संयुक्त चुनौती के तमाशे का कितना होगा असर

27 अगस्त को पटना में संयुक्त विपक्ष की वृहद रैली आयोजित होने जा रही है। इस रैली को आहूत करने की घोषणा राजद सुप्रीमो लालू यादव ने की है। अखिलेश यादव इस रैली में शामिल होंगे क्योंकि वे राजद सुप्रीमो के रिश्तेदार हैं। अपनी तरफ से उन्होंने मायावती के भी शामिल होने की घोषणा कर दी है। उनके पिता और सपा के संरक्षक मुलायम सिंह यादव से जब इस बारे में पूछा गया तो उनका कहना था कि इस बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है, लेकिन यह आगे देखने वाली बात होगी कि इस रैली में कौन-कौन आयेगा और कितना मजबूत गठबंधन बनेगा।

मुलायम सिंह अनुभवी राजनीतिज्ञ हैं। हालांकि वे बहुत बड़े तिकड़मबाज भी हैं। इन दिनों पारिवारिक तिकड़म में उलझे हुए हैं इसलिए बहुत पैंतरेबाजी की बातें करते हैं। नतीजतन उनको लोगों ने बहुत गंभीरता से लेना बंद कर दिया है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उनकी बातों को एकदम खारिज कर दिया जाए। मुलायम सिंह ने जो यह कहा है कि लालू द्वारा आहूत रैली में कौन-कौन पहुंचेगा, यह आगे चलकर देखा जाएगा, इसमें कोई बहुत ज्यादा पैंतरेबाजी नहीं है। मुलायम सिंह कहीं न कहीं सटीक बात कह रहे हैं।

भारत में सुचारु लोकतंत्र की स्थापना के लिए वर्ण व्यवस्था पर आधारित पूर्वाग्रहों को छांटने के लिए बाबा साहब अंबेडकर ने भी बहुत श्रम किया और लोहिया जी ने भी। लेकिन दोनों ही महापुरुषों के उत्तराधिकारी इस लाइन पर कभी अडिग नहीं रहे। उन्होंने सत्ता के लिए फार्मूलेबाजी की राजनीति की, जिससे वे आज भी विरत नहीं हैं।

इस कारण खासतौर से मायावती अपनी निरंकुश सत्ता की राजनीति करती हैं और कोई विचारधारा न होने से वे किसी से भी समझौता कर सकती हैं। इस समय उनके लिए अस्तित्व का संकट है। जिसके चलते विपक्षी महागठबंधन में शामिल होकर वे राज्यसभा में पहुंचने का रास्ता तैयार कर रही हैं। लेकिन ये वही मायावती हैं जिन्होंने नरेंद्र मोदी के प्रचार के लिए गुजरात जाने में भी कोई कोताही नहीं की थी।

लालू यादव ने मायावती की पैरवी कोई पहली बार नहीं की है। वीपी सिंह के जमाने में भी उन्होंने मायावती को अपने साथ जोड़ने के लिए काफी मशक्कत की थी। जिसमें वीपी सिंह की पूरी सहमति थी। पर मायावती के मन में सैद्धांतिक लक्ष्य से ज्यादा व्यक्तिगत सत्ता को मजबूत करने की भावना रही जिसकी वजह से उन्होंने लालू के प्रस्ताव को कोई बहुत महत्व नहीं दिया। इसके चलते उन्हें एक राज्य विशेष में भले ही तात्कालिक सफलता मिलती रही हो लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर वर्ण व्यवस्था विरोधी आंदोलन कमजोर होता गया। मायावती की मानसिकता में अभी भी कोई बड़ा परिवर्तन आ गया है, ऐसा मानना भोलापन होगा।

दूसरी ओर लालू भी जमाने का मिजाज नहीं समझ पा रहे। अगर वे यह समझ पाते तो युगपुरुष बन जाते लेकिन अंध जातिवाद, रिश्तेदारी और परिवारवाद के चलते उन्होंने अपने अंदर निहित उन संभावनाओं को कुंद कर लिया है जो उन्हें इतिहास पुरुष बना सकती थीं। उन्होंने अपने नासमझ दोनों लड़कों को उप मुख्यमंत्री बनाने के लिए नीतीश कुमार को मजबूर किया। शहाबुद्दीन के साथ सम्बंध निभाने के मामले में भी उन्होने हठधर्मिता की इंतहा कर दी। निश्चित रूप से शहाबुद्दीन केवल एक गुंडा और माफिया है इसलिए उन्हें जनविरोधी करार देने वालों को बल मिला। मुलायम सिंह में भी यह दोष था, लेकिन उनके पुत्र अखिलेश ने सार्वभौम दृष्टिकोण को समझा और हठधर्मिता की सामंतवादी राजनीति का परित्याग करके काफी हद तक अपनी स्थिति को सुधारा। भले ही अभी उनको उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव में करारा झटका लगा हो लेकिन बीजेपी के मजबूत विकल्प के रूप में उन्होंने अपने आपको स्थापित कर लिया है। जिससे आगे चलकर उन्हें बड़ा लाभ होगा, इसमें कोई संदेह नहीं है। काश लालू भी इस तरह की दूरदर्शिता का परिचय दे पाते।

इन स्थितियों के मद्देनजर 27 अगस्त को पटना में महारैली आयोजित करके संयुक्त विपक्ष मोदी और योगी को मनोवैज्ञानिक चुनौती भले ही पेश कर दे, लेकिन इससे कोई दूरगामी सार हासिल होने वाला नहीं है। मोदी सरकार की छवि कारपोरेटपरस्त सरकार की बन चुकी है। दूसरी ओर योगी सरकार को पूरी तरह निकम्मा माना जाने लगा है। पर इस इंप्रैशन को कैश कराने के लिए विपक्ष की कोई सकारात्मक प्रोग्रामिंग होनी चाहिए जिसके अभाव में विपक्ष शायद ही कुछ बड़ा हासिल कर पाये।

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