
इस समय प्रदेश का माहौल नगर निकाय चुनाव की सरगर्मी से गरमाया हुआ है । राजनीतिक दलों को प्रत्याशी तय करने में पसीना छूट गया है । सिद्धांत और त्याग की दुहाई देने वाले दलों में हर कार्यकर्ता की महत्वाकांक्षा के चलते चयन समिति को लंबी माथापच्ची करनी पड़ी । फिर भी बगावत को रोका नहीं जा सका । हालांकि कोई पार्टी बगावत से अछूती नहीं रही ।
लेकिन हर सिक्के के यहाँ पहलू होते हैं । प्रत्याशितता को ले कर घमासान लोकतान्त्रिक विस्तार का भी लक्षण है । इससे संवैधानिक राज और लोकतान्त्रिक व्यवस्था की जड़ें मजबूत होगी । लोकतंत्र है जिसने समाज में बिना रक्तपात के व्यवस्था परिवर्तन को संभव बनाया है । इसलिये तमाम नकारात्मकता के बावजूद लोकतंत्र को वर्तमान में व्यवस्था के सर्वोत्तम विकल्प के रूप में स्वीकार किया गया है ।
पर लोकतंत्र में बढ़ती कुरीतियाँ चिंता का विषय होना चाहिये । तकनीकी तौर पर लोकतंत्र चलता रहे और इसके गुणात्मक ह्रास को अनदेखा कर दिया जाये तो यह खतरनाक होगा । प्रत्याशी चयन में घमासान के लिए सिर्फ कार्यकर्ताओं की महत्वाकांक्षा ही दोषी नहीं है , इससे अधिक पार्टियों में निर्णय लेने वाली भूमिका में बैठे लोगों की कार्यप्रणाली जिम्मेदार है । वरिष्ठता , सेवा , संघर्ष , समर्पण और व्यवस्था को विज़न यह तमाम बातें हैं जिनके आधार पर हर पार्टी को पारदर्शी चयन करना चाहिये । अगर ऐसा हो तो एक अनार के लिए सौ बीमार भी संतुष्ट रह सकते हैं लेकिन पार्टी में निजी वर्चस्व के लिए जब निर्णय करने वाले सारे मानकों को एक किनारे करके अपने भक्त को प्रत्याशी बनाने की प्रक्रिया अपनाते हैं तो कद्दावर कार्यकर्ताओं में ही नहीं आम लोगों में भी वितृष्णा पैदा होती है ।
नगर निकाय स्वशासन की प्रणाली का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है । शहर नागरिक सुविधाओं की दृष्टि से समृद्ध हो , सुंदर दिखे , इसके बारे में प्रत्याशी के दिमाग में कार्ययोजना की स्पष्ट कल्पना होनी चाहिये । आज नगर निकायों में फंड की बेशुमार उपलब्धता है । बहुत से लोग इसलिये उम्मीदवार बनते हैं क्योंकि उनकी इस फंड पर गिद्ध दृष्टि जमी होती है जबकि इनके दिमाग में निकाय के बेहतर संचालन के लिए कोई कार्ययोजना नहीं होती । यह भी आश्चर्य है कि इसके वाबजूद पार्टियाँ ऐसे लोगों को उम्मीदवार बना देती हैं और ऐसे लोग मजबूत पार्टी के सहारे चुन भी जाते हैं । पिछले कुछ समय से नगर निकाय इसी कुरीति के चलते भ्रष्टाचार के सबसे बड़े अड्डे साबित हुए हैं । पर क्या इसके वाबजूद वर्तमान चुनाव में इस मुद्दे पर जनमत संग्रह की स्थिति आयेगी । शायद नहीं ।
इससे किसी को यह मुगालता नहीं होना चाहिये कि लोग अंधे हैं और राम नाम की लूट समझ कर वे चाहे जो करते रहें फर्क पड़ने वाला नहीं है । तकनीकी प्रबंधन की वजह से उजागर तौर पर यह ढर्रा लोगों में स्वीकार्य लगता है लेकिन लोगों के अचेतन में इससे लोकतंत्र के प्रति आस्था खोखली होती चली जाती है । जिसके परिणाम विनाशकारी होने की आशंका रहती है । अभी चुनाव प्रक्रिया का पहला चरण चल रहा है ,लोगों को इन मुद्दों के प्रति जागरूक करने की जिम्मेदारी तटस्थ बुद्धिजीवियों की है ।







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