्रा ने कामयाबी दिलाई। लेकिन भाजपा इस कामयाबी को अगली बार दोहरा नही सकी।
2007 में बसपा ने यहां ठाकुर कार्ड खेलकर छोटे सिंह चैहान को टिकट दिया जो भाजपा से सीट छीनने में कामयाब रहे। लेकिन 2012 के पिछले चुनाव में कांग्रेस की उमाकांति सिंह ने बसपा के कब्जे से यह सीट झटक ली।
2017 के चुनाव में लोकसभा चुनाव की तरह ही राजनैतिक परिवेश बदला नजर आ रहा है। जिससे भाजपाइयों का मनोबल जरूरत से ज्यादा बुलंद है। इसके कारण भाजपा में टिकटार्थियों का भी तांता लग गया है। संजय त्रिपाठी, रविकांत द्विवेदी, उर्विजा दीक्षित, लालसिंह चैहान, नरेंद्र पाल सिंह जादौन और बालकराम दास पाल टिकटार्थियों की दौड़ में सबसे ज्यादा सक्रिय हैं। लेकिन इस बीच बहुजन समाज पार्टी छोड़कर भाजपा में धमाकेदार इंट्री लेने वाले ब्राह्मण समाज के हैवीवेट नेता सुशील द्विवेदी ने परम्परागत प्रत्याशियों के समीकरण बिगाड़ दिये हैं।
दरअसल गत् चुनाव में पार्टी ने ओहदेदारी के आधार पर प्रदेश महासचिव स्वतंत्रदेव उर्फ कांग्रेस सिंह को डाॅ अरुण मेहरोत्रा का टिकट काटकर उम्मीदवार बना दिया था। जिन्हें जिताने के लिए मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान से लेकर फिल्म स्टार से सांसद बने शत्रुघ्न सिन्हा तक की सभाएं कराई गईं थी लेकिन बाहरी उम्मीदवार के खिलाफ जनमानस में बने माहौल की वजह से स्वतंत्र देव की जमानत जब्त हो गई थी जिससे पार्टी को काफी नीचा देखना पड़ा था। इसलिए 2017 के चुनाव में प्रत्याशी चयन में पार्टी को फूंक-फूंक कर कदम रखना पड़ रहा है। स्थानीय उम्मीदवार के चुनाव की दृष्टि से सुशील द्विवेदी का पलड़ा भारी है। जिसके कारण उनके समर्थक सर्वाधिक आश्वस्त दिख रहे हैं। हालांकि सुशील द्विवेदी का कहना है कि वे टिकट जरूर मांगेंगे लेकिन पार्टी में आने की उनकी यह कोई शर्त नही थी। पार्टी उम्मीदवारी के बारे में जो फैसला करेगी वह उनको मान्य होगा। पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार के लिए वे निष्ठा और मेहनत के साथ चुनाव में जुटेंगे भले ही टिकट किसी को मिले।







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