
लाभ का पद लेने के मामले में 20 विधायकों की सदस्यता समाप्त हो जाने के बावजूद दिल्ली में आप की सरकार को कोई खतरा तो नही है लेकिन राष्ट्रीय क्षितिज पर राजनीति में एक मजबूत विकल्प के रूप में उभरने के उसके आसार इस परिघटना के बाद और ज्यादा मंद हो गये हैं। मुश्किल तो यह है कि अगर बर्खास्त किये गये विधायकों के निर्वाचन क्षेत्र में उपचुनाव कराने की नौबत आ ही गई तो आप की भद दिल्ली में ही पिट सकती है। इनमें से आधी सीटें भी आप बचाने में सफल हो जाये तो आश्चर्य होगा हालांकि आप के लिए राहत की बात यह है कि फिलहाल न्यायालय ने चुनाव आयोग को इन सीटों के उप चुनावों के लिए तिथि तय करने से रोक दिया है।
आप के रूप में दिल्ली में एक नई क्रांति का आगाज हुआ था। उसने दिल्ली में पहला चुनाव 2013 में लड़ा जिसमें उसे 28 सीटों पर कामयाबी मिली। जो 70 सदस्यीय सदन में बहुमत से 8 कम थीं। इस बीच अरविंद केजरीवाल ने कांग्रेस से समर्थन लेकर 49 दिन सरकार चलाई और इसके बाद इस्तीफा दे दिया। लोग इतनी जल्दी उनके रणछोर बनने से खींझ गये थे। उधर लोग 2014 के लोक सभा चुनाव में प्रचंड आंधी के रूप में मोदी का अवतरण हुआ जिससे भाजपा के पक्ष में अभूतपूर्व नतीजे सामने आये। इसके बाद और लगा कि केजरीवाल ने ऐसे माहौल में सरकार गंवाकर अपने लिए बहुत ज्यादा जोखिम मोल ले ली है। लोक सभा चुनाव के बाद तो देश भर में मोदी का जादू और सिर चढ़कर बोलने लगा था। ऐसे में 2015 में जब नये सिरे से दिल्ली के विधान सभा चुनाव हुए तो केजरीवाल की इज्जत जैसे-तैसे बच जाये इसकी दुआ उनके समर्थक कर रहे थे।
पर केजरीवाल ने परंपरागत राजनीतिज्ञ न होते हुए भी अपने आपको सबसे बड़ा राजनैतिक व्यूह रचनाकार साबित कर दिखाया। उन्होंने आप के चुनाव को दिल्ली के आम आदमी का चुनाव बना दिया। लोग इतने जज्बाती हो गये कि उनके दिल्ली के बाहर के रिश्तेदार तक उनके कारण इस भावुक तूफान की चपेट में आकर दिल्ली में केजरीवाल को जिताने के लिए डोरी-डंगर लेकर उमड़ पड़े। इसके बाद दिल्ली के जो नतीजे आये वे अप्रत्याशित थे। भाजपा सहित पूरे विपक्ष का आप ने सूपड़ा साफ कर दिया। 2014 में केजरीवाल ने काशी से मोदी के सामने लोक सभा चुनाव लड़ा था। जिसमें वे जीते भले ही नही थे लेकिन उनकी जोरदार तकरीरों ने लोगों को प्रभावित बहुत किया था। इससे उनकी महायोद्धा की जो छवि बनी थी दिल्ली में मतदाताओं से उन्हें छप्पर फाड़कर मिले वरदान के पीछे उसका भी असर था। लोगों ने यह भरोसा बना लिया था कि मोदी को आगे चलकर राहुल या दूसरा कोई नही पछाड़ पायेगा। कोई पछाड़ेगा तो वह केजरीवाल ही होगें।
उधर केजरीवाल के पांव दिल्ली की 70 में से 67 सीटें मिलने के बाद जमीन पर नही रह गये। सो उन्होंने भी दिल्ली में सरकार चलाने की बजाय उपराज्यपाल के बहाने सीधे-सीधे पीएम मोदी से रार ठाने रखने की अदा अख्तियार कर ली थी। शायद वे अगले चुनाव की प्रतीक्षा करने की बजाय बीच में ही मोदी सरकार को पटक लेने का मुगालता पाल बैठे थे। लेकिन इससे नतीजे उल्टे आने शुरू हुए, राज्यों के चुनावों में एक के बाद एक उनकी पार्टी की हैसियत पता न चलने का अनुभव होने लगा तो वे बैकफुट पर आ गये। उन्होंने हर समय मोदी के खिलाफ व्यक्तिगत तौर पर कीर्तन करते रहने से तौबा कर ली।
इसके बाद भी उनकी स्थिति में सुधार नही आया। विनोद खन्ना के निधन के बाद गुरदासपुर में हुए लोक सभा के उपचुनाव में उनकी पार्टी बहुत कम वोटों पर सिमट गई जबकि आम चुनाव में उसने शानदार मुकाबला किया था। गुजरात के इस बार के विधान सभा चुनाव में भी आम आदमी पार्टी कहीं नजर नही आई। छब्बे बने चले चैबे जी के दुबे रह जाने की कहावत याद दिलाने वाली इस गत के बाद केजरीवाल को सूझने लगा कि अब दिल्ली में ही सही-सलामत रह जायें तो गनीमत है। इस बीच उन्हें 20 विधायकों की सदस्यता खत्म हो जाने का झटका झेलना पड़ा।
