प्रेजेंटेशन की कला का महत्व आज के दौर में बहुत
ज्यादा बढ़ गया है । निश्चित रूप से प्रधानमंत्री मोदी
और उनकी टीम का इस हुनर में कोई जवाब नहीं
है । लेकिन असली सोने की चमक ही स्थायी होती
है , मुल्लमा तो मुल्लमा ही है उसका पानी देर सबेर
उतर ही जाता है । इसलिये साख गड़बड़ा गई तो
प्रेजेंटेशन की बाजीगरी किसी काम की नहीं रहने
वाली । इस समय हालात कुछ ऐसे ही हैं ।
पिछले कुछ समय से नोटबंदी और जी एस टी जैसे
मुद्दों पर विपक्ष के हमलों की धार तेज होने से
सरकार असहज हो गई है । सोशल मीडिया आज के
दौर में जनमत को परखने का सबसे बड़ा माध्यम है
। अभी कुछ दिन पहले तक इन मंचों पर मोदी की
सेना का पूरा कब्जा दिखता था लेकिन यह हवा अब
गायब हो चुकी है और सरकार के ख़िलाफ़ आक्रोश
और उलाहनों का बबंडर इन मंचों पर छाने लगा है ।
मोदी को फेंकू और गप्पू की उपाधियों से नवाजा
जाने को कुछ लोगों की भड़ास से ज्यादा अहमियत
नहीं दी जाती थी लेकिन अब जबकि भाजपा
समर्थकों तक के विश्वास की नीवें हिलने लगी हैं ,
अचानक यह व्यंजनाएं आम तौर पर सटीक सी
लगने लगी हैं ।
इसी बीच अर्थनीति पर प्रतिरक्षात्मक सरकार को
विश्व बैंक की कारोबारी सुगमता की रैकिंग में भारत
को एकदम 30 पायदान ऊपर चढ़ते दर्शाए जाने से
संजीवन बूटी मिल गई है और उसका मनोबल लौट
आया है । इस आधार पर सरकार को अपनी
अर्थनीति की गुलाबी तस्वीर पेश करने का मौका
मिल गया है । हालांकि वैश्विक संस्थायें हमेशा
प्रामाणिक नहीं होतीं । शक्तिशाली देश गाइडेड
मिसायल की तरह इनका इस्तेमाल करते हैं ।
अमेरिकी गिरोह नोबल पुरस्कारों के इस्तेमाल से
दुनियाँ की अपने से विरोधी व्यवस्थाओं में सेंध
लगाता रहा यह किसी से छिपा नहीं है । अमेरिका
की प्रसिद्ध टाइम पत्रिका ने पटना के एक कलेक्टर
की फोटो बाढ़ नियंत्रण के असाधारण प्रयास के लिए
अपने कवर पर छापी थी लेकिन बाद में इसमें भारी
घोटाला पाया गया और उस आई ए एस को जेल
जाना पड़ा । यह दूसरी बात है कि यह देश
राजनीतिक तौर पर भले ही आजाद हो गया हो
लेकिन विदेशी प्रमाणन के प्रति उसकी अन्ध ललक
और श्रद्धा जताती है कि इस देश के लोग जहनियत
से अभी भी गुलाम हैं । देश के लोगों की इस
कमजोरी को जानने की वजह से ही मोदी का प्रचार
तंत्र उन्हे टाइम के सर्वे में सबसे ज्यादा वोट मिले ,
उनका अमुक ताकतवर देश के राष्ट्राध्यक्ष से सबसे
नजदीकी याराना देखा गया जैसी बातों में उनकी टी
आर पी बढ़ाने के लिए सर्वाधिक सक्रिय रहता है ।
विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की रैकिंग भी
अमेरिकी गिरोह के नव उपनिवेशवादी हितों से प्रेरित
होती है । इनका आंकलन अगर ब्रह्म वाक्य होता तो
इन्हे खुद अपने मानव विकास सूचकांक को अपूर्ण
बताकर खुशहाली का पूरक सूचकांक जारी न करना
पड़ता ।
इसलिये इनका कारोबारी सुगमता सूचकांक आँख
मूँद कर विश्वास करने योग्य कैसे मान लिया जाये ।
देश में आम कारोबारियों से पूंछिए कोई नहीं कहेगा
कि कारोबार करने की स्थितियों में पहले से कोई
बड़ा सुधार आया है । बल्कि उनका कहना यह है कि
अब तो कारोबार करने की गुंजायश ही नहीं रह गई
है । हकीकत भी यही है । कारोबार सिमट जाने से
रोजगार पर भी असर पड़ा है । करोड़ों लोग काम
छूट जाने की वजह से गाँव , गली में बदहाली के
जीवंत नमूने बने घूम रहे हैं । उस पर महंगायी कोढ़
में खाज का काम कर रही है । सरकार पर कठिन
दौर में भी संरक्षण की हर छतरी लोगों के सिर से
हटा लेने का जुनून सवार है । रसोई गेस के दामों में
भारी बढ़ोत्तरी इसका उदाहरण है । अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार
में खनिज तेल की कीमतें कम होने के वाब्जूद
भारत में डीजल पेट्रोल दुनिया में सबसे ज्यादा महंगा
बिक रहा है। स्वदेशी सरकार की लोगों से यह लूट
तो विदेशी निजाम को भी मात करने वाली है ।
आखिर घोटाले बंद होने , फिजूलखर्ची पर पूरी रोक
के दावों के वाबजूद इस सरकार पर कौन सी मुसीबत
टूट पड़ी है जिससे उसे हर सेवा महंगी करनी पड़
रही है । ऐसा असाधारण विकास भी कहीं नहीं
दिखाई दे रहा है जिसमें सारा सरकारी खजाना खपा
जा रहा हो ।
इसलिये विश्व बैंक के कारोबारी सुगमता से
संबंधित हवाले के जरिये सरकार का लोगों को
आश्वस्त कर पाने का विश्वास मात्र एक प्रवंचना है ।
वैसे कोई भी सरकार अपनी नाकामी खुले तौर पर
स्वीकार नहीं करती लेकिन पूर्व सरकारे भाँप लेतीं थीं
कि कुछ ठीक नहीं हो रहा है और वे स्थिति को कुछ
सुधारने के प्रयासों में लग जाती थी लेकिन यह
सरकार इतनी अहंवादी है कि उसे अपनी चाल लोगों
के मुताबिक जरा भी बदलने में तौहीन महसूस होती
है । ऐसी सरकार से क्या उम्मीद की जाये ।

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