0 पदमश्री व्यंग्य लेखक डा. ज्ञान चतुर्वेदी बोले
उरई। प्रसिद्ध व्यंग्यकार और पदमश्री विभूषित डा. ज्ञान चतुर्वेदी ने कहा है कि लेखक को भाव प्रवेश की कला आनी चाहिए तभी उसका लेखन सजीव हो सकता है। उन्होंने अपने प्रकाशनाधीन उपन्यास पागलखाना का जिक्र किया जिसमें बाजार के संत्रास को भोगते 6 पात्र रचे गये हैं। उन्होंने कहा कि लिखते समय उन्हें इन पात्रों को अपने अंदर जीना पड़ा। जिससे वे डिप्रेशन के शिकार हो गये। उनकी हालत से जब उनका परिवार बहुत चिंतित होने लगा तो इससे उबरने के लिए कुछ दिनों उपन्यास का लेखन स्थगित कर दिया था।
साहित्यिक संस्था संवेदना द्वारा आयोजित सम्मान समारोह में डा. ज्ञान चतुर्वेदी ने अपने एक अन्य उपन्यास बारहमासी के अनुभव को भी इस संदर्भ में सांझा किया। उन्होंने बताया कि इसमें बिन्नू नाम की एक युवती है जिसका विवाह काफी उम्र तक तय नही हो सका। वह इस चिंता में रहती है कि उसका कैसे जल्द विवाह हो जाये तांकि उसके पिता को उसकी बोझ से छुटकारा मिल जाये। इस उपन्यास के सामने आने के बाद कई लेखिकाओं ने उनसे कहा कि आप तो स्त्री नही हैं फिर स्त्री मन का इतना बारीक चित्रण आप कैसे कर पाये। उन्होंने कहा कि मुझे खुद बिन्नू हो जाना पड़ा तब मैं स्त्री मन की गहराइयों में उतर पाया।
भूषण की कविताओं का उदाहरण उन्होंने दिया जिसे सुनकर सैनिकों में वीरता का संचार हो जाता था। उन्होंने कहा कि आपके मन में वैसी हूंक और तड़प नही है तो पाकिस्तान पर चढ़ाई के लिए आप अपनी कविता में कितना ही विफरें पर वह दूसरों पर असर नही डाल पायेगी।

लेखक लिखें कम पढ़े ज्यादा
उन्होंने लेखकों को नसीहत दी कि उनको लिखना कम पढ़ना ज्यादा चाहिए। उन्होंने अकबर नजीबावादी का एक संस्मरण सुनाया वे अपने पोते को पीठ पर लादकर खिला रहे थे। जब वे खड़े हुए तो पोता बोला दादाजी मै तो आपसे ऊंचा हो गया हूं। अकबर नजीबावादी ने इस पर अपने पोते से कहा कि तुम मुझसे ऊंचे हो गये हो लेकिन एक बात ध्यान रखना कि तुम्हारे कद में मेरा भी कद शामिल है। उन्होंने कहा कि लेखक जब दूसरों को पढ़ता है तभी उसका लेखन समृद्ध होता है क्योंकि पूर्वज लेखकों का कद उसके कद में शामिल हो जाता है। जो लेखक सिर्फ लिखते हैं, पढ़ते नही हैं वे कभी असाधारण नही रच सकते और वे अपने को दोहराने लगते हैं। उन्होंने कहा कि लेखक यह भी ध्यान रखें कि जो उन्होंने लिखा है उसमें उनका खुद का पूरा विश्वास हो। अन्यथा उनका लेखन बनावटी दिखने लगेगा। वह वास्तवित लेखन नही कर पायेंगे।
बाजार सर्वत्र हावी
डा. चतुर्वेदी ने कहा कि यह विडंबना है कि आज बाजार सत्ता से लेकर समाज और साहित्य तक का भाग्य विधाता बन गया है। वह लोगों का व्यवहार बदल रहा है। वह कहता है कि अगर आप प्रेम में पड़ गये तो आपकों वेलेंटाइन-डे याद रखना पड़ेगा वरना आपका प्रेम दो कौड़ी का है। आप अपने प्रेम को, पिता को, मां को कैसे याद करें यह कार्ड का बाजार तय करता है। उन्होंने बताया कि देश में 20 हजार करोड़ रुपये साड़ियों का व्यापार है। इससे जींस आदि यूरोपीय कपड़ों के लिए प्रतिस्थापित करने हेतु बाजार ने टीवी सीरियलों में मम्मियों को भी जींस पहने दिखाना शुरू कर दिया। फिर भी साड़ी खत्म नही हुई तो यह भारतीय समाज के संस्कार हैं जिन्हें आसानी से नही भुलाया जा सकता। उन्होंने कहा कि व्यायाम से लेकर हर चीज आज इंडस्ट्री में बदल चुकी है। इस तरह बाजार का छा जाना अच्छा लक्षण नही है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता तपस्या के प्रसून के रचियता और जाने-माने कवि साहित्यकार यज्ञदत्त त्रिपाठी व संचालन संवेदना की अध्यक्ष डा. माया सिंह ने किया। कार्यक्रम के शुरू में अखिल भारतीय साहित्य परिषद के अध्यक्ष प्रेम नारायण दीक्षित ने सरस्वती वंदना पढ़ी। लोक संस्कृति विशेषज्ञ अयोध्या प्रसाद कुमुद, इप्टा के अध्यक्ष देवेंद्र शुक्ला, एडीआर के प्रदेश संयोजक अनिल शर्मा, डा. राकेश द्विवेदी, बार एसोसिएशन के पूर्व सचिव अरविंद गौतम चच्चू, राधा रमण शाडिल्य, सुरेश त्रिपाठी, जगरूप सिंह आदि ने भी अपने विचार प्रकट किये।

Leave a comment