आम आदमी पार्टी का कहना है कि संसदीय सचिव रहते हुए इन विधायकों ने वेतन, भत्ता व सुविधाओं आदि किसी रूप में कोई लाभ नही लिया था। फिर भी तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एके जोति ने अपने रिटायरमेंट के ठीक पहले यह फैसला इसलिए सुना दिया क्योंकि उन्हें मोदी का कर्ज उतारना था। वे नरेंद्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री रहने के दौरान उनके प्रधान सचिव रह चुके थे। इसके बाद विश्वासपात्र होने के नाते मोदी ने उन्हें गुजरात का मुख्य सचिव भी बनवा दिया था। इसी कड़ी में उनको चुनाव आयोग की भी बागडोर मिली थी। जोति के समय आयोग के कुछ और कदम भी विवादित रहे। उन्होंने हिमांचल प्रदेश के विधान सभा चुनाव के साथ ही गुजरात विधान सभा के चुनाव की तिथि इसलिए घोषित नही की क्योंकि इस बीच मोदी का गुजरात में दौरा प्रस्तावित था। जिसमें उन्होंने चुनावी माहौल मजबूत करने के लिए थोक में लोकार्पण और शिलान्यास कर डाले थे। इसी तरह जोति के रहते चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश में सिकंदरा विधान सभा का उपचुनाव तो करा डाला लेकिन भाजपा की सुविधा के मददेनजर गोरखपुर और फूलपुर लोक सभा क्षेत्रों में उपचुनाव की तिथियां तय नही की। फिर भी जोति के संदिग्ध आचरण का लाभ लेने का कोई अधिकार आप के लिए नजर नही आता क्योंकि जो प्रावधान है उनके मुताबिक वेतन भत्ते न लेने के बावजूद भी लाभ के पद को धारण करने की गुंजाइश सांसद, विधायकों के लिए नही है। जब तक कि पद विशेष के लिए छूट देने का कोई कानून न बना दिया गया हो। कांगे्रस ने अपने समय दिल्ली में मुख्यमंत्री के लिए विधायकों में से एक संसदीय सचिव की नियुक्ति का प्रावधान कर दिया था। पर मंत्रियों के लिए इसमें व्यवस्था नही थी। केजरीवाल ने मंत्रियों के लिए भी संसदीय सचिव नियुक्त कर डाले। नतीजतन वे कानूनी शिकंजे में फंस गये।
जब तक केजरीवाल की उप राज्यपाल से ठनती रही थी लोगों की हमदर्दी उनके साथ रहती थी। लोग उन्हें झगड़ालू भले ही समझते थे लेकिन ईमानदार मानते थे। पर जब पार्टी में उनके एकतंत्रीय हुकूमत कायम करने के इरादे के वजह से एक के बाद एक प्रमुख लोगों को बाहर का रास्ता देखने के लिए बाध्य होना पड़ा तो न केवल केजरीवाल के प्रति अंधश्रद्धा विदीर्ण होती चली गई बल्कि उन पर धूर्त आदमी होने का ठप्पा भी गहराता गया। रही सही कसर आप के बागी विधायक कपिल मिश्रा ने निकाल दी। जिन्होंने केजरीवाल के सहयोगियों के भ्रष्टाचार के खुलासे का दावा मजबूत सबूतों और दलीलों के आधार पर किया। इस क्रम में हाल में राज्यसभा की उम्मीदवारी के लिए उन्होंने जो नाम तय किये उसमें मनमानी के पीछे वसूली का आरोप लगा और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को देखते हुए उन्हें नकारना संभव नही रहा। जन लोकपाल की नियुक्ति को लेकर भी उनका भगोड़ा रवैया लोगों में उनके प्रति विश्वास को डिगाने वाला सिद्ध हुआ। अन्ना हजारे ने भी यह साबित करने में कसर नही छोड़ी कि केजरीवाल ने उनके शिष्य होने का नाटक किया था जबकि वे भी दूध के धुले नही हैं।
यह भी साफ हो चुका है कि केजरीवाल ने अपने आंदोलनों के समय जनवादी तौर-तरीके भले ही अपनाये हों लेकिन वे मूल रूप से कारपोरेट और सरकारी धन को पलीता लगाने की घात में रहने वाले कुख्यात एनजीओ तंत्र के आदमी हैं। विचारधारा के मामले में उनके पास वैकल्पिक व्यवस्था का कोई माडल नही है। गुणात्मक रूप से भाजपा और कांग्रेस की ही कार्बन कापी हैं सिवा इसके कि वे अच्छी गवर्नेंस के कायल हैं और दुनियां के हर बुर्जुआ लोकतंत्र वाले देश में जहां सामाजिक स्थिरता आ चुकी है यथा स्थिति के संरक्षण के लिए इसी पैटर्न को अख्तियार किया जाता है। पर अभी भारत तो सामाजिक उथल-पुथल के भूकंप से डामाडोल देश है। इसलिए यथास्थिति की सोच यहां की बहुसंख्यक जनता के लिए बहुत पीड़ादायक हो सकती है। इस मामले मेें केजरीवाल के बेनकाब होने के बाद उस वर्ग का जबर्दस्त मोह भंग हुआ है जिसने उनकी चक्रवर्ती सफलता में सबसे अहम भूमिका निभाई थी। धुंधली कार्बन कापी की बजाय वर्तमान में स्थापित दलों में ही उलट-पुलट करते हुए व्यवस्था को संचालित करना अब लोगों को अपनी नियति नजर आये तो इसमें विसंगति क्या है।







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