लखनऊ। केन्द्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह की बीटो के कारण ओमप्रकाश सिंह की नियुक्ति को निरस्त करने का फैसला नहीं हो पा रहा है। जबकि 1995 के लखनऊ के गेस्ट हाउस काण्ड के चार्जशीटेड अभियुक्त होने की वजह से प्रधानमंत्री को उन्हें हरी झंडी देना आसानी से गवारा नहीं हो पा रहा है।
अंदरूनी सूत्रों से मिली खबरों के अनुसार जब सुलखान सिंह रिटायर हो रहे थे तो नये डीजीपी के लिए मुख्य सचिव और प्रमुख सचिव गृह मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ से उनके उत्तराधिकारी का नाम तय करने के लिए मिले थे। इस दौरान उ0प्र0 के दोनों वरिष्ठ अधिकारियों ने उनसे कहा था कि या तो वरिष्ठता के सिद्धांत को बरकरार रखते हुए डीजी अग्निशमन प्रवीन सिंह को नया डीजीपी बना दिया जाये या आरआर भटनागर और गोपाल गुप्ता में से किसी को चुन लिया जाये ताकि लोकसभा चुनाव तक के लिए फुर्सत हो सकें।
लेकिन केन्द्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने पहले से ही केन्द्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल के डीजी ओमप्रकाश सिंह के लिए पेशबंदी कर रखी थी। जिसकी वजह से सीएम योगी ने अधिकारियो ंसे कहा कि गोपाल गुप्ता को जून 2019 में सेवानिवृत्त होना है और अगर लोकसभा के आगामी चुनाव कुछ महीने बढ़ गये तो चुनाव के लिए फिर नये डीजीपी का नाम तय करने की कवायत करनी पड़ेगी। दूसरी ओर नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के डीजी राजीव राय भटनागर का कार्यकाल भले ही दिसम्बर 2019 तक हो लेकिन अंदेशा यह है कि वे वर्तमान में अहम जिम्मेदारी पर हैं। जिसके कारण केन्द्र उन्हें रिलीफ नहीं करेगा। इसलिए जनवरी 2020 में रिटायर हो रहे ओमप्रकाश सिंह के नाम को फाइनल करना ठीक रहेगा। मुख्यमंत्री के मंशा के बाद ओपी सिंह का नाम अधिकारियों के बोर्ड ने फाइनल कर दिया।
पर आईबी की रिपोर्ट ने राजनाथ सिंह का सारा खेल खराब कर दिया है। पूरा एक पखबारा हो चुका है तब से यूपी में डीजीपी का पद खाली है और इसके लिए नामांकित ओपी सिंह को केन्द्र से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कार्यमुक्त नहीं होने दे रहे हैं। इससे राज्य सरकार की भारी छीछालेदर को रही है। जबकि राज्य सरकार को प्रधानमंत्री का इशारा समझकर दूसरा नया डीजी अभी तक तय कर लेना चाहिए था। लेकिन केन्द्रीय गृह मंत्री के दबाव में मुख्यमंत्री असमंजस में हैं। पर लगता है कि एक दो दिन में वे कोई निर्णय अब ले लेगें।
अब जो स्थिति बन रही है उसमें वरिष्ठता में सबसे ऊपर प्रवीन सिंह को जून में रिटायर हो जाना है इसलिए उनके बाद दूसरे स्थान पर डा0 सूर्य कुमार शुक्ला की पैरवी तेज हो गयी है। हालांकि सूर्य कुमार को भी वर्तमान स्थिति में केवल अगस्त तक कार्य करने का मौका मिल पायेगा। लेकिन उनकी पैरोकारी कर रहे विशेषज्ञों को कहना है कि अपराध नियंत्रण की दृष्टि से उनका रिकार्ड करिश्माई है जिसका लाभ उठाया जाना चाहिए। जबकि प्रवीन सिंह को डीजीपी बना दिया गया तो उनके बाद सूर्य कुमार के बाद केवल दो महीेने ही रह जायेंगे। ऐसी स्थिति में उनकी आजमाइश करने का कोई औचित्य नहीं होगा।
विकल्प के रूप में सीमा सुरक्षा बल के डीजी रजनीकांत मिश्रा का नाम भी फिर सामने आ गया है। जो अगस्त 2019 में रिटायर होंगे। लेकिन केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर चल रहे अधिकारी का नाम तय करने पर ओमप्रकाश सिंह के मामले में आयी अड़चन से सबक लेकर राजीव राय भटनागर और रजनीकांत मिश्रा दोनों के नाम विचार से हटाने की सलाह भी मुख्यमंत्री को दी जा रही है। ऐसे में डीजी ट्रेनिंग गोपाल गुप्ता की लाटरी खुल सकती है। जिनके पास जून 2019 तक का पर्याप्त कार्यकाल भी है। और जिन्हें कार्यमुक्ति के लिए केन्द्र का मुंह भी नहीं देखना।

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